कहा, बैंकों को वित्तीय संकट से निकालने के लिए आईबीसी में किए अहम बदलाव
Nirmala Sitharaman (द भारत ख़बर), नई दिल्ली : देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक बार फिर से बैंकों की महत्ता और इनके मजबूतीकरण पर लोकसभा में विस्तार से चर्चा की। वित्त मंत्री ने बताया कि कैसे देश की आर्थिक वृद्धि में बैंकिंग सेक्टर का अहम योगदान है। उन्होंने बताया कि सार्वजनिक बैंक हर देशवासी के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसके साथ ही इन बैंकों के मजबूत आर्थिक ढांचे पर ध्यान देने की बहुत ज्यादा जरूरत है।
वित्त मंत्री ने कहा कि इसके लिए सरकार लगातार प्रयासरत है। इसी के चलते आईबीसी देश के बैंकिंग क्षेत्र के स्वास्थ्य में सुधार लाने में एक मुख्य और बहुत ही महत्वपूर्ण कारक रहा है, और उन्होंने आगे कहा कि बैंकों ने समाधान प्रक्रिया के माध्यम से आधे से अधिक एनपीए (गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों) की वसूली कर ली है।
अगस्त 2025 में पेश किया गया था संशोधन विधेयक
12 अगस्त, 2025 को सरकार ने लोकसभा में दिवालियापन और दिवालिया संहिता (आईबीसी) में संशोधन करने के लिए विधेयक पेश किया, जिसमें दिवालियापन समाधान आवेदनों की स्वीकृति में लगने वाले समय को कम करने के प्रावधानों सहित कई बदलावों का प्रस्ताव किया गया। इस विधेयक को लोकसभा की एक चयन समिति को भेजा गया था, जिसने दिसंबर 2025 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। आईबीसी में अब तक सात बार संशोधन किया जा चुका है।
कई बड़े बदलावों की तैयारी में सरकार
केंद्र सरकार ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता में बड़े बदलावों का प्रस्ताव रखते हुए स्पष्ट किया है कि प्रक्रिया में देरी की मुख्य वजह अत्यधिक मुकदमेबाजी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में कहा कि प्रस्तावित संशोधनों के जरिए इस दुरुपयोग पर लगाम लगाने के लिए दंडात्मक प्रावधान लाए जा रहे हैं। वित्त मंत्री ने बताया कि नए बिल के तहत, किसी कंपनी में डिफॉल्ट स्थापित होने के बाद इन्सॉल्वेंसी आवेदन को 14 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से स्वीकार करना होगा।
इससे मामलों के निपटान में तेजी आएगी और लंबित मामलों का बोझ कम होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आईबीसी प्रक्रिया में श्रमिकों के हित सुरक्षित हैं और उनके बकाया भुगतान को प्राथमिकता दी जाती है। सरकार का कहना है कि संशोधन इस सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करेंगे। सदन में पेश प्रस्ताव के अनुसार, आईबीसी में कुल 12 संशोधन किए जा रहे हैं। इनमें ग्रुप इन्सॉल्वेंसी और क्रॉस-बॉर्डर इन्सॉल्वेंसी के लिए सक्षम प्रावधान शामिल हैं, जिससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मामलों के समाधान में भी स्पष्टता आएगी।
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