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    नेपाल में नई सरकार के लिए चुनौतियों का पहाड़

    अंकित कुमारBy अंकित कुमारMarch 6, 2026No Comments8 Mins Read
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    Editorial Aaj Samaaj: नेपाल में नई सरकार के लिए चुनौतियों का पहाड़
    Editorial Aaj Samaaj: नेपाल में नई सरकार के लिए चुनौतियों का पहाड़

    Editorial Aaj Samaaj | राजीव रंजन तिवारी | राजीव रंजन तिवारी नेपाल में चुनाव संपन्न हो गया है। मतगणना का आखिरी दौर भी खत्म हो चुका है। नई सरकार के गठन का रास्ता धीरे-धीरे साफ गया है। इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन वजहों से नेपाल में उथल-पुथल मचा और वहां आगजनी-हिंसा हुई थी, क्या वह अब ठीक हो जाएगा। इसे लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है।

    जानकार मानते हैं कि तमाम कोशिशों के बावजूद नेपाल में नई सरकार के लिए चुनौतियां कम होने वाली नहीं हैं। वजह स्पष्ट है, जिस जेन-जी ने वहां बवाल किया, उसे उकसाने के लिए विपक्षी पार्टियां पीछे नहीं रहेंगी। परिणाम, नकारात्मक ही रहने के आसार हैं। मसलन, नई सरकार के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। सबसे पहले यह समझते हैं कि नेपाल में बीते वर्ष बवाल क्यों हुआ।

    राजीव रंजन तिवारी, संपादक, द भारत ख़बर।

    बीते वर्ष इस हिमालयी राष्ट्र में भड़के विरोध प्रदर्शनों के तह तक पहुंचने पर पता चलेगा कि वहां के बवाल के पीछे पांच मुख्य वजहें रहीं। पहला, नेपाल के उस संकट के लिए कुछ विश्लेषकों ने ओली प्रशासन के चार सितंबर को दिए गए आदेश को ज़िम्मेदार माना, जिसमें फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, ट्विटर, यूट्यूब और एक्स सहित 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। सरकार का कहना था कि बार-बार चेतावनी देने के बावजूद इन टेक कंपनियों ने नेपाल के क़ानूनों और नियमों का पालन नहीं किया। सोशल मीडिया पर इन प्रतिबंधों के कारण उन लाखों नेपाल के युवा यूज़र्स को असुविधा हुई, जो इनका प्रयोग ज़रूरी जानकारी हासिल करने और कम्युनिकेशन के लिए करते थे। इस बड़ी असुविधा ने उन्हें आक्रोशित कर दिया।

    दूसरा मुख्य कारण माना गया देश में कथित व्याप्त भ्रष्टाचार को। विरोध प्रदर्शन में जेन-ज़ी प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार ख़त्म करो और सोशल मीडिया नहीं, भ्रष्टाचार पर प्रतिबंध लगाओ लिखे हुए प्लेकार्ड भी दिखाए। इसके बाद जैसे-जैसे प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ती गई, उनमें से कुछ नेपाल के मंत्रालयों के मुख्यालय, सिंह दरबार और संसद परिसर की दीवारों पर चढ़ने लगे,

    जिसके बाद पुलिस कार्रवाई शुरू हो गई। पुलिस के दागे गए आंसू गैस के गोलों, रबड़ की गोलियों और फ़ायरिंग में देश भर में कई प्रदर्शनकारी मारे गए। इसी क्रम में 9 सितंबर को जो कुछ हुआ वो अब नेपाल के इतिहास में दर्ज हो गया। इस दिन बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और देखते ही देखते यह पूरे देश में फैल गया। प्रदर्शनकारियों ने नेपाल के कई दिग्गज नेताओं को भ्रष्ट बताते हुए उनके घरों पर हमला कर दिया और आग लगा दी। इस दौरान भी जबरदस्त हिंसा हुई।

    तीसरा महत्वपूर्ण बात यह देखने को मिली कि नेपाल के युवा देश छोड़कर दूसरी जगह नौकरी की तलाश में जा रहे हैं। इस विस्थापन और अप्रवास को भी नाराजगी का बड़ा वजह माना गया। हालांकि नेपाल की अर्थव्यवस्था में कोविड के बाद सुधार दिखने लगा है। पर्यटन क्षेत्र में बढ़ोतरी देखी जा रही है, लेकिन काम की तलाश में नेपाल के लोगों का बड़ी संख्या में विदेश जाना जारी है।

    इससे विदेश में रह रहे नेपाल के कामगारों के पैसे भेजने का सिलसिला भी बढ़ा है। हालांकि राजनीतिक उथल-पुथल और तोड़फोड़ के पीछे विस्थापन को भी कारण माना गया। नेपाल की एक बड़ी जनसंख्या कृषि, पर्वतारोहण और ट्रैकिंग जैसी पर्यटन गतिविधियों में काम कर रही है, लेकिन यह स्थिति तेज़ी से बदल रही है। नेपाल के युवा बड़ी संख्या में बेहतर अवसर की तलाश में विदेश जा रहे हैं। लगभग 30 लाख नेपाल के लोग विदेश में रहते हैं। लाखों नेपाली पड़ोसी देश भारत के छोटे-बड़े शहरों में रहकर काम करते हैं।

    चौथा कारण नेपाल में उद्योग धंधों की कमी को माना गया। नेपाल में बहुत ज़्यादा उद्योग नहीं है और विदेशी निवेश आकर्षित करने का सरकारी प्रयास भी बहुत उत्साहजनक नहीं दिखाई दिया। नेपाल की मौजूदा नौकरशाही में बड़े निवेशकों के लिए काम करना मुश्किल है। राजनीतिक अस्थिरता के कारण देश के प्रमुख सरकारी पदों पर बार-बार बदलाव होते रहे हैं।

    ये निवेशकों के लिहाज से एक बेहतर स्थिति नहीं है। देश में ज़्यादा सैलरी वाली नौकरियां देने वाले उद्योग कम हैं, ऐसे में नेपाल के युवा विदेश का रुख़ कर रहे हैं, जहां उन्हें बेहतर नौकरी और सैलरी मिले। नेपाल के युवा पिछले दिनों पारंपरिक रोज़गार से अलग रूसी सेना में भर्ती होने तक चले गए थे।

    नेपाल में उच्च शिक्षा के लिए पर्याप्त विश्वविद्यालय और शैक्षणिक संस्थान तो हैं, लेकिन यहां हो रही राजनीति के कारण मध्यम वर्ग के छात्र सिडनी, वेलिंगटन या फिर लंदन जाने के लिए मजबूर हुए हैं। इस मुद्दे पर भी युवाओं में गुस्सा दिखा। खास बात यह है कि इसे लेकर गुस्सा अभी भी लोगों में है।

    पांचवा मामला घुसपैठ का समझा गया। पुलिस की गोलीबारी में 19 लोगों के मारे जाने के तुरंत बाद तत्कालीन ओली सरकार के प्रवक्ता पृथ्वी सुब्बा गुरुंग ने जेन ज़ी के विरोध प्रदर्शन में हुई अराजकता और उसके बाद हुई हिंसा के लिए निहित स्वार्थी समूहों द्वारा घुसपैठ को ज़िम्मेदार ठहराया।

    हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि किन समूहों ने इस विरोध प्रदर्शनों में घुसपैठ की। जेन ज़ी के प्रदर्शनकारियों ने भी बताया कि उनके विरोध प्रदर्शनों को घुसपैठियों ने हाईजैक कर लिया। नेपाल पिछली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तब सुर्खियों में आया था जब राजशाही समर्थक राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी और दुर्गा प्रसैन (विवादास्पद व्यवसायी) के नेतृत्व वाले समूह ने इस साल मार्च के अंत में काठमांडू में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए थे।

    साल 2025 में जेन-जी के विरोध प्रदर्शन के बाद नेपाल में पहला आम चुनाव हो चुका है। नेपाल में प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) के लिए हुए चुनावों के नतीजे बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के पक्ष में आते दिख रहे हैं। वहीं, देश की पुरानी और बड़ी पार्टियां जैसे नेपाली कांग्रेस और सीपीए-यूएमएल काफी पिछड़ती हुई नजर आ रही हैं। चुनाव आयोग के अनुसार, वोटों की गिनती गुरुवार देर रात शुरू हुई।

    यह स्टोरी लिखे जाने तक मतों की गिनती जारी थी। नेपाल में गुरुवार को हुए मतदान में करीब 60 प्रतिशत वोटिंग हुई। यह चुनाव नेपाल के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि पिछले साल केपी शर्मा ओली की गठबंधन सरकार को हटाने के लिए युवाओं (जेन-जी) ने हिंसक विरोध प्रदर्शन किए थे। उस बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल के बाद देश में यह पहला चुनाव है। शुरुआती रुझान संकेत दे रहे हैं कि जनता इस बार पारंपरिक पार्टियों के मुकाबले नए चेहरों पर ज्यादा भरोसा जता रही है।

    दरअसल, नेपाल के लोग अपनी डेमोक्रेसी को गंभीरता से लेते हैं। शायद यही वजह रही कि बड़ी संख्या में लोगों ने वोट दिया। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि लगभग सात दशक पहले से शुरू हुई यहां की चुनावी प्रक्रिया के परिणाम अपेक्षित नहीं रहे हैं। शायद ही कोई सरकार हो जो इस दम्यान अपना कार्यकाल पूरी की हो। यह देश गृह संघर्ष, विचारधारा के विरोध और बेअसर गठबंधनों की वजह से टूटता चला गया।

    खैर, चुनाव हो गया है। यहां बड़ा राजनीतिक उलटफेर दिख रहा है। पारंपरिक दलों के लिए खतरे की घंटी बज गई है। यह चुनाव पिछले साल हुए बड़े राजनीतिक तख्तापलट के बाद हुआ है, जब जेन-जी के नेतृत्व वाले हिंसक प्रदर्शनों ने केपी शर्मा ओली की सरकार को गिरा दिया था।

    इस दरम्यान सबसे ज्यादा चर्चा काठमांडू के लोकप्रिय मेयर और पूर्व रैपर बालेन शाह की पार्टी राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी की हो रही है। नई पार्टी होने के बावजूद उन्होंने जबर्दस्त बढ़त बनाई है। समझा जा रहा है कि इस बार नेपाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। जानकार मानते हैं कि वर्षों तक नेपाली पॉलिटिक्स पर तीन पॉलिटिकल पार्टियों का दबदबा रहने के बाद वोटर्स बदलाव चाहते थे।

    ज़ोरदार कैंपेनिंग के दौरान सबसे ज़्यादा फ़ायदा राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को हुआ, जिसके पॉलिटिकल अवतार में काठमांडू के मेयर बने रैपर बालेन शाह हैं। मतदान के दौरान लोगों ने संकेत दिया था कि वे आरएसपी के सिंबल द बेल को चुन रहे हैं। खैर, नेपाल में चुनाव खत्म हो गया है।

    अब देखने वाली बात यह है कि जिन मुद्दों को लेकर देश में बीते वर्ष हिंसा भड़की थी, क्या अब वह ठंडी हो जाएगी। मतलब ये कि नई सरकार के लिए यह किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। देश में रोजी, रोजगार, कारोबार, शिक्षा और स्वास्थ्य का मुद्दा बेहद गंभीर है। इसे दुरूस्त करना किसी भी सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती से कम नहीं है। इसके अलावा युवाओं को संतुष्ट करना भी अपने आप में किसी बड़ी समस्या है। इसके लिए ठोस रणनीति बनाकर काम करना होगा। फिर सवाल यही है कि नई सरकार देश के युवाओं को किस तरह से संतुष्ट करेगी। (लेखक द भारत ख़बर और इंडिया न्यूज के संपादक हैं।)

    यह भी पढ़ें : Editorial Aaj Samaaj: इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में खुले संभावनाओं के द्वार

     

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    अंकित कुमार

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