कहा-अगर कोई सेक्युलर काम प्रभावित हो रहा है, तो सरकार दखल दे सकती है
Sabarimala Women Entry Case, (द भारत ख़बर), नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, धार्मिक कामों के नाम पर सड़कें ब्लॉक नहीं की जा सकतीं। कोर्ट ने कहा कि किसी संप्रदाय को पूजा के तरीके में आॅटोनॉमी है और वह उसके धार्मिक मामलों पर फैसला नहीं दे सकता। लेकिन अगर कोई सेक्युलर काम प्रभावित हो रहा है, तो सरकार दखल दे सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी केरलम के सबरीमाला मंदिर सहित अन्य संप्रदायों के धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए की।
किसी धार्मिक पंथ के अधिकारों में दखल नहीं दे सकती सरकार
वहीं कोर्ट में हिंदू धर्म आचार्य सभा की ओर से पेश वकील अक्षय नागराजन ने कहा कि सरकार आर्टिकल 25(2)(ए) के तहत आधार बताकर किसी धार्मिक पंथ के अधिकारों में दखल नहीं दे सकती। संविधान का आर्टिकल 25(2)(ए) राज्य को धार्मिक रीति-रिवाजों से जुड़ी आर्थिक, फाइनेंशियल, राजनीतिक या दूसरी सेक्युलर एक्टिविटी को रेगुलेट या रोकने का अधिकार देता है।
नागराजन ने कहा कि आर्टिकल 25 के तहत सुरक्षा सिर्फ़ धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं है, बल्कि आस्था के बाहरी रूपों, जैसे किसी खास देवता की पूजा से जुड़े रीति-रिवाजों, समारोहों और प्रथाओं तक भी फैली हुई है।
अगर कोई सेक्युलर एक्टिविटी धार्मिक गतिविधियों से प्रभावित होती है, तो राज्य दखल दे सकता है
इन दलीलों पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर कोई सेक्युलर एक्टिविटी धार्मिक गतिविधियों से प्रभावित होती है, तो राज्य दखल दे सकता है। मस्जिद दरगाह में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ दलील दे रहे एडवोकेट निजाम पाशा ने कहा कि कोई व्यक्ति हिजाब को धार्मिक रूप से अनिवार्य मान सकता है, लेकिन स्कूल के नियम अलग हो सकते हैं। मतलब धार्मिक विश्वास हमेशा संस्थागत नियमों से ऊपर नहीं होगा।
पैगंबर की परंपरा भी धार्मिक प्रथा का हिस्सा
पाशा ने कहा, अगर किसी मोहल्ले की मस्जिद सबके लिए खुली हो तो भी कोई जाकर घंटी नहीं बजा सकता। आरती नहीं कर सकता, क्योंकि उस जगह की अपनी धार्मिक मर्यादा है। कुरान बहुत संक्षिप्त है। उसमें हर प्रथा डिटेल में नहीं लिखी। पैगंबर की परंपरा भी धार्मिक प्रथा का हिस्सा है।
मतलब सिर्फ किताब में लिखा होना ही जरूरी अधिकार तय नहीं करता। 23 अप्रैल को पिछली सुनवाई में आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कोर्ट से कहा था कि इस्लाम महिलाओं को नमाज के लिए मस्जिद आने से नहीं रोकता, लेकिन यह बेहतर है कि वे घर पर ही इबादत करें।
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