नई दिल्ली. ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा को एक बड़ा झटका लगा है. दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया है. उन्होंने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) की ओर से जारी नोटिस को चुनौती दी थी. नोटिस में उन्हें शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का बॉन्ड और एक जमानतदार पेश करने का निर्देश दिया गया था. हाईकोर्ट ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वह कार्यवाही में जिन दस्तावेजों और सामग्री पर भरोसा कर रहे हैं. सभी नेहा बोरा को उपलब्ध कराएं.
यह मामला 16 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस की ओर से की गई निवारक कार्रवाई से जुड़ा है. याचिका में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत जारी निवारक नोटिस को चुनौती देते हुए संबंधित कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई थी. नेहा बोरा की ओर से दलील दी गई थी कि पुलिस की यह कार्रवाई उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है.
अदालत ने मजिस्ट्रेट को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 135 के दायरे और प्रभावों पर विचार करने को कहा. खास तौर पर यह देखने का निर्देश दिया गया कि क्या नेहा बोरा से कार्यवाही की शुरुआत में ही बॉन्ड भरने की मांग की जा सकती है. इस पर जांच के दौरान फैसला लिया जाना चाहिए. अदालत के निर्देश के मुताबिक इस पहलू पर विचार करते समय यह भी देखना होगा कि बाद में हुई घटनाओं से शांति भंग होने का कोई खतरा सामने आया है या नहीं. BNSS की धारा 135 के तहत जांच शुरू होने के बाद, यदि तत्काल निवारक कदम जरूरी माने जाते हैं, तो मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति को शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने का निर्देश दे सकता है।
नेहा बोरा ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से जारी उस नोटिस को चुनौती दी थी. इसमें उनसे शांति बनाए रखने के लिए 10000 रुपये का बॉन्ड भरने को कहा गया था. दिल्ली पुलिस ने याचिका का विरोध करते हुए दलील दी थी कि इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता. यह नोटिस 16 अक्टूबर को दिल्ली में ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च में शामिल होने के बाद नेहा बोरा को एहतियातन हिरासत में लिए जाने के बाद जारी किया गया था. इस मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की थी. हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए मजिस्ट्रेट को कार्यवाही में संबंधित सामग्री उपलब्ध कराने और बॉन्ड की जरूरत पर कानून के अनुसार विचार करने के निर्देश दिए हैं.

