ओम प्रकाश चौटाला का जन्म 1 जनवरी 1935 को सिरसा जिले के चौटाला गांव में एक राजनीतिक रूप से सक्रिय जाट परिवार में हुआ था। वे जाट समुदाय के सिहाग गोत्र से संबंध रखते थे। उनके पिता चौधरी देवीलाल भारत के उप प्रधानमंत्री और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने 1966 में हरियाणा राज्य के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
देवीलाल की पांच संतानों में सबसे बड़े होने के नाते, ओम प्रकाश चौटाला पर बचपन से ही बड़ी जिम्मेदारियां थीं। जब उनके पिता राजनीति में सक्रिय थे, तो परिवार की देखभाल, खेती-बाड़ी और छोटे भाई-बहनों की शिक्षा की जिम्मेदारी ओम प्रकाश पर आ गई। इन पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण उन्हें अपनी शिक्षा बीच में ही छोड़नी पड़ी। हालांकि शिक्षा अधूरी रही, लेकिन उन्होंने अपने पिता से तीक्ष्ण राजनीतिक समझ विरासत में प्राप्त की।
परिवार और वैवाहिक जीवन
ओम प्रकाश चौटाला की पत्नी का नाम स्नेहलता जखड़ था, जो पंजाब के फाजिल्का के पंचकोसी अबोहर की रहने वाली थीं। स्नेहलता का निधन अगस्त 2019 में 81 वर्ष की आयु में हुआ था, जब ओम प्रकाश चौटाला शिक्षक भर्ती घोटाले में जेल में बंद थे। उनकी अनुपस्थिति में पत्नी के अंतिम समय में वे उनके पास नहीं हो सके, जो उनके जीवन का एक दुखद पहलू था।
चौटाला दंपत्ति की पांच संतानें थीं – दो बेटे अजय सिंह चौटाला और अभय सिंह चौटाला, और तीन बेटियां सुचित्रा, सुनीता और अंजलि। दोनों बेटों ने राजनीति में करियर बनाया, हालांकि बाद में परिवार में विभाजन हो गया और 2018 में अजय ने जननायक जनता पार्टी (JJP) का गठन किया, जबकि अभय इनेलो के साथ रहे।

घड़ी तस्करी विवाद: पिता से अलगाव
ओम प्रकाश चौटाला के जीवन का एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद प्रसंग 1978 में घटित हुआ। 22 अक्टूबर 1978 को जब वे दक्षिण-पूर्व एशिया के एक सम्मेलन से बैंकॉक से लौटे, तो दिल्ली एयरपोर्ट पर कस्टम विभाग ने उनके बैग की तलाशी ली। तलाशी में करीब 48 घड़ियां और दो दर्जन महंगे पेन बरामद हुए।
यह खबर आग की तरह फैल गई कि मुख्यमंत्री देवीलाल के बेटे ओम प्रकाश चौटाला तस्करी में पकड़े गए हैं। उस समय चंडीगढ़ के पीजीआई में इलाज करवा रहे देवीलाल को जब इसकी जानकारी हुई, तो उन्होंने तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और साफ शब्दों में कहा कि “ओम प्रकाश के लिए मेरे घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं”। देवीलाल ने गुस्से में अपने बेटे को घर से निकाल दिया।
हालांकि, बाद में जांच में यह सामने आया कि ओम प्रकाश चौटाला कोई तस्करी नहीं कर रहे थे। मुख्यमंत्री का बेटा होने के नाते विदेश दौरे पर उन्हें गिफ्ट में घड़ियां मिली थीं। जब इसकी विस्तृत जांच हुई तो ओम प्रकाश चौटाला निर्दोष पाए गए। इसके बाद देवीलाल ने भी अपने बेटे को माफ कर दिया और पुनः परिवार में स्वीकार किया।
राजनीतिक करियर की शुरुआत
ओम प्रकाश चौटाला ने अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए राजनीति में प्रवेश किया। 1968 में जनता पार्टी के सदस्य के रूप में उन्होंने हरियाणा की एलनाबाद विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। उन्होंने चुनाव परिणाम को अदालत में चुनौती दी और लगभग एक साल बाद उप-चुनाव हुआ, जिसमें चौटाला विजयी हुए। 1970 में वे पहली बार हरियाणा विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए।
1987 में ओम प्रकाश चौटाला राज्यसभा के लिए चुने गए और 1990 तक वहां रहे। इस दौरान उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति का अनुभव प्राप्त किया।
मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल
पहला कार्यकाल (2 दिसंबर 1989 – 22 मई 1990)
जब दिसंबर 1989 में देवीलाल को वी.पी. सिंह की सरकार में उप प्रधानमंत्री बनाया गया, तो उसी दिन ओम प्रकाश चौटाला को हरियाणा का मुख्यमंत्री बनाया गया। उस समय वे विधायक नहीं थे, इसलिए उन्हें छह महीने के भीतर विधानसभा सदस्य बनना आवश्यक था।
चौटाला ने मेहम सीट से उपचुनाव लड़ने का निर्णय लिया, जो उनके पिता की सीट थी। लेकिन यह उपचुनाव हरियाणा की राजनीति में सबसे विवादास्पद और हिंसक चुनावों में से एक बन गया।
मेहम काण्ड: हरियाणा की राजनीति का काला अध्याय
27 फरवरी 1990 को हुए मेहम उपचुनाव में व्यापक बूथ कैप्चरिंग, नकली मतदान और सरकारी मशीनरी, विशेष रूप से पुलिस के दुरुपयोग की शिकायतें आईं। अगले दिन अखबारों की सुर्खियां “Mayhem in Meham” (मेहम में तबाही) थीं।
स्वतंत्र प्रत्याशी आनंद सिंह डांगी ने चुनाव आयोग में शिकायत की, जिसके बाद आयोग ने आठ बूथों पर 28 फरवरी को पुनर्मतदान का आदेश दिया। इस पुनर्मतदान के दौरान बैंसी गांव में व्यापक हिंसा हुई। प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं और गांव के सरपंच की गोली लगने से मौत हो गई। कम से कम 10 लोगों की मौत हुई, पुलिस के वाहनों को आग लगा दी गई और दुकानों को जला दिया गया।
इससे पहले, स्वतंत्र प्रत्याशी अमीर सिंह की मृत्यु हो गई थी, जिसे चौटाला परिवार के करीबी माना जाता था। चुनाव आयोग ने चुनाव रद्द कर दिया और 20 मई 1990 को नए चुनाव की घोषणा की। इस हिंसा और विवाद के कारण 22 मई 1990 को चौटाला को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

दूसरा और तीसरा कार्यकाल (1990-91)
चौटाला ने दूसरी बार 12 जुलाई 1990 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन केवल पांच दिन बाद 17 जुलाई 1990 को उन्हें फिर से इस्तीफा देना पड़ा।
तीसरी बार 22 मार्च 1991 को वे मुख्यमंत्री बने, लेकिन यह कार्यकाल भी केवल 15 दिनों तक चला और 6 अप्रैल 1991 को राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।
चौथा और पांचवां कार्यकाल (1999-2005)
24 जुलाई 1999 को चौटाला चौथी बार मुख्यमंत्री बने, जब हरियाणा विकास पार्टी की सरकार बहुमत खो बैठी और चौटाला ने भाजपा के समर्थन से सत्ता का दावा किया। यह कार्यकाल मार्च 2000 तक रहा, जब विधानसभा भंग कर दी गई और चुनाव कराए गए।
2000 के विधानसभा चुनावों में इनेलो-भाजपा गठबंधन ने 90 सदस्यीय विधानसभा में 53 सीटें जीतीं और 2 मार्च 2000 को चौटाला पांचवीं बार मुख्यमंत्री बने। यह उनका सबसे लंबा कार्यकाल था जो पूरे पांच साल तक 5 मार्च 2005 तक चला।

मुख्यमंत्री के रूप में शासन शैली और नीतियां
ग्रामीण विकास और कृषि केंद्रित नीतियां
ओम प्रकाश चौटाला की राजनीति का मूल आधार किसान और ग्रामीण विकास था। उन्होंने अपने पिता देवीलाल की विरासत को आगे बढ़ाते हुए कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया। उनकी सरकार ने फसल क्षति के लिए मुआवजा देने और कृषि ऋण माफी की परंपरा को बढ़ावा दिया।
2001-02 में हरियाणा ग्रामीण विकास योजनाओं के तहत आवंटित केंद्रीय धन के उपयोग में पहले स्थान पर रहा, जहां 106।21 करोड़ रुपये के आवंटन में से 93।12 करोड़ रुपये (87।67%) का उपयोग किया गया।
“सरकार आपके द्वार” कार्यक्रम
चौटाला की सबसे प्रसिद्ध पहल “सरकार आपके द्वार” कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम के तहत मुख्यमंत्री स्वयं हरियाणा के प्रत्येक गांव में गए, लोगों की जरूरतों को सुना और मौके पर ही निर्णय लिए। पूर्व पुलिस महानिदेशक एम।एस। मलिक के अनुसार, चौटाला ने अपने कार्यकाल में लगभग हर गांव का तीन बार दौरा किया।
बुनियादी ढांचा और शहरी विकास
चौटाला सरकार ने शहरों के सौंदर्यीकरण, ग्रामीण सड़कों में सुधार और गांव चौपालों की मरम्मत पर जोर दिया। उन्होंने शहरों से ट्रांसपोर्ट नगरों को बाहर स्थानांतरित करने की योजना बनाई ताकि यातायात की समस्या कम हो सके।
2003 में चौटाला ने तीन बड़ी परियोजनाएं शुरू कीं – गांवों में शहरी क्षेत्रों की तर्ज पर आवासीय कॉलोनियां स्थापित करना, ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के लिए स्वच्छ शौचालय और पंचायत जमीनों पर औषधीय पौधे लगाने की योजना।
शिक्षा और प्रौद्योगिकी
हरियाणा सरकार ने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के साथ मिलकर कक्षा 6 से अनिवार्य कंप्यूटर शिक्षा देने की परियोजना शुरू की। इसके अलावा चौटाला ने औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न उद्योगपतियों से संपर्क किया।
पुलिस और प्रशासनिक सुधार
चौटाला ने पुलिस सुधारों पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने पुलिस कर्मियों के लिए राशन राशि और पदोन्नति नीति शुरू की। खिलाड़ियों के लिए नकद और नौकरी प्रदान करने की सभी नीतियां उनके द्वारा शुरू की गईं।
आईएएस अधिकारी पी।के। दास के अनुसार, चौटाला प्रशासनिक सुधारों को तेजी से समझने वाले नेता थे। उनके कार्यकाल में हरियाणा VAT लागू करने वाला पहला राज्य बन गया और राजस्व में 18-20% की वृद्धि हुई, जिसे केंद्र सरकार ने सराहा।
विवादास्पद निर्णय और आलोचना
चौटाला के कार्यकाल को कुछ विवादास्पद घटनाओं ने भी दागदार किया। 2002 में जिंद जिले के कंडेला गांव में बिजली बिलों की माफी की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे किसानों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं, जिसमें नौ किसानों की मौत हो गई। चौटाला ने 2000 के चुनाव से पहले बिजली बिल माफ करने का वादा किया था, लेकिन दो साल बाद किसानों ने आरोप लगाया कि सरकार अपने वादे से मुकर गई।
कुछ आलोचकों का मानना था कि 2000-2005 के कार्यकाल में सत्ता बड़े पैमाने पर चौटाला परिवार के हाथों में केंद्रित हो गई थी और एक प्रकार से सत्तावादी शासन चला।
राजनीतिक व्यक्तित्व और शासन शैली
ओम प्रकाश चौटाला को उनकी देहाती आकर्षण और जमीनी स्तर पर जनता से जुड़ाव के लिए जाना जाता था। औपचारिक शिक्षा सीमित होने के बावजूद, उनमें तीक्ष्ण राजनीतिक समझ और नेतृत्व कौशल थे।
आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने एक घटना का उल्लेख किया जब वे चौटाला के साथ जर्मनी में एक सम्मेलन में गए थे। खेमका को अनुवाद करना था, लेकिन उन्होंने पाया कि चौटाला के जवाब इतने स्वतःस्फूर्त और सुसंगत थे कि उन्हें संशोधित करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी।
चौटाला अपने तेज निर्णय लेने की क्षमता और जनता-उन्मुख दृष्टिकोण के लिए जाने जाते थे। पूर्व पुलिस महानिदेशक मलिक के अनुसार, कोई भी अधिकारी चौटाला द्वारा दिए गए काम को मना नहीं करता था, भले ही वे रात 12 बजे फोन करें।
हालांकि, उन्हें एक दृढ़ और कभी-कभी कठोर नेता के रूप में भी देखा जाता था। पूर्व हरियाणा मुख्यमंत्री बंसी लाल की तरह, चौटाला में मजबूत प्रशासनिक क्षमताएं थीं।
शिक्षक भर्ती घोटाला और जेल की सजा
ओम प्रकाश चौटाला के राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा धब्बा 1999-2000 में हुई शिक्षक भर्ती घोटाले का मामला था। उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान हरियाणा में 3,206 जूनियर बेसिक ट्रेनड (JBT) शिक्षकों की अवैध भर्ती की गई थी।
सीबीआई की जांच में पाया गया कि ये नियुक्तियां जाली दस्तावेजों, रिश्वत, भाई-भतीजावाद और पक्षपात के आधार पर की गई थीं, न कि योग्यता के आधार पर। चयन सूचियों के साथ छेड़छाड़ की गई थी ताकि पसंदीदा उम्मीदवारों और जिन्होंने पैसे दिए थे, उन्हें नियुक्त किया जा सके।
16 जनवरी 2013 को दिल्ली की एक विशेष सीबीआई अदालत ने ओम प्रकाश चौटाला, उनके बेटे अजय चौटाला और 53 अन्य लोगों को दोषी ठहराया। 22 जनवरी 2013 को न्यायाधीश विनोद कुमार ने 78 वर्षीय चौटाला और 51 वर्षीय अजय को 10 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई।
अदालत ने वृद्धावस्था और बीमारी के आधार पर नरमी दिखाने के आरोपियों के अनुरोध को खारिज कर दिया। न्यायाधीश ने कहा कि जिस तरह से उन्होंने बड़ी संख्या में उम्मीदवारों को उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित करने की साजिश रची, उन्हें किसी नरमी के योग्य नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने 2 अगस्त 2015 को इस सजा को बरकरार रखा। चौटाला जनवरी 2013 से जुलाई 2021 तक तिहाड़ जेल में रहे।
तिहाड़ जेल में जीवन और शिक्षा
जेल में पढ़ाई का संकल्प
तिहाड़ जेल में बंद रहने के दौरान ओम प्रकाश चौटाला ने अपना समय सदुपयोग करने का फैसला किया और अपनी अधूरी शिक्षा पूरी करने का संकल्प लिया। उन्होंने जेसिका लाल हत्याकांड में आजीवन कारावास भुगत रहे मनु शर्मा से प्रेरणा ली, जो जेल में कानून की पढ़ाई कर रहे थे।
2017 में चौटाला ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (NIOS) से कक्षा 10 की परीक्षा दी और 53।40% अंकों के साथ उत्तीर्ण हुए। उन्होंने सामाजिक विज्ञान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, हिंदी, भारतीय संस्कृति और विरासत और व्यावसायिक अध्ययन विषय चुने थे।
उसी वर्ष उन्होंने कक्षा 12 की परीक्षा भी दी और प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। हालांकि, उनका कक्षा 12 का परिणाम रोक दिया गया क्योंकि उन्होंने कक्षा 10 की अंग्रेजी परीक्षा नहीं दी थी।
2021 में 86 वर्ष की आयु में चौटाला ने सिरसा में एक परीक्षा केंद्र में कक्षा 10 की अंग्रेजी की परीक्षा दी और 88% अंक प्राप्त किए। 2022 में 87 वर्ष की आयु में उन्होंने अंततः कक्षा 10 और 12 दोनों की परीक्षाएं पूरी कीं और अपना मार्कशीट प्राप्त किया।
तिहाड़ के सबसे उम्रदराज कैदी
27 मई 2022 को विशेष सीबीआई अदालत ने चौटाला को आय से अधिक संपत्ति (disproportionate assets) मामले में दोषी ठहराया और चार साल की कैद और 50 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। सीबीआई ने आरोप लगाया कि चौटाला ने 1993 से 2006 के बीच 6।09 करोड़ रुपये की अवैध संपत्ति अर्जित की थी, जो उनकी वैध आय से अधिक थी।
87 वर्ष की आयु में चौटाला तिहाड़ जेल के तब तक के सबसे उम्रदराज कैदी बन गए, जहां 19,584 कैदियों में से वे सबसे बुजुर्ग थे। इससे पहले एक 85 वर्षीय हत्या के दोषी तिहाड़ के सबसे उम्रदराज कैदी थे।
अगस्त 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट ने 50 लाख रुपये के जुर्माने के भुगतान की शर्त पर उनकी सजा को निलंबित कर दिया और उन्हें जमानत दे दी।
COVID-19 के दौरान रिहाई
मार्च 2020 से चौटाला आपातकालीन पैरोल पर थे और 21 फरवरी 2021 को उन्हें आत्मसमर्पण करना था। हालांकि, हाई कोर्ट ने उनकी पैरोल बढ़ा दी थी।
जून 2021 में दिल्ली सरकार ने COVID-19 महामारी के कारण जेलों में भीड़ कम करने के लिए उन कैदियों को छह महीने की विशेष छूट देने का आदेश पारित किया जिन्होंने 10 साल की सजा में से साढ़े नौ साल पूरे कर लिए थे। चौटाला, जिन्होंने नौ साल और नौ महीने की सजा पूरी कर ली थी, इस छूट के लिए पात्र थे।
2 जुलाई 2021 को 86 वर्षीय ओम प्रकाश चौटाला को तिहाड़ जेल से रिहा कर दिया गया। जेल से रिहाई के बाद उन्हें उनके पोते करण चौटाला गुरुग्राम के उनके निवास पर ले गए। दिल्ली-गुरुग्राम बॉर्डर पर इनेलो कार्यकर्ताओं ने फूलों की बारिश करके, ढोल बजाकर और मिठाई बांटकर उनका स्वागत किया।
परिवार में विभाजन और इनेलो का विभाजन
ओम प्रकाश चौटाला के जीवन का एक दुखद पहलू उनके परिवार में आई दरार थी, जो उनके पिता देवीलाल के समय की घटनाओं की पुनरावृत्ति थी। 1989 में जब देवीलाल हरियाणा के मुख्यमंत्री थे, तो उनके दो बेटों ओम प्रकाश और रंजीत सिंह के बीच उत्तराधिकार को लेकर विवाद हुआ था। देवीलाल ने अंततः ओम प्रकाश को अपना उत्तराधिकारी चुना, और रंजीत सिंह को राज्यसभा भेज दिया।
इतिहास ने खुद को दोहराया जब ओम प्रकाश चौटाला के दोनों बेटों अजय और अभय के बीच सत्ता संघर्ष शुरू हुआ। अजय चौटाला बड़े बेटे और स्वाभाविक उत्तराधिकारी थे, लेकिन 2013 में जब वे और ओम प्रकाश दोनों शिक्षक भर्ती घोटाले में 10 साल की जेल की सजा पा गए, तो अजय की संभावनाएं कम हो गईं।
अजय के बेटे दुष्यंत चौटाला, जो हिसार से सांसद थे, की मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा के कारण उनके चाचा अभय से विवाद हो गया। अक्टूबर 2018 में देवीलाल की जयंती के कार्यक्रम में दुष्यंत के समर्थकों ने कथित तौर पर चौटाला की उपस्थिति में अभय के खिलाफ नारेबाजी की।
नवंबर 2018 में अजय चौटाला ने घोषणा की कि वे एक नई पार्टी बनाएंगे और कहा, “मैं इनेलो और चश्मा (पार्टी चिन्ह) को अपने छोटे भाई को उपहार के रूप में सौंपता हूं”। जनवरी 2019 में अजय और दुष्यंत ने जननायक जनता पार्टी (JJP) का गठन किया।
इस विभाजन ने इनेलो को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया। 2005 के बाद से इनेलो हरियाणा में सत्ता में नहीं आई। 2024 के विधानसभा चुनावों में इनेलो को केवल दो सीटें मिलीं, जबकि JJP को एक भी सीट नहीं मिली।
ओम प्रकाश चौटाला की मृत्यु के बाद भी परिवार में एकता की उम्मीदें धूमिल रहीं। 31 दिसंबर 2024 को ‘पगड़ी’ समारोह में अभय को औपचारिक रूप से ओम प्रकाश चौटाला का उत्तराधिकारी घोषित किया गया, जिससे भाइयों के बीच सुलह की गुंजाइश और कम हो गई।

किसान आंदोलन और अंतिम वर्ष
अपने अंतिम वर्षों में भी ओम प्रकाश चौटाला किसानों के मुद्दों पर सक्रिय रहे। दिसंबर 2020 में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर केंद्र के नए कृषि कानूनों को वापस लेने या सभी किसान संगठनों और विशेषज्ञों से सहमति बनने तक निलंबित करने की मांग की।
चौटाला ने लिखा, “यदि आंदोलन बदसूरत रूप ले लेता है, तो इसके दूरगामी परिणाम संभवतः राष्ट्रीय हित में नहीं होंगे”। उन्होंने कहा कि कृषि कानूनों को लागू करने में कोई जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए और न ही इसे ‘अहंकार’ का मामला बनाया जाना चाहिए।
अक्टूबर 2024 में 89 वर्ष की आयु में भी चौटाला ने विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और कभी हार न मानने का रवैया अंत तक बना रहा।
निधन और अंतिम संस्कार
20 दिसंबर 2024 को शुक्रवार की सुबह 89 वर्ष की आयु में ओम प्रकाश चौटाला को गुरुग्राम में उनके निवास पर कार्डियक अरेस्ट हुआ। उन्हें तुरंत मेदांता अस्पताल ले जाया गया जहां उन्होंने दोपहर करीब 12 बजे अंतिम सांस ली।
हरियाणा सरकार ने 20 से 22 दिसंबर तक तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया। इस अवधि के दौरान राज्य भर में जहां नियमित रूप से राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है, वहां आधे झंडे पर फहराया गया। सभी राज्य सरकारी कार्यक्रम रद्द कर दिए गए और कोई आधिकारिक मनोरंजन नहीं हुआ। 21 दिसंबर को सभी राज्य सरकारी कार्यालयों और स्कूलों में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया।
21 दिसंबर 2024 को दोपहर 3 बजे सिरसा जिले के तेजाखेड़ा फार्म हाउस में पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ चौटाला का अंतिम संस्कार किया गया। चौटाला का शव तिरंगे में लपेटा गया था और फार्म हाउस में लोगों को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था।
अंतिम संस्कार में चौटाला के दोनों बेटों – JJP नेता अजय चौटाला और इनेलो नेता अभय चौटाला – ने अपने परिवार के सदस्यों, मित्रों और सैकड़ों पार्टी कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में चिता को अग्नि दी।
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल, हरियाणा विधानसभा के अध्यक्ष हरविंदर कल्याण, कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला और कुमारी सेल्जा सहित विभिन्न पार्टियों के नेता तेजाखेड़ा पहुंचे।
31 दिसंबर 2024 को सिरसा जिले के चौटाला गांव में प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया।
राजनीतिक विरासत और प्रभाव
ओम प्रकाश चौटाला की मृत्यु के साथ हरियाणा की राजनीति का एक युग समाप्त हो गया। पांच दशकों से अधिक समय तक उन्होंने हरियाणा की राजनीति, विशेष रूप से जाट राजनीति को आकार दिया।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शोक संदेश में कहा, “अपने दशकों लंबे सार्वजनिक जीवन में उन्होंने हरियाणा की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई”।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि चौटाला लगातार देवीलाल के काम को आगे बढ़ाने की कोशिश करते रहे।
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा, “एक दूरदर्शी राजनीतिज्ञ के रूप में उन्होंने हमेशा ग्रामीण विकास और कृषि समृद्धि को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। हरियाणा के समग्र विकास और भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने में उनका अविस्मरणीय योगदान हमेशा प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा”।
हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा, “उनके जाने के साथ हरियाणा के राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया है, और उनके जाने से जो शून्य पैदा हुआ है, उसे भरना मुश्किल है”।
पूर्व हरियाणा मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि चौटाला उनके लिए “बड़े भाई जैसे” थे और उनके साथ पारिवारिक और राजनीतिक दोनों क्षेत्रों में मजबूत संबंध थे।
शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि जब किसान न्याय और अस्तित्व के लिए लड़ाई में लगे हैं, ऐसे समय में चौटाला का जाना समाज और विशेष रूप से किसानों और कमजोर वर्गों के लिए बहुत बड़ी क्षति है।
कांग्रेस सांसद कुमारी सेल्जा ने कहा, “यह एक युग का अंत है। वे एक अनुशासित सैनिक थे और अंत तक सक्रिय रहे। वे लोगों की दुर्दशा, उनके दर्द और दुखों को समझते थे। उन्होंने हमेशा अपनी आखिरी सांस तक लोगों के बीच रहना चुना”।

ओम प्रकाश चौटाला का जीवन उतार-चढ़ाव से भरा रहा। बचपन में शिक्षा छोड़ने से लेकर 87 वर्ष की आयु में कक्षा 10 और 12 पास करने तक, पिता द्वारा घर से निकाले जाने से लेकर हरियाणा के पांच बार मुख्यमंत्री बनने तक, और मुख्यमंत्री की कुर्सी से तिहाड़ जेल के सबसे उम्रदराज कैदी बनने तक – उनका जीवन एक असाधारण यात्रा थी।
उन्होंने हरियाणा की राजनीति में गहरी छाप छोड़ी, विशेष रूप से किसानों और ग्रामीण समुदायों के बीच। “सरकार आपके द्वार” जैसे उनके कार्यक्रम आज भी याद किए जाते हैं।
हालांकि, उनका करियर विवादों से भी घिरा रहा – मेहम काण्ड, कंडेला की घटना, और सबसे बढ़कर शिक्षक भर्ती घोटाला। इन विवादों ने उनकी और इनेलो की छवि को नुकसान पहुंचाया, जिससे पार्टी 2005 के बाद कभी सत्ता में नहीं आ सकी।
परिवार में विभाजन और इनेलो का टूटना उनके जीवन का एक दुखद पहलू था, जो उनके पिता देवीलाल के समय की घटनाओं की पुनरावृत्ति थी।
फिर भी, 89 वर्ष की आयु में भी उनका कभी हार न मानने का रवैया, किसानों के प्रति प्रतिबद्धता और राजनीति में सक्रियता उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रमाण थी। ओम प्रकाश चौटाला हरियाणा की राजनीति के अंतिम दिग्गजों में से एक थे, और उनकी मृत्यु के साथ वास्तव में एक युग का अंत हो गया है।



