सीएसई की ताजा रिपोर्ट में तथ्य आए सामने
Delhi Breaking News (द भारत ख़बर), नई दिल्ली : राजधानी दिल्ली में प्रदूषण बहुत जटिल समस्या का रूप धारण कर चुका है। सरकार के लाख प्रयास के बावजूद यह थमने का नाम नहीं ले रहा और पिछले दो माह से ज्यादा समय से देश की राजधानी गैस चैंबर के रूप में तबदील हो चुकी है। यह समस्या केवल इस साल की नहीं है बल्कि हर साल यह समस्या राजधानी के सामने आती है। वहीं सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की एक ताजा स्टडी के मुताबिक दिल्ली में प्रदूषण के पीछे सबसे बड़ा कारण दिल्ली की सड़कों पर बढ़ रही वाहनों की संख्या है।
रिपोर्ट का सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि दिल्ली में पीएम 2.5 के ऊंचे स्तर की सबसे बड़ी वजह वाहन उत्सर्जन है। एनसीआर में मौजूद एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशनों से मिले रियल-टाइम डेटा के आधार पर किए गए विश्लेषण में सामने आया कि दिल्ली के स्थानीय प्रदूषण में लगभग आधा योगदान सिर्फ वाहनों से आता है। यानी राजधानी की सड़कों पर बढ़ते वाहन अब सबसे बड़ा प्रदूषण स्रोत बन चुके हैं।
दिल्ली के साथ एनसीआर के हालात भी खराब
दिसंबर में पीएम 2.5 के स्तर में सबसे तेज बढ़ोतरी नोएडा में दर्ज की गई, जहां इसमें 38 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसके बाद बल्लभगढ़ में 32 प्रतिशत, बागपत में 31 प्रतिशत और दिल्ली में 29 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई। यह दिखाता है कि एनसीआर के कई हिस्सों में हवा की गुणवत्ता एक साथ बिगड़ी है।
सीएसई की रिपोर्ट में नए खुलासे
दिल्ली की खतरनाक वायु गुणवत्ता के लिए अब तक जिस पराली जलाने को सबसे बड़ा दोषी माना जाता रहा है, उस धारणा पर एक नई रिपोर्ट ने सवाल खड़े कर दिए हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की एक ताजा स्टडी के मुताबिक, पराली जलाने का दौर खत्म होने के बाद भी दिल्ली में पीएम 2.5 का स्तर कम नहीं हुआ, बल्कि दिसंबर महीने में यह और ज्यादा गंभीर हो गया। अध्ययन में अक्तूबर और नवंबर को “अर्ली विंटर” अवधि के रूप में देखा गया है, जब खेतों में आग का प्रभाव सबसे ज्यादा रहता है। इसके मुकाबले दिसंबर को “पोस्ट-फार्म फायर” चरण माना गया, जब पराली जलाने का असर लगभग नगण्य हो जाता है।
दिसंबर में ज्यादा गंभीर हुई स्थिति
रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर में पूरे एनसीआर में फैला स्मॉग न सिर्फ व्यापक था, बल्कि पराली जलाने वाले महीनों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर रहा। रिपोर्ट यह भी बताती है कि दिल्ली की हवा में मौजूद पीएम 2.5 का पूरा बोझ सिर्फ राजधानी से नहीं आ रहा। 1 से 15 दिसंबर के बीच दिल्ली का योगदान कुल पीएम 2.5 में सिर्फ 35 प्रतिशत रहा, जबकि 65 प्रतिशत प्रदूषण आसपास के एनसीआर जिलों और उससे भी दूर के इलाकों से आया। यह आंकड़ा साफ करता है कि समस्या केवल स्थानीय नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्तर की है।
पराली के असर का आंकलन कैसे हुआ
पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण के योगदान का आकलन करने के लिए सीएसई ने पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सिस्टम आॅफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फॉरकास्टिंग एंड रिसर्च से प्राप्त अनुमानों का इस्तेमाल किया। इन आंकड़ों से यह स्पष्ट हुआ कि पराली का असर सीमित समय तक रहता है। जबकि सर्दियों में वाहन और अन्य स्थानीय स्रोत लंबे समय तक प्रदूषण को बनाए रखते हैं।
ये भी पढ़ें : Delhi Pollution News : राजधानी में न हुई बारिश न मिली प्रदूषण से राहत

