Nagarmal Bajoria Death News: बिहार के भागलपुर की राजनीति और सामाजिक जीवन में अपनी अलग पहचान बनाने वाले नागरमल बाजोरिया अब नहीं रहे। उन्हें लोग प्यार से ‘धरती पकड़’ कहते थे। उनका पटना में इलाज के दौरान गुरुवार को उनका निधन हो गया। वह करीब 97 वर्ष के थे। नागरमल बाजोरिया की सबसे खास पहचान उनका चुनावी सफर था। उन्होंने ग्राम पंचायत से लेकर विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति चुनाव तक में अपनी किस्मत आजमाई। उन्होंने अपनी जिंदगी में 284 चुनाव लड़कर अनोखा रिकॉर्ड बना दिया।
लाहौर में जन्म, आजादी से पहले भागलपुर आए
नागरमल बाजोरिया का जन्म लाहौर में हुआ था। देश के बंटवारे और आजादी से पहले उनका परिवार भागलपुर आकर बस गया था। इसके बाद भागलपुर ही उनकी कर्मभूमि बन गया। शहर के एमपी द्विवेदी रोड इलाके में वह लंबे समय से रह रहे थे। स्थानीय व्यापारिक और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों के बीच उनकी मजबूत पहचान थी। उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी काफी नाम कमाया। लगातार चुनाव लड़ने और हार के बावजूद मैदान न छोड़ने की वजह से उन्हें ‘धरती पकड़’ नाम मिला। चुनाव उनके लिए सिर्फ सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं था। उनके करीबी लोगों के अनुसार वह लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम आदमी की भागीदारी को महत्व देते थे। वह खुद को चुनाव हारने वाला नहीं मानते थे, बल्कि उनका कहना था कि जनता हारती है।
पंचायत से राष्ट्रपति भवन तक चुनावी सफर
नागरमल बाजोरिया का चुनावी सफर बेहद अनोखा था। उन्होंने स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों से शुरुआत की और बाद में विधानसभा, विधान परिषद तथा लोकसभा चुनावों में भी उम्मीदवार बने। वह राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के चुनावों में भी कई बार नामांकन दाखिल कर चुके थे। यह साफ है कि उन्होंने सैकड़ों बार चुनावी मैदान में उतरकर एक असाधारण रिकॉर्ड बनाया था। ‘धरती पकड़’ सिर्फ स्थानीय चुनावों तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने देश के बड़े नेताओं के खिलाफ भी चुनाव लड़ा। वह इंदिरा गांधी के खिलाफ रायबरेली और राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी से चुनाव मैदान में उतर चुके थे। इसके अलावा उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे बड़े नेताओं के खिलाफ भी चुनाव लड़ने की कोशिश की थी। साल 2012 में उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में भी नामांकन दाखिल किया था। इस चुनाव में वह प्रणब मुखर्जी के खिलाफ उम्मीदवार बने थे। हालांकि उनका नामांकन स्वीकार नहीं हुआ था।
क्या नागरमल बाजोरिया कभी चुनाव जीते थे?
नागरमल बाजोरिया को आमतौर पर ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है, जिसने सैकड़ों चुनाव लड़े लेकिन जीत हासिल नहीं की। हालांकि उनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ रिपोर्ट्स में एक अपवाद का जिक्र मिलता है। बाजोरिया ने खुद एक पुराने इंटरव्यू में दावा किया था कि करीब 30 वर्ष की उम्र में उन्होंने भागलपुर नगरपालिका का चुनाव जीता था, लेकिन बाद में पार्षद का पद छोड़ दिया था। उनके चुनावी सफर का हिस्सा हार और नामांकन के लिए चर्चित रहा।
गधों के साथ करते थे चुनाव प्रचार
नागरमल बाजोरिया का चुनाव प्रचार भी आम नेताओं से बिल्कुल अलग था। वह कई बार गधों को साथ लेकर प्रचार करने निकलते थे और तांगे पर बैठकर लोगों के बीच जाते थे। उनके इस अनोखे अंदाज की वजह से चुनाव के दौरान वह आसानी से लोगों का ध्यान खींच लेते थे। उनका प्रचार किसी बड़े राजनीतिक दल की तरह नहीं होता था। वह अपने तरीके से चुनाव मैदान में उतरते, नामांकन दाखिल करते और लोगों के बीच अपनी बात रखते थे। इसी वजह से वह भागलपुर ही नहीं, बल्कि बिहार के बाहर भी एक अलग तरह के चुनावी किरदार के रूप में पहचाने जाने लगे।
चुनाव के साथ समाज सेवा भी करते थे
नागरमल बाजोरिया की पहचान सिर्फ चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति की नहीं थी। वह समाज सेवा के कामों में भी सक्रिय रहते थे। स्थानीय लोगों के अनुसार उन्होंने जरूरतमंद परिवारों की मदद की, गरीब कन्याओं की शादी में सहयोग दिया और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों की पढ़ाई में मदद की। जरूरत वाले इलाकों में चापाकल लगवाने जैसे कामों में भी उनकी भूमिका बताई जाती है। वह गोवध के खिलाफ अभियान से भी जुड़े रहे। भागलपुर के सामाजिक और कारोबारी संगठनों में उनके साथ लंबे समय तक काम करने वाले लोग बताते हैं कि चुनावी पहचान के अलावा सामाजिक गतिविधियां भी उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं। जीवन के अंतिम दौर में नागरमल बाजोरिया ने चुनावी राजनीति से दूरी बना ली थी। स्वास्थ्य संबंधी कारणों से वह पहले की तरह चुनावों में सक्रिय नहीं रहे, लेकिन समाज से उनका जुड़ाव बना रहा।

