दिल्ली : 6 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। महाराष्ट्र की एक 18 साल की लड़की (जो गर्भ ठहरने के समय नाबालिग थी) को अपनी 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी मेडिकल तरीके से खत्म करने की इजाजत दे दी।
- यह लड़की अपने बॉयफ्रेंड से संबंध के कारण प्रेग्नेंट हुई थी।
- वह गर्भ जारी नहीं रखना चाहती थी, मानसिक दबाव में थी।
- बॉम्बे हाई कोर्ट ने पहले इजाजत नहीं दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को पलट दिया।
कोर्ट ने क्या कहा?
- जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की बेंच ने साफ कहा: “कोर्ट किसी महिला को (खासकर नाबालिग को) उसकी मर्जी के खिलाफ गर्भावस्था पूरी करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।”
- महिला की रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी सर्वोपरि है।
- अगर इजाजत नहीं दी गई तो वह असुरक्षित तरीके से गर्भपात करवा सकती है, जो जानलेवा हो सकता है।
- मुंबई के JJ हॉस्पिटल को सुरक्षित तरीके से प्रक्रिया करने का निर्देश दिया गया।
कानून क्या कहता है? भारत में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट 2021 के तहत:
- 20 हफ्ते तक: महिला खुद फैसला ले सकती है (एक डॉक्टर की राय से)।
- 20-24 हफ्ते तक: कुछ खास मामलों में (जैसे रेप, नाबालिग, मानसिक रूप से अक्षम) दो डॉक्टरों की राय से।
- 24 हफ्ते से ज्यादा: सामान्यतः नहीं, लेकिन कोर्ट विशेष परिस्थितियों में इजाजत दे सकता है (जैसे यहां)।
यह फैसला महिलाओं के अधिकारों के लिए बड़ा कदम माना जा रहा है, क्योंकि यह MTP एक्ट की समय सीमा से आगे जाकर भी महिला की मर्जी को प्राथमिकता देता है।
