
Satluj Movie Controversy: OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 से फिल्म ‘सतलुज’ को हटाए जाने को लेकर मचे विवाद के बीच, केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने उन आरोपों को खारिज कर दिया है कि इस फैसले में BJP या केंद्र सरकार शामिल थी। उन्होंने कहा कि यह कदम पूरी तरह से प्लेटफॉर्म का अपना एडिटोरियल और बिजनेस से जुड़ा फैसला था, जिसमें सरकार का कोई दखल नहीं था।
पत्रकारों से बात करते हुए बिट्टू ने कहा कि कुछ राजनीतिक पार्टियां बिना किसी ठोस आधार के BJP को इस मामले में घसीटने की कोशिश कर रही हैं। उनके मुताबिक, फिल्म को हटाने के लिए सरकार को दोषी ठहराना राजनीतिक मकसद से प्रेरित है और यह इस बात को नजरअंदाज करता है कि डिजिटल स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म कैसे काम करते हैं।
OTT प्लेटफॉर्म अपने एडिटोरियल फैसले खुद लेते हैं
थिएटर में रिलीज होने वाली फिल्मों और डिजिटल स्ट्रीमिंग सेवाओं के बीच अंतर बताते हुए बिट्टू ने कहा कि OTT प्लेटफॉर्म अपनी एडिटोरियल, कानूनी और कमर्शियल नीतियों के तहत काम करते हैं। फिल्म को रिलीज करने, बनाए रखने या हटाने से जुड़े फैसले प्लेटफॉर्म खुद लेते हैं, सरकार नहीं।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि स्ट्रीमिंग कंपनियों को अपनी आंतरिक गाइडलाइंस और कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के अनुसार अपनी कंटेंट लाइब्रेरी को मैनेज करने का अधिकार है।
फिल्म एक नए टाइटल के साथ रिलीज हुई थी
यह फिल्म मूल रूप से ‘पंजाब 95’ टाइटल के तहत बनाई गई थी और मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित है। इसमें पंजाब में उग्रवाद के दौर की घटनाओं को दिखाया गया है और इसे 3 जुलाई को ZEE5 पर ‘सतलुज’ नाम से रिलीज किया गया था।
हालांकि, रिलीज के सिर्फ दो दिन बाद, 5 जुलाई को फिल्म को अचानक प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया, जिससे राजनीतिक बहस छिड़ गई और सोशल मीडिया पर भी खूब चर्चा हुई।
‘इतिहास को सभी नजरियों से देखा जाना चाहिए’
इस बड़ी बहस पर टिप्पणी करते हुए बिट्टू ने कहा कि पंजाब के इतिहास को सिर्फ एक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उग्रवाद के दौर में आम नागरिकों, पुलिसकर्मियों, सरकारी कर्मचारियों और अनगिनत परिवारों को बहुत दुख झेलना पड़ा था।
उन्होंने अपील की कि ऐसे संवेदनशील ऐतिहासिक मुद्दों पर चर्चा अफवाहों या राजनीतिक नैरेटिव के बजाय वेरिफाइड तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। बिट्टू के अनुसार, गलत जानकारी और बेवजह के राजनीतिक विवाद को रोकने के लिए इतिहास का संतुलित और सबूतों पर आधारित ब्योरा पेश करना जरूरी है।
