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    Home»Breaking News»राजग का संकल्प बनाम महागठबंधन का प्रण
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    राजग का संकल्प बनाम महागठबंधन का प्रण

    अंकित कुमारBy अंकित कुमारOctober 31, 2025No Comments6 Mins Read
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    Editorial Aaj Samaaj
    Editorial Aaj Samaaj: राजग का संकल्प बनाम महागठबंधन का प्रण

    Editorial Aaj Samaaj | राकेश सिंह | बिहार में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। 2025 के चुनाव में मुख्य मुकाबला राजग (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) यानी एनडीए और महागठबंधन के बीच है। दोनों गठबंधनों ने अपने घोषणा पत्र जारी कर दिए हैं। एनडीए का संकल्प पत्र और महागठबंधन का तेजस्वी का प्रण नाम से जारी दस्तावेज वोटरों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सवाल ये है कि कौन सा गठबंधन किस पर भारी पड़ रहा है? क्या ये वादे हकीकत में बदलेंगे या सिर्फ चुनावी लॉलीपॉप हैं?

    राकेश सिंह, प्रबंध संपादक, आईटीवी नेटवर्क।

    बिहार की राजनीति हमेशा से रोचक रही है। यहां विकास, रोजगार, किसान और महिलाओं के मुद्दे चुनाव जीतने की कुंजी होते हैं। एनडीए में बीजेपी, जेडीयू और अन्य सहयोगी हैं, जबकि महागठबंधन में आरजेडी, कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां शामिल हैं। दोनों पक्षों ने युवाओं को नौकरी, महिलाओं को आर्थिक मदद और इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर दिया है। लेकिन क्या ये वादे पिछले चुनावों की तरह हवा में उड़ जाएंगे या जमीन पर उतरेंगे? एनडीए ने 31 अक्टूबर 2025 को अपना घोषणा पत्र जारी किया। इसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा और अन्य नेताओं की मौजूदगी में बड़े वादे किए गए। मुख्य फोकस युवाओं, महिलाओं, किसानों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर है।

    सबसे बड़ा वादा है एक करोड़ सरकारी नौकरियां और रोजगार के अवसर पैदा करना। एनडीए का कहना है कि अगले पांच सालों में ये लक्ष्य हासिल होगा। इसके लिए हर जिले में मेगा स्किल सेंटर खोले जाएंगे, जहां युवाओं को ट्रेनिंग दी जाएगी। साथ ही, 10 नए इंडस्ट्रियल पार्क हर जिले में बनाए जाएंगे। डिफेंस कॉरिडोर और सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग पार्क जैसे प्रोजेक्ट से औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलेगा। महिलाओं के लिए ‘लखपति दीदी’ योजना पर जोर है। एक करोड़ महिलाओं को उद्यमी बनाने का लक्ष्य है, जिसमें दो लाख रुपये की आर्थिक मदद दी जाएगी। गरीब परिवारों को 125 यूनिट मुफ्त बिजली और 50 लाख नए घर देने का वादा भी है। किसानों के लिए पीएम-किसान योजना के तहत 9,000 रुपये सालाना मदद और सभी फसलों पर एमएसपी की गारंटी।

    इंफ्रास्ट्रक्चर में सात नए एक्सप्रेसवे, 3,600 किमी रेल ट्रैक का आधुनिकीकरण और पटना, दरभंगा, पूर्णिया, भागलपुर में अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट। मेट्रो रेल चार शहरों में आएगी। स्वास्थ्य के लिए हर जिले में मेडिकल कॉलेज और एक वर्ल्ड-क्लास मेडिसिटी। शिक्षा में 5,000 करोड़ रुपये से मॉडल स्कूल अपग्रेड होंगे। कुल मिलाकर, 9 लाख करोड़ रुपये का निवेश इंफ्रास्ट्रक्चर में।

    एनडीए का दावा है कि ये वादे ‘विकसित बिहार’ की दिशा में हैं। पीएम मोदी की गारंटी और नीतीश कुमार की गवर्नेंस पर भरोसा जताया गया है। लेकिन सवाल है, क्या ये हकीकत बनेंगे? पिछले चुनावों में एनडीए ने आईटी हब बनाने का वादा किया था, लेकिन ज्यादा प्रगति नहीं हुई।

    महागठबंधन ने कुछ दिन पहले अपना घोषणा पत्र जारी किया, जिसका नाम बिहार का तेजस्वी प्रण है। तेजस्वी यादव को सीएम फेस बनाया गया है। फोकस सामाजिक सुरक्षा, नौकरियां और किसानों पर है। रोजगार में बड़ा वादा है हर परिवार को एक नौकरी देना, वो भी 20 दिनों के अंदर। कुल एक करोड़ नौकरियां पैदा करने का लक्ष्य। महिलाओं को 2,500 रुपये महीना आर्थिक मदद। पुरानी पेंशन स्कीम बहाल करना, बुजुर्गों को पेंशन और फसलों पर एमएसपी। टॉडी कारोबार को बढ़ावा और वक्फ कानून में बदलाव का वादा भी है। सामाजिक न्याय पर जोर देते हुए एससी/एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के लिए स्पेशल पैकेज। इंफ्रास्ट्रक्चर में ज्यादा डिटेल नहीं, लेकिन विकास और नौकरियों पर फोकस। तेजस्वी का कहना है कि ये वादे ‘बिहार के विकास के लिए हैं, सरकार बनाने के लिए नहीं’। उन्होंने एनडीए पर भ्रष्टाचार और अपराध का आरोप लगाया। महागठबंधन का घोषणा पत्र 2020 के वादों का अपग्रेड लगता है। जैसे, हर परिवार को नौकरी कैसे देंगे? बजट कहां से आएगा?

    अब सवाल है, कौन सा घोषणा पत्र ज्यादा मजबूत है? आइए मुद्दों पर तुलना करें। रोजगार और युवा के मुद्दे पर दोनों ने एक करोड़ नौकरियों का वादा किया। एनडीए में स्किल सेंटर और इंडस्ट्रियल पार्क से रोजगार पर फोकस है। महागठबंधन में हर परिवार को एक जॉब, लेकिन समय सीमा (20 दिन) अव्यावहारिक लगती है। यहां एनडीए भारी पड़ता है, क्योंकि उनके पास केंद्र की मदद है। लेकिन दोनों के वादे लॉलीपॉप जैसे लगते हैं, क्योंकि बिहार में बेरोजगारी ऊंची है और पिछले वादे पूरे नहीं हुए। महिला सशक्तिकरण का मुद्दा भी गंभीर है। एनडीए की लखपति दीदी योजना में दो लाख रुपये मदद और एक करोड़ महिलाओं को उद्यमी बनाना है। महागठबंधन में 2,500 रुपये महीना। महागठबंधन का वादा ज्यादा डायरेक्ट कैश ट्रांसफर जैसा है, जो तत्काल मदद दे सकता है। लेकिन एनडीए का लंबे समय का प्लान बेहतर लगता है। दोनों हकीकत में कितने काम करेंगे, ये देखना बाकी है।

    किसान और कृषि के उत्थान के लिए दोनों ने एमएसपी की गारंटी दी। एनडीए में पीएम-किसान में बढ़ोतरी और एक लाख करोड़ के निवेश की बात कही है। महागठबंधन में भी एमएसपी है, लेकिन ज्यादा डिटेल नहीं। यहां एनडीए आगे है। लेकिन एमएसपी का वादा केंद्र का मुद्दा है, राज्य स्तर पर कितना असर होगा? इंफ्रास्ट्रक्चर एनडीए का मजबूत पक्ष है। एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, मेट्रो जैसे बड़े प्रोजेक्ट एनडीए के पास है। महागठबंधन में इस पर कम फोकस है। अगर विकास की बात हो तो एनडीए भारी है। लेकिन पिछले वर्षों में बिहार में सड़कें और बिजली सुधरी हैं, पर अभी भी कमी है। एनडीए में शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कृति पर वादे, जैसे फिल्म सिटी और स्पोर्ट्स सिटी की बात कही गई है। महागठबंधन में सामाजिक सुरक्षा जैसे पेंशन और वक्फ कानून की बात है। महागठबंधन जाति-आधारित राजनीति पर जोर देता है, जबकि एनडीए विकास पर।

    कुल मिलाकर, एनडीए का घोषणा पत्र ज्यादा डिटेल्ड और इंफ्रास्ट्रक्चर-ओरिएंटेड है, जो उन्हें भारी बनाता है। महागठबंधन का फोकस सोशल सिक्योरिटी पर है, जो गरीब वोटरों को लुभा सकता है। लेकिन दोनों में लॉलीपॉप की महक है। जैसे, एक करोड़ नौकरियां कैसे आएंगी? बिहार का बजट तीन लाख करोड़ है, ऐसे में बड़े वादों के लिए केंद्र पर निर्भरता। पिछले चुनावों में एनडीए ने कुछ वादे पूरे किए, जैसे बजट बढ़ाना, लेकिन आईटी हब नहीं बना। महागठबंधन 2020 में सत्ता से बाहर रहा, तो उनके वादों का टेस्ट नहीं हुआ। वादे सुनने में अच्छे लगते हैं, लेकिन हकीकत में कितने उतरते हैं? बिहार में प्रवास की समस्या बड़ी है। एनडीए का दावा है कि अगर सत्ता में आए तो कोई बाहर नहीं जाएगा। लेकिन पिछले 20 सालों में सुधार हुआ, पर अभी भी लाखों युवा बाहर जाते हैं।

    महागठबंधन का कहना है कि एनडीए ने भ्रष्टाचार बढ़ाया। लेकिन दोनों पक्षों में आंतरिक कलह है। महागठबंधन में कांग्रेस-आरजेडी की सीटों पर झगड़ा, जबकि एनडीए एकजुट दिखता है। बिहार को जरूरत है स्थिर सरकार की, जो विकास पर फोकस करे। अंत में, चुनाव घोषणा पत्रों से नहीं, नेताओं की नीयत से जीते जाते हैं। दोनों गठबंधन अपने-अपने तरीके से बिहार को बेहतर बनाने का दावा कर रहे हैं। वोटर तय करेंगे कि कौन हकीकत है और कौन लॉलीपॉप।(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रबंध संपादक हैं।)

    यह भी पढ़ें : Editorial Aaj Samaaj: बिहार में पीके और ओवैसी कितने दमदार?

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