पिछले दो दिन से जारी हैं पाबंधियां, खामेनेई की हत्या के बाद सड़कों पर उतर आए थे लोग
Jammu-Kashmir Breaking News (द भारत ख़बर), जम्मू/श्रीनगर : घाटी में सुरक्षा के मद्देनजर पिछले दो दिन से जारी पाबंद आज भी जारी रहेंगे। इसका उद्देश्य केवल प्रदेश में शांति व्यवस्था को बनाए रखना होगा। ज्ञात रहे कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद घाटी के कुछ हिस्सों में हुए विरोध प्रदर्शन हुए थे। जिसके बाद स्थिति को काबू में करने के लिए पुलिस को सख्त कदम उठाने पड़े थे। जिसके बाद से घाटी में कुछ विशेष पाबंदियां लागू कर दी गई थीं। जाकि आज यानि बुधवार को भी जारी रहेंगी।
केंद्र ने राज्यों को लिखा था पत्र
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते संघर्ष को देखते हुए भारत सरकार सतर्क हो गई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 28 फरवरी को सभी राज्यों को पत्र लिखकर एहतियात बरतने को कहा है। सरकार को आशंका है कि विदेश की घटनाओं का असर भारत में सांप्रदायिक तनाव के रूप में दिख सकता है। राज्यों को धार्मिक कार्यक्रमों और सभाओं में दिए जाने वाले भाषणों पर नजर रखने और भड़काऊ बयान पर तुरंत कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।
घाटी में पाबंधियों का तीसरा दिन
यह लगातार तीसरा दिन होगा जब प्रतिबंध लागू रहेंगे।सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए यह फैसला एहतियातन लिया गया है। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार मंगलवार को स्थिति ज्यादातर शांत रही, लेकिन एहतियात के तौर पर पाबंदियां जारी रखने का निर्णय किया गया है। जम्मू-कश्मीर ने पुंछ में अहले सुन्नत और इस्लामिक संगठनों ने बंद बुलाया है। यहां पर बाजार बंद हैं। बस सेवा बंद है। सभी जगह सुरक्षबलों की तैनाती है। इससे पहले जम्मू-कश्मीर में सोमवार को लगातार दूसरे दिन ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत पर विरोध प्रदर्शन हुए। श्रीनगर के बेमिना इलाके में सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया और आंसू गैस भी छोड़ी। कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया। शोपियां, बारामूला, बांदीपोरा में लोगों ने बाजार बंद रखा।
सोनिया गांधी ने सरकार पर उठाए सवाल
कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी की चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने मंगलवार को मोदी सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की टारगेटेड हत्या पर उनकी चुप्पी न्यूट्रल नहीं बल्कि सरेंडर है। यह रवैया भारत की फॉरेन पॉलिसी की दिशा और क्रेडिबिलिटी पर शक पैदा करता है।
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