करीब चार दशक पुराने सेवा विवाद पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई के दौरान इस्तीफा देने वाले कर्मचारी को उस अवधि का कोई बैक वेज या एरियर नहीं मिलेगा, जब वह सेवा से बाहर रहा हो। अदालत ने ‘नो वर्क-नो पे’ के सिद्धांत को लागू करते हुए कर्मचारी की नियमित द्वितीय अपील को खारिज कर दिया और लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद का निर्णायक अंत कर दिया।
यह फैसला जस्टिस नमित कुमार की पीठ ने सुनाया, जिसमें अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता 30 अप्रैल 1987 से लेकर ट्रायल कोर्ट के आदेश के बाद पुनः ज्वाइनिंग तक की अवधि के लिए किसी भी प्रकार के बकाया वेतन का दावा नहीं कर सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस्तीफा देने के बाद कर्मचारी सेवा में नहीं था, इसलिए उसे उस अवधि का वेतन देने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।
मामले की शुरुआत एक अक्टूबर 1974 को हुई थी, जब कर्मचारी की नियुक्ति हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार में रिसर्च असिस्टेंट के रूप में हुई थी। दिसंबर 1986 में कर्मचारी पर जानबूझकर अनुपस्थित रहने, आचरण नियमों का उल्लंघन करने और राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगे, जिसके चलते विभागीय चार्जशीट जारी की गई। प्रारंभिक जांच रिपोर्ट कर्मचारी के पक्ष में थी, लेकिन बाद में नए जांच अधिकारी की नियुक्ति की गई, जिससे विवाद और गहरा गया।
16 अप्रैल 1987 को कर्मचारी ने एक ही दिन दो पत्र दिए, जिनमें एक पत्र में जांच प्रक्रिया का विरोध किया गया और दूसरे पत्र में इस्तीफा दिया गया। बाद में 16 मई 1987 को संबंधित प्राधिकारी ने इस्तीफा स्वीकार कर लिया। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी की कमी का हवाला देते हुए इस्तीफा स्वीकार करने के आदेश को रद्द कर दिया और कर्मचारी को निरंतर सेवा में माना, जिससे विवाद और लंबा खिंच गया।
द्वितीय अपील के दौरान अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या कर्मचारी सेवा से बाहर रहने की अवधि के लिए वेतन पाने का हकदार है। इस पर न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि कर्मचारी द्वारा दिया गया इस्तीफा बिना किसी शर्त के था और उसमें किसी प्रकार की शर्त या प्रतिबंध का उल्लेख नहीं किया गया था। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि एक ही दिन दो अलग-अलग पत्र देना संस्थागत अनुशासन के अनुरूप नहीं माना जा सकता और यह विभागीय कार्रवाई पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाने जैसा प्रतीत होता है।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी माना कि आरोप गंभीर प्रकृति के थे और हालांकि ट्रायल कोर्ट के आदेश के बाद कर्मचारी को पुनः सेवा में शामिल होने की अनुमति दी गई, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उसे सेवा से बाहर रहने की अवधि का वेतन भी दिया जाए। न्यायालय ने ‘नो वर्क-नो पे’ के सिद्धांत को लागू करते हुए बैक वेज देने से स्पष्ट इनकार कर दिया और कहा कि प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि या अवैधता नहीं है।
इस फैसले को सेवा कानून के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट हो गया है कि यदि कोई कर्मचारी अनुशासनात्मक कार्रवाई के दौरान स्वयं इस्तीफा देता है, तो बाद में उसे उस अवधि का वेतन पाने का अधिकार नहीं होगा, जब वह सेवा में नहीं था। यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक उदाहरण के रूप में काम करेगा और सरकारी व अर्धसरकारी संस्थानों में अनुशासन बनाए रखने में मदद करेगा।

