कंपनियों को एलपीजी प्रोडक्शन बढ़ाने के आदेश
Middle East Crisis Impact, (द भारत ख़बर), नई दिल्ली: भारत में रसोई गैस की किल्लत बढ़ सकती है। कारण अमेरिका-इजराइल और ईरान जंग। अगर यह जंग बढ़ी तो भारत में रसोई गैस की किल्लत हो सकती है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव से गैस की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। इसी खतरे को देखते हुए सरकार ने ये आदेश जारी किया।
इसमें कहा गया है कि अब रिफाइनयां प्रोपेन और ब्यूटेन का इस्तेमाल सिर्फ रसोई गैस बनाने के लिए करेंगी। सभी कंपनियों को प्रोपेन और ब्यूटेन की सप्लाई सरकारी तेल कंपनियों को करनी होगी। सरकारी तेल कंपनियों में इंडियन आॅयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम शामिल है। इसका मकसद कंज्यूमर्स को बिना रुकावट गैस सिलेंडर की सप्लाई है।
सप्लाई संकट की वजह
- स्ट्रेट आॅफ होर्मुज का लगभग बंद होना: भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती स्ट्रेट आॅफ होर्मुज का बंद होना है। ये करीब 167 किमी लंबा जलमार्ग है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। ईरान जंग के कारण यह रूट अब सुरक्षित नहीं रहा है। खतरे को देखते हुए कोई भी तेल टैंकर वहां से नहीं गुजर रहा। दुनिया के कुल पेट्रोलियम का 20% हिस्सा यहीं से गुजरता है। सऊदी अरब, इराक और कुवैत जैसे देश भी अपने निर्यात के लिए इसी पर निर्भर हैं। भारत अपनी जरूरत का 50% कच्चा तेल और 54% एलएनजी इसी रास्ते से मंगाता है। ईरान खुद इसी रूट से एक्सपोर्ट करता है।
- प्लांट पर ड्रोन हमले से एलएनजी का प्रोडक्शन रुका: पिछले हफ्ते अमेरिका-इजराइल ने ईरान पर स्ट्राइक की थी। इसके जवाब में ईरान ने वअए, कतर, कुवैत और सऊदी जैसे देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों और पोर्ट्स को निशाना बनाया है। ईरान के ड्रोन हमले के बाद भारत को गैस सप्लाई करने वाले सबसे बड़े देश कतर ने अपने एलएनजी प्लांट का प्रोडक्शन रोक दिया है। इससे भारत में गैस की सप्लाई घट गई है। भारत अपनी जरूरत की 40% एलएनजी (करीब 2.7 करोड़ टन सालाना) कतर से ही आयात करता है।
कंपनियों ने सरकार को लिखी चिट्ठी
गैस की किल्लत को देखते हुए एसोसिएशन आॅफ सीजीडी एंटिटीज ने सरकारी कंपनी गेल को पत्र लिखकर स्पष्टता मांगी है। कंपनियों का कहना है कि अगर कतर से आने वाली सस्ती गैस नहीं मिली, तो उन्हें स्पॉट मार्केट से महंगी गैस खरीदनी पड़ेगी।
सीएनजी के दाम बढ़ सकते है
स्पॉट मार्केट में गैस की कीमत फिलहाल 25 डॉलर प्रति यूनिट पहुंच गई है, जो कॉन्ट्रैक्ट वाली गैस से दोगुनी से भी ज्यादा है। कंपनियों को डर है कि अगर सीएनजी के दाम बढ़े, तो लोग परमानेंटली ईवी की ओर शिफ्ट हो जाएंगे, जिससे गैस सेक्टर को नुकसान होगा।
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