हरियाणा सरकार द्वारा 22 जिलों में तैनात जिला अटॉर्नी को सीधे दो स्तर ऊपर डिप्टी डायरेक्टर ऑफ प्रॉसीक्यूशन (DDP) के पद पर पदोन्नत किए जाने का मामला अब पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंच गया है। इस विवाद को लेकर हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप कुमार रापड़िया ने एक याचिका दायर की है, जिस पर आज सुनवाई करते हुए अदालत ने हरियाणा सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नए नियम न केवल भेदभावपूर्ण हैं, बल्कि इससे आम वकीलों के संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों का भी हनन हो रहा है। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 में स्पष्ट प्रावधान है कि 15 वर्षों का अनुभव रखने वाला कोई भी वकील डिप्टी डायरेक्टर ऑफ प्रॉसीक्यूशन बनने के लिए पात्र होता है।
इसके बावजूद हरियाणा सरकार ने ऐसे नियम बना दिए हैं, जिनके तहत केवल सरकारी वकील के रूप में कार्यरत व्यक्तियों को ही पदोन्नति के जरिए DDP बनाया जा सकता है। याचिका में इसे कानून की मूल भावना के खिलाफ बताते हुए रद्द करने की मांग की गई है।
इस मामले में हाईकोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने भी सरकार को अलग से कानूनी नोटिस भेजा है। उन्होंने कहा कि सीधे प्रमोशन देकर निजी प्रैक्टिस करने वाले अनुभवी वकीलों और सेशंस जजों को प्रतिस्पर्धा का अवसर ही नहीं दिया गया, जो कि BNSS 2023 की धारा 20(2)(a) का स्पष्ट उल्लंघन है।
दरअसल, हरियाणा सरकार के गृह विभाग ने करीब 16 दिन पहले एक आदेश जारी कर 22 जिलों में कार्यरत जिला अटॉर्नी को असिस्टेंट डायरेक्टर ऑफ प्रॉसीक्यूशन (ADP) बनाए बिना सीधे डिप्टी डायरेक्टर ऑफ प्रॉसीक्यूशन (DDP) के पद पर पदोन्नत कर दिया। यह प्रमोशन वरिष्ठता के आधार पर किए गए हैं और सभी अधिकारी एक वर्ष की परिवीक्षा अवधि पर रहेंगे।
डिप्टी डायरेक्टर ऑफ प्रॉसीक्यूशन बनाए गए जिला अटॉर्नी में सुमन बंसल, सोहन सिंह, लेघा दीपक रणजीत, सतीश कुमार, आनंद मान, सुनील कुमार, सत्येंद्र कुमार, राजेश कुमार चौधरी, धर्मेंद्र राणा, मनोज कुमार, दीपक बूरा, हरपाल सिंह, अनीता, राजेश कुमार, परवेज, सुमेर सिंह, हितेंद्र सिंह, नरेंद्र सिंह, मंजीत सिंह, अश्वनी कुमार चौधरी, सुरेश कुमार और पारुल चौहान के नाम शामिल हैं।
विवाद का एक अहम पहलू वेतनमान से भी जुड़ा हुआ है। एडवोकेट हेमंत कुमार के अनुसार, 31 दिसंबर को जारी आदेश में DDP का वेतनमान ₹1,23,100 से ₹2,15,900 दर्शाया गया है, जो कि डायरेक्टर ऑफ प्रॉसीक्यूशन के वेतन से भी अधिक बताया जा रहा है। इस कथित विसंगति को लेकर उन्होंने 12 जनवरी को गृह विभाग की अपर मुख्य सचिव डॉ. सुमिता मिश्रा को पत्र लिखकर संज्ञान में लिया है।
हेमंत कुमार का यह भी कहना है कि 18 दिसंबर 2025 को गृह विभाग ने हरियाणा राज्य अभियोजन विभाग विधिक सेवा (ग्रुप-A) नियमावली, 2013 में संशोधन किया था, जिसमें ADP और DDP के पद जोड़े गए। संशोधित नियमों में DDP बनने के लिए दो वर्ष का ADP अनुभव अनिवार्य बताया गया है, जबकि पहले ADP का पद अस्तित्व में ही नहीं था। इसी आधार पर DA से सीधे DDP बनाए जाने का रास्ता खोला गया।
हालांकि, इन संशोधनों में 15 वर्ष की वकालत करने वाले निजी वकीलों या सेशंस जजों की सीधी भर्ती का कोई प्रावधान नहीं किया गया, जिसे लेकर अब कानूनी सवाल खड़े हो रहे हैं। मामले की अगली सुनवाई में हाईकोर्ट सरकार से इस पूरे प्रमोशन सिस्टम पर जवाब मांगेगा, जिससे आने वाले समय में राज्य की अभियोजन सेवा व्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता है।


