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    Home»हरियाणा»जब ताऊ देवीलाल ने विधानसभा में हरियाणवी में बोला- मेरे क्षेत्र की जनता यही भाषा समझती है, पढ़िए हरियाणा बनने की कहानी
    हरियाणा

    जब ताऊ देवीलाल ने विधानसभा में हरियाणवी में बोला- मेरे क्षेत्र की जनता यही भाषा समझती है, पढ़िए हरियाणा बनने की कहानी

    प्रमोद रिसालियाBy प्रमोद रिसालियाNovember 1, 2025No Comments10 Mins Read
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    हरियाणा दिवस स्पेशल: आज, 1 नवंबर 2025 को, हरियाणा गर्व के साथ अपना 60वां स्थापना दिवस मना रहा है। 1 नवंबर 1966 को भाषाई आधार पर संयुक्त पंजाब से अलग होकर अस्तित्व में आया यह राज्य आज भारत की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रगति का एक चमकदार सितारा है। एक समय था जब हरियाणा को रेतीले टीलों और कीकर के जंगलों वाले एक अविकसित और पिछड़े क्षेत्र के रूप में देखा जाता था, जहाँ बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव था। लेकिन पिछले 59 वर्षों के अथक परिश्रम, नवाचार और यहाँ के निवासियों की अदम्य भावना ने हरियाणा को देश के सबसे समृद्ध और गतिशील राज्यों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर दिया है।

    यह कहानी सिर्फ 59 वर्षों की नहीं, बल्कि सदियों के संघर्ष, संस्कृति और साहस की है। यह कहानी है उस भूमि की जिसने महाभारत के युद्ध को देखा, जिसने गीता के ज्ञान को सुना, और जिसने देश की रक्षा के लिए अनगिनत वीर दिए।

    हरियाणा के गठन का लंबा और जटिल संघर्ष

    अलग हरियाणा राज्य का सपना रातों-रात साकार नहीं हुआ। इसके पीछे दशकों का राजनीतिक, सामाजिक और भाषाई संघर्ष छिपा है, जिसने इस क्षेत्र के लोगों की पहचान और आकांक्षाओं को आकार दिया।

    आजादी से पहले की सुगबुगाहट

    अलग हरियाणा की मांग की जड़ें 1920 के दशक में ही पनपने लगी थीं, जब दिल्ली के कुछ मुस्लिम नेताओं ने इस क्षेत्र को पंजाब से अलग कर दिल्ली के साथ मिलाने का प्रस्ताव रखा। हालांकि, यह मांग उस समय जोर नहीं पकड़ सकी। 1930 के दशक में, महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे राष्ट्रीय नेता भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के विचार से सहमत थे, लेकिन 1947 में देश के विभाजन ने उनकी सोच बदल दी। उन्हें डर था कि भाषा के आधार पर राज्यों का गठन देश की नाजुक एकता के लिए खतरा बन सकता है।

    आजादी के बाद और जेवीपी कमेटी

    आजादी के बाद, जब भारत के कई हिस्सों में भाषा के आधार पर अलग राज्यों की मांग जोर पकड़ने लगी, तो कांग्रेस ने इस मुद्दे पर विचार करने के लिए जेवीपी कमेटी (जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, पट्टाभि सीतारमैया) का गठन किया। 1949 में, इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि “भाषा सिर्फ जोड़ने वाली शक्ति नहीं है, बल्कि एक दूसरे से अलग करने वाली ताकत भी है। क्योंकि अभी देश के विकास पर ध्यान देना जरूरी है, इसलिए हर विघटनकारी शक्ति को हतोत्साहित करना जरूरी है।”

    पोट्टि श्रीरामुलु का बलिदान और फजल अली आयोग का गठन

    केंद्र सरकार का यह निर्णय अधिक समय तक टिक नहीं पाया। तेलुगु भाषियों के लिए अलग आंध्र राज्य की मांग को लेकर 58 दिनों तक अनशन करने वाले पोट्टि श्रीरामुलु की 15 दिसंबर 1952 को मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु ने आंदोलन को हिंसक बना दिया और अंततः सरकार को झुकना पड़ा। 1 अक्टूबर 1953 को आंध्र प्रदेश का गठन हुआ।

    इस घटना ने देश भर में भाषाई राज्यों की मांग को और तेज कर दिया। दबाव में आकर केंद्र सरकार ने 22 दिसंबर 1953 को राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया, जिसे इसके अध्यक्ष फजल अली के नाम पर ‘फजल अली आयोग’ भी कहा जाता है। इस आयोग ने देश भर में सैकड़ों शहरों और कस्बों का दौरा किया, हजारों लोगों से मुलाकात की और उनकी आकांक्षाओं को समझा। 1956 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी, लेकिन इसने एक बार फिर अलग हरियाणा की मांग को यह कहकर खारिज कर दिया कि इस प्रस्तावित राज्य के पास अपने विकास के लिए पर्याप्त वित्तीय और प्राकृतिक संसाधन नहीं होंगे।

    सच्चर फॉर्मूला और क्षेत्रीय तनाव

    आयोग की रिपोर्ट से हरियाणा क्षेत्र के लोगों में भारी निराशा हुई, लेकिन आंदोलन रुका नहीं। स्थिति को शांत करने के लिए, संयुक्त पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री भीमसेन सच्चर ने 1 अक्टूबर 1949 को एक फॉर्मूला पेश किया, जिसे “सच्चर फॉर्मूला” के नाम से जाना जाता है। इसके तहत, पंजाब को दो भाषाई क्षेत्रों में विभाजित किया गया:

    1. पंजाबी भाषी क्षेत्र: इसमें पंजाबी को शिक्षा और प्रशासन की मुख्य भाषा बनाया गया।

    2. हिंदी भाषी क्षेत्र: इसमें हिसार, रोहतक, करनाल, गुड़गांव, अंबाला की जगाधरी और नारायणगढ़ तहसीलें और कांगड़ा जिले को शामिल किया गया। यहाँ हिंदी को मुख्य भाषा का दर्जा दिया गया।

    लेकिन यह फॉर्मूला दोनों ही क्षेत्रों की जनता को स्वीकार्य नहीं था। हिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों को लगा कि उन पर पंजाबी थोपी जा रही है, जबकि पंजाबी भाषी क्षेत्र के सिख नेता एक पूर्ण पंजाबी सूबे से कम कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

    प्रताप सिंह कैरों का दौर और आंदोलन का तेज होना

    1956 में, प्रताप सिंह कैरों संयुक्त पंजाब के मुख्यमंत्री बने। वे एक मजबूत और दूरदर्शी नेता थे, लेकिन वे पंजाब के किसी भी तरह के बंटवारे के सख्त खिलाफ थे। उनके कार्यकाल में दो घटनाओं ने अलग हरियाणा के आंदोलन को और हवा दी:

    1. भूमि उपयोग अधिनियम: कैरों ने भूमि उपयोग अधिनियम के तहत अमृतसर और गुरदासपुर के कुछ दलित सिख परिवारों को हरियाणा क्षेत्र के अंबाला और कुरुक्षेत्र में बसा दिया, जिसका स्थानीय दलितों ने भारी विरोध किया।

    2. देवी लाल का विधानसभा में विद्रोह: जब फजल अली आयोग की रिपोर्ट को विधानसभा में स्वीकार किया जा रहा था, तो चौधरी देवी लाल ने इसके विरोध में हरियाणवी में बोलना शुरू कर दिया। जब सदस्यों ने आपत्ति जताई, तो उन्होंने दृढ़ता से कहा, “मेरे क्षेत्र की जनता यही भाषा समझती है, जिसे आप नहीं समझते।” इस घटना ने हरियाणा के लोगों में एक नई चेतना और आत्म-सम्मान की भावना पैदा की।

    हरियाणा दिवस

    संत फतेह सिंह का अनशन और अंतिम चरण

    1960 के दशक में, अलग पंजाबी सूबे की मांग अपने चरम पर थी। अकाली नेता मास्टर तारा सिंह ने 1960 में 48 दिनों तक अनशन किया, लेकिन वे सरकार को झुका नहीं पाए। इसके बाद, संत फतेह सिंह ने इस आंदोलन की कमान संभाली। 1965 में, उन्होंने अनशन शुरू किया और आत्मदाह की धमकी दे दी। भारत-पाकिस्तान युद्ध के कारण उन्होंने अपना अनशन स्थगित कर दिया, लेकिन उनके आंदोलन का दबाव इतना बढ़ गया था कि जनसंघ को छोड़कर लगभग सभी राजनीतिक दलों ने पंजाब के पुनर्गठन का समर्थन कर दिया।

    1966 में, इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री बनीं। उन्होंने इस दशकों पुराने मुद्दे को हल करने का फैसला किया। 23 अप्रैल 1966को, सुप्रीम कोर्ट के जज जेसी शाह की अध्यक्षता में एक सीमा आयोग का गठन किया गया, जिसे पंजाब के भाषाई पुनर्गठन का काम सौंपा गया। इस आयोग ने 31 मई 1966 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।

    पंजाब पुनर्गठन बिल, 1966 को 3 सितंबर 1966 को तत्कालीन गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने लोकसभा में पेश किया। 7 सितंबर को यह बिल लोकसभा से और 10 सितंबर को राज्यसभा से पास हो गया। 18 सितंबर 1966 को राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने इस पर अपनी मुहर लगा दी।

    और इस प्रकार, एक लंबे और थका देने वाले संघर्ष के बाद, 1 नवंबर 1966 को हरियाणा भारत के 17वें राज्य के रूप में दुनिया के नक्शे पर उभरा। चंडीगढ़ को दोनों राज्यों (पंजाब और हरियाणा) की संयुक्त राजधानी बनाया गया, और उच्च न्यायालय, विश्वविद्यालय और बिजली बोर्ड जैसे कुछ संस्थान भी साझा रखे गए।

    हरियाणा: संघर्ष की भूमि, वीरों का प्रदेश

    हरियाणा का इतिहास सिर्फ इसके गठन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शौर्य, बलिदान और संस्कृति की एक समृद्ध गाथा है।

    महाभारत और गीता की जन्मभूमि

    हरियाणा का नाम ही इसके दिव्य संबंध को दर्शाता है – हरि का आना यानी भगवान का आगमन। यह वही पवित्र भूमि है जहाँ कुरुक्षेत्र के मैदान में कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत का युद्ध लड़ा गया था। इसी युद्ध के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का अमर उपदेश दिया, जो आज भी पूरी दुनिया को कर्म, धर्म और जीवन का मार्ग दिखाता है।

    पानीपत की तीन ऐतिहासिक लड़ाइयाँ

    हरियाणा की धरती ने भारत के भाग्य को बदलने वाली तीन ऐतिहासिक लड़ाइयों को भी देखा है:

    • पानीपत की पहली लड़ाई (1526): मुगल आक्रमणकारी बाबर ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को हराकर भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी।

    • पानीपत की दूसरी लड़ाई (1556): अकबर के संरक्षक बैरम खान ने हरियाणा के वीर सम्राट हेम चंद्र विक्रमादित्य (हेमू) को पराजित कर मुगल साम्राज्य को मजबूती प्रदान की।

    • पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761): अफगान आक्रमणकारी अहमद शाह अब्दाली ने मराठा सेना को हराकर भारत में मराठा साम्राज्य के विस्तार को रोक दिया, जिससे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए रास्ता साफ हो गया।

    वीरों की धरती

    हरियाणा को “वीरों की धरती” भी कहा जाता है। भारतीय सेना में हर दसवां सैनिक इसी प्रदेश से आता है। राव तुला राम, बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह, वीर चूड़ामणि और अमर सेनानी राव कृष्ण गोपाल जैसे अनगिनत योद्धाओं ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।

    हरियाणा: प्रगति और समृद्धि का प्रतीक

    गठन के समय हरियाणा एक पिछड़ा हुआ और कृषि पर निर्भर राज्य था, लेकिन आज यह भारत की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख इंजन है।

    कृषि का पावरहाउस

    हरियाणा देश के प्रमुख अन्न भंडारों में से एक है। हरित क्रांति में इसकी भूमिका अभूतपूर्व रही। आज, यह देश में बासमती चावल के निर्यात में 60% से अधिक का योगदान देता है। यहाँ की उपजाऊ भूमि और मेहनती किसान देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।

    भारत का ऑटो हब

    हरियाणा भारत का सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल हब है। मारुति सुजुकी, होंडा, हीरो मोटोकॉर्प और एस्कॉर्ट्स जैसे प्रमुख ब्रांडों के विनिर्माण संयंत्र यहीं स्थित हैं। देश में बनने वाली दो-तिहाई कारें, 50% ट्रैक्टर और 60% मोटरसाइकिलें हरियाणा में ही बनती हैं।

    ज्ञान और प्रौद्योगिकी का केंद्र

    गुरुग्राम (गुड़गांव) आज दुनिया भर में एक प्रमुख आईटी और कॉर्पोरेट हब के रूप में जाना जाता है। हरियाणा सूचना प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी और ज्ञान आधारित उद्योगों के लिए एक आकर्षक गंतव्य बन गया है।

    खेलों में सिरमौर

    हरियाणा को “भारत की मेडल फैक्ट्री” कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है। ओलंपिक, कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों में हरियाणा के खिलाड़ियों का दबदबा रहता है। कुश्ती, बॉक्सिंग, भाला फेंक और हॉकी जैसे खेलों में सुशील कुमार, विजेंदर सिंह, साक्षी मलिक, बजरंग पूनिया, विनेश फोगाट और नीरज चोपड़ा जैसे सितारों ने देश का नाम दुनिया भर में रोशन किया है।

    अंतरिक्ष तक हरियाणा की बेटी

    करनाल में जन्मी कल्पना चावला अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला बनीं। उन्होंने दुनिया भर की लाखों लड़कियों को बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने की प्रेरणा दी। भले ही एक दुखद हादसे में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है।

    हरियाणा की राजनीतिक यात्रा

    हरियाणा का राजनीतिक परिदृश्य हमेशा से ही गतिशील और दिलचस्प रहा है। चौधरी देवी लाल, बंसीलाल और भजनलाल की तिकड़ी ने दशकों तक राज्य की राजनीति को परिभाषित किया। वर्तमान में, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राज्य में सत्ता में है और नायब सिंह सैनी मुख्यमंत्री हैं। अक्टूबर 2024 में हुए विधानसभा चुनावों में, भाजपा ने लगातार तीसरी बार जीत हासिल कर इतिहास रचा।

    59 वर्षों की छोटी सी अवधि में, हरियाणा ने पिछड़ेपन से समृद्धि, संघर्ष से सफलता और रेत के टीलों से लेकर गगनचुंबी इमारतों तक का एक अविश्वसनीय सफर तय किया है। यह राज्य भारत की “कर सकते हैं” भावना (can-do spirit) का एक जीवंत प्रमाण है। आज जब हरियाणा अपना 60वां स्थापना दिवस मना रहा है, तो यह न केवल अपनी पिछली उपलब्धियों का जश्न मनाने का, बल्कि एक और भी उज्ज्वल और समृद्ध भविष्य की ओर देखने का अवसर है। यह उस अदम्य भावना को सलाम करने का दिन है जो हर हरियाणवी के दिल में बसती है।

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    प्रमोद रिसालिया
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    प्रमोद रिसालिया एक अनुभवी राजनीतिक पत्रकार हैं, जो 'भारत खबर' वेब पोर्टल से जुड़े हुए हैं। उन्हें जमीनी राजनीति की बारीक समझ और तेज विश्लेषण के लिए जाना जाता है। प्रमोद लगातार राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग और विश्लेषण करते हैं। उनकी लेखनी में तथ्यों की सटीकता और जन सरोकारों की गहराई साफ झलकती है। राजनीतिक घटनाक्रमों की रिपोर्टिंग के साथ-साथ वे चुनावी विश्लेषण और सत्ता के समीकरणों पर भी पैनी नजर रखते हैं।

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