Editorial Aaj Samaaj | राजीव रंजन तिवारी | मार्क्स, मैकाले और मुगल। मौजूदा भारतीय सियासत में ये तीन शब्द आजकल खूब शोर मचाए हुए हैं। खासकर केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के लोग इसे लेकर तीखी टिप्पणियां कर रहे हैं। आपको बता दें कि ये तीनों शब्द अक्सर भारतीय इतिहास और संस्कृति पर उनके गहरे और विपरीत प्रभावों के संदर्भ में एक साथ देखे जाते हैं, जहां मुगल भारत पर शासन करने वाली एक इस्लामी वंश थी, मैकाले ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली (अंग्रेजी शिक्षा) और नौकरशाही की नींव रखी और मार्क्स (कार्ल मार्क्स) ने अपने सिद्धांतों (साम्यवाद, वर्ग संघर्ष) से भारत के सामाजिक-आर्थिक विचारों को प्रभावित किया। इन तीनों का भारतीय समाज, शिक्षा और राजनीतिक चेतना पर अलग-अलग, लेकिन महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है, जिससे एक जटिल विरासत बनी है। यूं कहें कि मुगल भारत पर शासन करने वाले थे, मैकाले ने शिक्षा और प्रशासन के माध्यम से भारत को बदला और मार्क्स के विचारों ने भारत की वैचारिक और राजनीतिक दिशा को प्रभावित किया।

16वीं से 19वीं सदी तक भारत पर मुगल साम्राज्य का दबदबा रहा, जिसने एक समृद्ध और जटिल संस्कृति, वास्तुकला (ताजमहल, लाल किला) और प्रशासन स्थापित किया। फारसी शाही दरबारी भाषा थी और इसने भारतीय भाषाओं (हिंदी, उर्दू) के विकास को प्रभावित किया। एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में, उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक ताने-बाने और राजनीतिक संरचना को आकार दिया। वहीं लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकाले (1800-1859) एक ब्रिटिश राजनेता, इतिहासकार और भारत में गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषद के सदस्य थे। उन्होंने भारत में अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए एक नीति (मिनट) प्रस्तुत की, जिसका उद्देश्य रक्त और रंग से भारतीय लेकिन स्वाद, विचारों और नैतिकता में अंग्रेज एक वर्ग तैयार करना था, जो ब्रिटिश प्रशासन में मदद कर सके। भारतीय भाषाओं (संस्कृत, अरबी) को महत्व कम करके अंग्रेजी को आधुनिक ज्ञान का माध्यम बनाया, आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली की नींव रखी। इसने भारत में एक अंग्रेजी-शिक्षित मध्यम वर्ग को जन्म दिया, जिसने बाद में स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं दूसरी तरफ कार्ल मार्क्स (1818-1883) एक जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री और क्रांतिकारी थे, जिन्होंने साम्यवाद और वर्ग संघर्ष के सिद्धांत दिए। उनके विचारों ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और बाद के समाजवादी आंदोलनों को प्रभावित किया। भारतीय बुद्धिजीवियों और नेताओं (जैसे अंबेडकर, जो मैकाले की शिक्षा से भी प्रभावित थे) ने मार्क्सवादी विचारों से प्रेरणा ली। कुछ लोग मैकाले और मार्क्स को भारतीय संस्कृति के पश्चिमीकरण और मानसिक गुलामी से जोड़ते हैं, जबकि कुछ अन्य मैकाले को शिक्षा के लोकतंत्रीकरण के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं।
कार्ल मार्क्स का जन्म प्रशिया के राइन प्रांत के ट्रियर नगर में 5 मई, 1818 को हुआ था। मार्क्स के पिता एक वकील थे एवं उनकी प्रारंभिक शिक्षा एक स्थानीय स्कूल जिमनेजियम में पूरी हुई। बोन विश्वविद्यालय से उन्होंने कानून की शिक्षा प्राप्त की। तत्पश्चात् बर्लिन विश्वविद्यालय से दर्शन एवं इतिहास का अध्ययन किया। जेना विश्वविद्यालय से उन्होंने डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। कार्ल मार्क्स हीगल के विचारों से प्रभावित थे। कार्ल मार्क्स ने होली फैमिली नामक पुस्तक प्रकाशित करवाई जिसमें उन्होंने सर्वहारा वर्ग और भौतिक दर्शन की सैद्धांतिक विचारधारा पर सर्वाधिक प्रकाश डाला। मार्क्स ने अपने साम्यवादी घोषणा-पत्र में पूंजीवाद को समाप्त करने का संकल्प लिया था। मार्क्स के अनुसार विश्व में अशांति और असंतोष का कारण गरीबों एवं अमीरों के मध्य का वर्ग संघर्ष ही है। उन्होंने कहा कि उत्तराधिकार की प्रथा का अंत किया जाना चाहिए। मार्क्स का मत था कि आर्थिक एवं सामाजिक समानता हेतु शांतिपूर्वक क्रांति की जानी चाहिए और यदि इससे बदलाव न हो तो सशस्त्र क्रांति की जानी चाहिए। वर्गविहीन समाज की स्थापना करना मार्क्स का प्रमुख उद्देश्य था। 1867 में मार्क्स का प्रथम विश्वविद्यालय ग्रंथ ‘दास कैपिटल’ प्रकाशित हुआ, जिसके द्वारा संपूर्ण विश्व में उन्हें प्रसिद्धि प्राप्त हुई। द पॉवर्टी ऑफ फिलॉसफी भी उनकी प्रसिद्ध पुस्तक है। वर्ष 1883 में मार्क्स की मृत्यु हो गई। मार्क्स महिलाओं के अधिकारों को महत्त्वपूर्ण मानते थे। उनका कहना था कि कोई भी व्यक्ति जो इतिहास की थोड़ी भी जानकारी रखता है, वह यह जानता है कि महान सामाजिक बदलाव बिना महिलाओं का उत्थान किये असंभव है। महिलाओं की सामाजिक स्थिति को देखकर किसी समाज की सामाजिक प्रगति मापी जा सकती है।
अब बात मैकाले की। लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने 1835 में ऐसी शिक्षा नीति लागू की, जिसने भारत की पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था की दिशा बदल दी। उनकी नीति ने भारत की भाषा, शिक्षा और समाज पर गहरा प्रभाव डाला। लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकाले को भारत में आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा का आधार तैयार करने वाले प्रमुख व्यक्तियों में गिना जाता है, उन्होंने 1835 में ऐसी शिक्षा नीति बनाई, जिसने भारतीय शिक्षा व्यवस्था की दिशा पूरी तरह बदल दी। उनका मानना था कि अंग्रेजी भाषा ही विज्ञान, तकनीक और आधुनिक ज्ञान का सबसे प्रभावी माध्यम है, इसलिए उन्होंने भारतीय भाषाओं की जगह अंग्रेजी को टीचिंग का आधार बनाने की सिफारिश की। उनकी नीति का उद्देश्य भारतीय समाज में एक ऐसा वर्ग तैयार करना था जो अंग्रेजों की सोच, संस्कृति और प्रशासनिक प्रणाली को आगे बढ़ा सके। लॉर्ड मैकाले एक जाने-माने अंग्रेज कवि, निबंधकार, इतिहासकार और राजनीतिज्ञ थे, उन्हें भारत में अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली का जनक माना जाता है। 10 जून 1834 को वो भारत आए और गवर्नर जनरल की काउंसिल में कानूनी सदस्य के रूप में कार्यभार संभाला। उनकी क्षमता देखकर तत्कालीन गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक ने उन्हें लोक शिक्षा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया, जहां से उन्होंने भारतीय शिक्षा व्यवस्था में बड़े परिवर्तन की शुरुआत की। उनका प्रमुख काम उस समय चल रहे प्राच्यवादी बनाम पाश्चात्यवादी विवाद को सुलझाना था। इसी मुद्दे पर उन्होंने 2 फरवरी 1835 को अपना प्रसिद्ध मिनट प्रस्तुत किया। इस दस्तावेज ने भारत की शिक्षा नीति का पूरा रुख बदल दिया। विलियम बैंटिक ने इसे स्वीकार करते हुए अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम, 1835 पारित किया, जिसने आधुनिक ब्रिटिश शिक्षा की नींव रखी।
मैकाले ने साफ कहा कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होना चाहिए, क्योंकि उनके अनुसार अंग्रेजी भाषा में विज्ञान, आधुनिक ज्ञान और उपयोगी साहित्य उपलब्ध था. उनकी नीति में स्थानीय भाषाओं जैसे संस्कृत, फारसी और अरबी के महत्व को कम आंका गया। उन्होंने डाउनवर्ड फिल्ट्रेशन थ्योरी दी, जिसके अनुसार पहले उच्च और मध्यम वर्ग को शिक्षित किया जाए ताकि वही आगे आम जनता तक ज्ञान पहुंचा सकें। इसका उद्देश्य ऐसा वर्ग तैयार करना था जो भारतीय होने के बावजूद सोच और व्यवहार में अंग्रेजों जैसा हो और ब्रिटिश शासन को मजबूत बनाए रखने में सहायता करे। मैकाले की इस नीति ने भारत की शिक्षा, भाषा और समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ा, जिसके प्रभाव आज भी कई स्तरों पर महसूस किए जाते हैं।
अब मुगल साम्राज्य की चर्चा। हिन्दुस्तान के इतिहास में 300 सालों से ज्यादा राज करने वाले मुगलों की चर्चा अक्सर होती है। साल 1526 में बाबर ने पानीपत के पहले युद्ध में इब्राहिम लोदी को हराकर मुगल साम्राज्य की स्थापना की थी। बाबर मध्य एशिया के तैमूर और चंगेज खान का वंशज था। बाबर के बाद बेटे हुमायूं और अगली पीढ़ियों जैसे अकबर, जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब जैसे शासकों ने इस साम्राज्य का विस्तार किया। अकबर का शासनकाल (1556–1605) मुगल युग का स्वर्ण काल कहा जाता है। अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता, सुशासन और कला के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। दरबार में बीरबल, तानसेन और अबुल फज़ल जैसे विद्वान थे। वहीं, शाहजहां के शासनकाल में कला और स्थापत्य ने नई ऊंचाइयों को छुआ। ताजमहल इसका उदाहरण है। यह आज भी विश्व धरोहर के रूप में प्रसिद्ध है। मुगल शासन में प्रशासनिक व्यवस्था, कर प्रणाली, भाषा, संगीत और स्थापत्य में प्रगति हुई। फारसी भाषा दरबारी भाषा बनी और हिंदुस्तानी संस्कृति का विकास हुआ, लेकिन औरंगजेब के बाद सल्तनत अपना प्रभाव खोने लगी। यह कमजोरी होने लगी। 18वीं सदी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बढ़ते प्रभाव के साथ मुगल सत्ता का पतन हो होने लगा। बहादुर शाह जफर अंतिम मुगल बादशाह थे, जिन्हें 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया। उन्हें रंगून (अब म्यांमार) निर्वासित किया। यहां 7 नवंबर, 1862 को उनकी मृत्यु हो गई।
खैर, मार्क्स, मुगल और मैकाले से भारत को क्या मिला और क्या नुकसान हुआ, आज के दौर में इस पर बहस करना ठीक नहीं है। हमें आगे बढ़ने के लिए दूर की बात सोचनी होगी। उज्जवल भविष्य की बात करनी होगी। पीछे मुड़कर देखने से कुछ नहीं होता। बहरहाल, जब चर्चा छिड़ ही गई है तो इसकी गूंज दूर तलक जाएगी। देखते हैं, क्या होता है। (लेखक द भारत ख़बर के संपादक हैं।)
यह भी पढ़ें : Editorial Aaj Samaaj: संवेदना और संवाद का पैमाना

