इस बार बजट में साफ दिखाई दिया कि वर्तमान समय में सरकार संकट महसूस कर रही
Budget 2026 Review (द भारत ख़बर), बिजनेस डेस्क : गत दिवस जब वित्त मंत्री निर्मल सीतारमण संसद में बजट पेश कर रहीं थी तो पूरे देश की निगाहें उनपर थीं। हालांकि यह बात पहले ही स्पष्ट हो चुकी थी कि इस बार बजट मे आर्थिक सुधारों पर फोकस होगा। वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री भी यह ईशारा कर चुके थे कि बजट विकसित भारत 2047 को लेकर खाका तैयार करेगा लेकिन जब वित्त मंत्री बजट पेश करने संसद भवन पहुंची तो लोगों को उम्मीद थी कि बजट में कुछ न कुछ आम आदमी के लिए जरूर होगा।
विशेषज्ञों ने बजट के बाद अपने विचार पेश करते हुए कहा कि यह आम लोगों का बजट नहीं है। इसको आम लोगों का बजट नहीं माना जा रहा है। उनके लिए दिवाली का तोहफा पिछले साल सितंबर में आ चुका है। तो वह उत्सव हो गया। यह उसी उत्सव का असर है। यह उसी उत्सव का बिल है।
देश पर चढ़े कर्ज को कम करना जरूरी
आप मान सकते हैं कि एक देश की सरकार कर्ज में दबी हुई है। अगर राज्य सरकार अगर एक कंपनी हो और उसे बाजार में सूचीबद्ध (लिस्ट) किया जाए तो उनको कौन खरीदेगा। मतलब उनकी बैलेंसशीट में नुकसान दिख रहा होगा और वह पार्टी कर रही होगी। बिल्कुल वैसी स्थिति है। तो ये उस सुधार का बजट है। बहुत सारे अंतर्निहित सुधार हैं। बहुत सारे ऐसे भी उपाय हैं, जिनसे चीजें राजकोषीय स्तर पर ठीक होंगी। कई सारे दांव-पेंच हैं। कई बार लोकलुभावन कदम उठाए जाते हैं, तो उससे किस तरह से बजट का जो मूल तत्व पूरी तरीके से कंप्रोमाइज होता है।
इसलिए लोकलुभावन बजट पेश नहीं किया
इस बजट में आप योजनाओं के हिसाब से देखें तो सरकार लोकलुभावन नहीं है। केंद्र सरकार कुछ करने लगती है तो राज्य सरकारें बाद में वही करने लगती हैं। उम्मीद थी कि जब कर्ज का संकट इतना बड़ा है, तो वित्त मंत्री केंद्र और राज्य सरकारों की एक राजकोषीय समिति घोषणा कर सकती हैं। यह बजट संकेत दे रहा है कि भारत ने जीडीपी के अनुपात में अपना कर्ज कम नहीं किया है। अगर केंद्र और राज्य सरकारों का कर्ज मिला लिया जाए। जनता का कर्ज भी मिला लिया जाए और कॉपोर्रेट का कर्ज भी मिला लीजिए।
हम जीडीपी के अनुपात में 100 फीसदी से ऊपर बैठे हुए हैं या इसके आसपास हैं। लेकिन जो आंकड़ा होता है उसमें सरकारों (केंद्र और राज्य) का सार्वजनिक कर्ज होता है। इसमें निजी कर्ज शामिल नहीं होता। उस संकट की झलक परोक्ष रूप से छिपाकर इस बजट में दिखती है। इसीलिए वित्त मंत्री ने इस बार राजकोषीय घाटा से ज्यादा यह कहा कि हम अगले पांच साल में जीडीपी के अनुपात में भारत का कर्ज घटाएंगे। यह उसी को रेखांकित करता हुआ दिखता है।
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