UNSC, (द भारत ख़बर), बेरूत: संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी सुरक्षा परिषद के काम करने के तरीके और इसके कुछ देशों के ही सदस्य होने पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि सुरक्षा परिषद आज भी 1945 के समय में ही फंसी है, जब इसे बनाया गया था। हमें यह मानना होगा कि सुरक्षा परिषद का मौजूदा ढांचा 1945 की दुनिया को दर्शाता है और वर्तमान में भी यह उस समय की दुनिया का प्रतिनिधित्व कर रही है जो इस वैश्विक संस्थान के साथ एक बड़ी समस्या है।
वीटो पावर के कारण रुक जाते हैं कई फैसले
यूएन महासचिव ने बेरूत में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते कहा कि वीटो पावर की वजह से कई महत्वपूर्ण फैसले रुक जाते हैं। उन्होंने कहा कि 15 देशों वाली इस परिषद में पांच स्थायी सदस्य हैं। अफ्रीका व लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों का इसमें स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं है। 15 देशों में से पांच स्थायी सदस्यों में 3 यूरोप से हैं, एक एशिया से और एक अमेरिका है।
एशिया से केवल चीन स्थायी सदस्य शामिल
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने कहा, हैरानीजनक यह है कि लैटिन अमेरिका और अफ्रीका जैसे बड़े क्षेत्रों का कोई भी देश सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि एशिया की दौलत व आबादी विश्व में बहुत अधिक है, इसके बावजूद यहां से केवल चीन ही यूएनएससी में बतौर स्थायी सदस्य शामिल है।
बीच में ही रुक जाते हैं शांति के प्रयास
सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाते हुए ने कहा कि ‘वीटो’ पावर के कारण परिषद उचित समय पर जरूरी फैसले नहीं ले पाती है। उन्होंने कहा, जब भी किसी युद्ध को रोकने की आवश्यकता होती है, कोई न कोई स्थायी सदस्य वीटो का इस्तेमाल कर देता है, जिसके कारण फैसला रुक जाता है। नतीजतन शांति के प्रयास बीच में ही रुक जाते हैं।
यूएनएससी में भारत भी कर रहा सुधार की मांग
बता दें कि रूस, चीन, फ्रांस, अमेरिका और ब्रिटेन के पास वीटो की ताकत है। सुरक्षा परिषद के अन्य 10 सदस्य दो वर्ष के लिए चुने जाते हैं और उनके पास वीटो का अधिकार नहीं होता है। भारत भी गत कई वर्षों से यूएनएससी में सुधार की मांग कर रहा है। भारत भी कई बार कह चुका है कि 1945 में बनी सुरक्षा परिषद की व्यवस्था 21वीं सदी की जमीनी हकीकत व राजनीति से मेल नहीं खाती।
आपस में पूरी तरह बंटे हैं परिषद के सदस्य
भारत ने कई बार जोर दिया है कि वह सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का पूरा हकदार है। आखिरी बार नई दिल्ली 2021-22 में अस्थाई सदस्य के तौर पर सुरक्षा परिषद का हिस्सा था। वर्तमान में सुरक्षा परिषद दुनिया में शांति बरकरार रखने में विफल साबित हो रही है। इजरायल-हमास संघर्ष, यूक्रेन युद्ध और अब ईरान के खिलाफ चल रही जंग जैसे बड़े मुद्दों पर सुरक्षा परिषद के सदस्य आपस में पूरी तरह बंटे हुए हैं।
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