एक्टर थलपति विजय ने भी किया एक्टिंग छोड़ने का ऐलान
5 Iconic Actors, (द भारत ख़बर), मुंबई: साउथ से लेकर बॉलीवुड तक, भारतीय सिनेमा का इतिहास गवाह है कि जब भी किसी बड़े अभिनेता ने सत्ता के गलियारे में कदम रखा, तब कई फैंस के दिल टूट गए। थलपति विजय ने भी मलेशिया में एक प्रमोशनल इवेंट के दौरान अपनी आखिरी फिल्म जन नायकन के बाद एक्टिंग छोड़ने का ऐलान कर दिया है। लेकिन अपने पॉलिटिकल करियर के लिए एक्टिंग को छोड़ने वाले थलपति विजय पहले कलाकार नहीं हैं। आइए जानते हैं उन सितारों के बारे में जिन्होंने राजनीति के लिए चमकती मायानगरी को टाटा-बाय-बाय कह दिया था।
- थलपति विजय: भारत के सबसे महंगे एक्टर्स में से एक हैं। उनकी पिछली फिल्में बड़ी ही आसानी से 600 करोड़ का आंकड़ा पार कर रही हैं। लेकिन अपनी पॉलिटिकल पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) के भविष्य के लिए उन्होंने 33 साल लंबे फिल्मी करियर पर पूर्ण विराम लगा दिया है। विजय का कहना है कि वे अब अपनी जिंदगी के अगले 30 साल जनता के नाम करना चाहते हैं।
- एमजी रामचंद्रन (एमजीआर): विजय की तरह उनके आइडल एमजीआर ने भी पॉलिटिक्स के लिए एक्टिंग को अलविदा कहा था। तमिल सिनेमा के इस बेताज बादशाह ने जब राजनीति में कदम रखा, तब उन्होंने फिल्मों की तरह जनता में भी गरीबों के मसीहा के तौर पर अपनी छवि बनाई। एमके करुणानिधि से अलग होकर उन्होंने एआईएडीएमके (आॅल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) बनाई और जब वे मुख्यमंत्री बने, तब उन्होंने फिल्मों से पूरी तरह दूरी बना ली। वे तमिलनाडु के 10 साल तक मुख्यमंत्री रहे और मरते दम तक उन्होंने लोगों के दिलों पर राज किया।
- एनटी रामा राव (एनटीआर): तेलुगु सिनेमा के सुपरस्टार एनटीआर को उनके लाखों फैंस सच में भगवान मानते थे। 1982 में उन्होंने तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) बनाई और महज 9 महीने के अंदर आंध्र प्रदेश की सत्ता पलट दी। राजनीति की खातिर उन्होंने अपने फलते-फूलते करियर को अलविदा कहा, क्योंकि उनके लिए राजनीति कोई साइड बिजनेस नहीं, बल्कि फुल टाइम मिशन था।
- जयललिता: तमिल सिनेमा की क्वीन कही जाने वाली जयललिता ने एमजीआर के साथ कई सुपरहिट फिल्में दीं। लेकिन जब उन्होंने राजनीति को चुना, तब उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1980 के बाद उन्होंने फिल्मों से नाता तोड़ लिया और तमिलनाडु की राजनीति की सबसे शक्तिशाली महिला अम्मा बनकर उभरीं।
- विनोद खन्ना: बॉलीवुड के हैंडसम हंक विनोद खन्ना का मामला थोड़ा अलग था। वे पहले ओशो के पास गए और फिर राजनीति में आए। जब विनोद खन्ना गुरदासपुर से सांसद बने, तब उन्होंने अपने करियर के पीक पर फिल्मों से लगभग दूरी बना ली थी। हालांकि उन्होंने बाद में कुछ फिल्में कीं, लेकिन उनकी प्राथमिकता हमेशा राजनीति और समाज सेवा ही रही।

