- चयन प्रक्रिया की समीक्षा के भी निर्देश दिए
Supreme Court, (द भारत ख़बर), नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सेना की शॉर्ट सर्विस कमीशन महिला अधिकारियों के पक्ष में आज बड़ा फैसला सुनाया। जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जवल भुईयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि सेना में केवल पुरुषों का एकाधिकार नहीं हो सकता। महिला अधिकारी भी सेना में स्थायी कमीशन की हकदार हैं और और जिनकी सर्विस खत्म हुई है उन्हें पेंशन भी मिलेगी।
महिला अफसरों ने खटखटाया था अदालत का दरवाजा
दरअसल, सुचेता एडन समेत अन्य कई महिला अधिकारियों ने स्थायी कमीशन देने में पुरुषों के मुकाबले उनके साथ भेदभाव करने के सेना व केंद्र सरकार पर आरोप लगाए थे और शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं ने केंद्र की स्थायी कमीशन से जुड़ी 2019 की पॉलिसी और आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल के फैसलों को चुनौती दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को इसी को लेकर महिला अफसरों की याचिका पर सुनवाई हुई और अदालत ने भारतीय सेना में महिलाओं के खिलाफ होने वाले प्रणालीगत भेदभाव को स्वीकार करते हुए अपनी विशेष संवैधानिक शक्तियों (अनुच्छेद 142) का इस्तेमाल कर आर्मी में शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत सेवा देने वाली उन महिला अधिकारियों के हक में फैसला सुनाया जिन्हें स्थायी कमीशन से वंचित रखा गया था।
‘आपरेशन सिंदूर’ का हिस्सा रहीं अधिकारी भी थीं शामिल
विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाली महिला अफसरों में ‘आपरेशन सिंदूर’ का हिस्सा रहीं अधिकारी भी शामिल थीं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, आर्मी में सिर्फ पुरुषों का एकाधिकार नहीं हो सकता, मंिहला अधिकारी भी सेना में स्थायी कमीशन की बराबर की हकदार हैं और जिनकी सर्विस समाप्त हुई है उन्हें पेंशन भी मिलेगी। जजों ने भविष्य में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के मकसद से चयन प्रक्रिया की समीक्षा के भी निर्देश दिए हैं।
20 साल की सेवा के बराबर माना जाएगा पेंशन पाने का हकदार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन महिला अफसरों ने अपनी सेवा से हटाए जाने के मामले को कोर्ट में चुनौती दी थी, उन्हें 20 साल की सर्विस के बराबर पेंशन पाने का हकदार माना जाएगा। साथ ही मामले की सुनवाई कर रही शीर्ष कोर्ट की पीठ स्पष्ट किया कि सेना में महिलाओं के खिलाफ प्रणालीगत भेदभाव के कारण उन्हें स्थायी कमीशन नहीं मिल पाया।
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