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    जनजातियों के विकास के लिए योजनाओं का क्रियान्वयन जरूरी

    अंकित कुमारBy अंकित कुमारMarch 13, 2026No Comments8 Mins Read
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    Editorial Aaj Samaaj
    Editorial Aaj Samaaj: जनजातियों के विकास के लिए योजनाओं का क्रियान्वयन जरूरी

    Editorial Aaj Samaaj | राजीव रंजन तिवारी | भारत में जनजातीय (अनुसूचित जनजाति) की आबादी मुख्य रूप से प्रकृति के करीब, गरीब और सामाजिक-आर्थिक रूप से हाशिए पर जीवन व्यतीत कर रही है। वे गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण, स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव और विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापन जैसी गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हैं। यद्यपि संवैधानिक आरक्षण और सरकारी योजनाओं से सुधार आ रहा है, लेकिन अभी भी मुख्यधारा से उनकी दूरी बनी हुई है। इसके लिए विभिन्न राज्य सरकारों व केंद्र सरकार द्वारा तमाम योजनाएं लाई गईं हैं। सवाल यही है कि क्या सिर्फ योजनाओं से उनके जीवन स्तर में सुधार हो जाएगा। शायद नहीं। इसके लिए योजनाओं का क्रियान्वयन भी जरूरी है।

    केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने बीते दिनों लोकसभा में बताया कि संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) हर साल राष्ट्रीय स्तर पर मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) जारी करता है। मानव विकास सूचकांक जन्म के समय जीवन प्रत्याशा, स्कूली शिक्षा के अपेक्षित औसत वर्ष और प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय के आधार पर मापता है। यूएनडीपी द्वारा जिस आधिकारिक लिंक पर एचडीआई जारी किया गया है, वह मानव विकास रिपोर्ट है। यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट 2025 के अनुसार भारत के लिए मानव विकास सूचकांक 2010 में 0.590, 2015 में 0.633 से बढ़कर 2023 में 0.685 हो गया।

    सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) द्वारा किए गए घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण (एचसीईएस) 2023-24 के अनुसार, ग्रामीण और शहरी अनुसूचित जनजातियों द्वारा औसत मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय (एमपीसीई) क्रमशः 3363 रुपये और 6030 रुपये है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा प्रकाशित घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण (एचसीईएस) के लिए घरेलू तथ्य-पत्र के अनुसार ग्रामीण भारत में 2023-24 में औसत अनुमानित एमपीसीई 4,122 रुपये और शहरी भारत में 6,996 रुपये है।

    अनुसूचित जनजातियों के लिए अखिल भारतीय औसत मासिक प्रति व्यक्ति व्यय (एमपीसीई) ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में समय के साथ वृद्धि दिखाई है। 2011-12 में अनुसूचित जनजातियों के लिए औसत एमपीसीई ग्रामीण क्षेत्रों में 1122 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 2193 रुपये था। यह 2022-23 तक काफी बढ़ गया, ग्रामीण क्षेत्रों में ₹3016 और शहरी क्षेत्रों में ₹5414 तक पहुंच गया, जो उपभोग व्यय में पर्याप्त वृद्धि का संकेत देता है।

    2023-24 में वृद्धि का रुझान जारी रहा, जब अनुसूचित जनजातियों के लिए औसत एमपीसीई बढ़कर ग्रामीण क्षेत्रों में ₹3363 और शहरी क्षेत्रों में ₹6030 हो गया। इस संबंध में राज्यों के बीच असमानताओं को कम करने और देश भर में अनुसूचित जनजातियों के जीवन स्तर में सुधार सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा की गई कार्रवाई भी उल्लिखित है। अनुसूचित जनजातियों के लिए विकास कार्य योजना के तहत सरकार देश में अनुसूचित जनजातियों और जनजातीय बहुल आबादी वाले क्षेत्रों के विकास के लिए एक कार्यनीति के रूप में अनुसूचित जनजातियों के लिए विकास कार्य योजना और जनजातीय उप योजना को कार्यान्वित कर रही है।

    जनजातीय कार्य मंत्रालय के अलावा, 41 मंत्रालय/विभाग अनुसूचित जनजातियों (अजजा) और गैर-अनुसूचित जनजातीय आबादी के बीच विकासात्मक अंतरों को पाटने और शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई, सड़कें, आवास, विद्युतीकरण, रोजगार सृजन, कौशल विकास आदि से संबंधित विभिन्न जनजातीय विकास परियोजनाओं के लिए डीएपीएसटी के तहत प्रत्येक वर्ष अपनी कुल स्कीम बजट का एक निश्चित प्रतिशत जनजातीय विकास के लिए आवंटित कर रहे हैं।

    अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए बाध्य मंत्रालयों/विभागों द्वारा आवंटित धनराशि के साथ स्कीमें कई लिंक में केंद्रीय बजट दस्तावेज के व्यय प्रोफाइल के विवरण में दी गई हैं। राज्य जनजातीय उप योजना के तहत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में टीएसपी की निगरानी के लिए मंत्रालय द्वारा राज्य टीएसपी निगरानी पोर्टल शुरू किया गया है, जिस पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नियमित आधार पर राज्य बजटीय अनुदान में से टीएसपी आवंटन, टीएसपी व्यय और टीएसपी की अन्य आवश्यक जानकारी अपलोड करना है।

    धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अक्टूबर, 2024 को धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान का शुभारंभ किया था। इस अभियान में 17 लाइन मंत्रालयों द्वारा कार्यान्वित 25 उपाय शामिल हैं और इसका उद्देश्य 5 वर्षों में 30 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के 549 जिलों और 2,911 ब्लॉकों में 5 करोड़ से अधिक जनजातियों को लाभान्वित करते हुए 63,843 गांवों में अवसंरचना संबंधी अंतरों को दूर करना, स्वास्थ्य, शिक्षा, आंगनबाड़ी सुविधाओं तक बेहतर पहुंच और आजीविका के अवसर प्रदान करना है। इस अभियान का कुल बजटीय परिव्यय 79,156 करोड़ रुपये (केंद्रीय हिस्सा: 56,333 करोड़ रूपये और राज्य हिस्सा: 22,823 करोड़ रूपये) है।

    प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाभियान (पीएम जन मन) के तहत सरकार ने 15 नवंबर 2023 को प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान (पीएम-जन मन) शुरू किया है, जिसे जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जाता है। लगभग 24,000 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय वाले इस मिशन का उद्देश्य 3 वर्षों में समयबद्ध तरीके से पीवीटीजी परिवारों और बस्तियों को सुरक्षित आवास, स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण तक बेहतर पहुंच, सड़क और दूरसंचार सम्पर्क, अविद्युतीकृत घरों का विद्युतीकरण और स्थायी आजीविका के अवसरों जैसी मूलभूत सुविधाएं प्रदान करना है।

    प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन (पीएमजेवीएम) के तहत जनजातीय कार्य मंत्रालय प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन (पीएमजेवीएम) को क्रियान्वित कर रहा है, जिसे जनजातीय आजीविका को बढ़ावा देने के लिए दो मौजूदा योजनाओं अर्थात न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के माध्यम से लघु वन उपज (एमएफपी) के विपणन के लिए तंत्र और एमएफपी के लिए मूल्य श्रृंखला का विकास तथा जनजातीय उत्पादों/उपज के विकास और विपणन के लिए संस्थागत सहायता के विलय के माध्यम से तैयार किया गया है।

    मंत्रालय भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास महासंघ (ट्राइफेड) के माध्यम से पीएमजेवीएम योजना को लागू कर रहा है, जो जनजातीय उद्यमिता पहल को मजबूत करने और प्राकृतिक संसाधनों, कृषि/लघु वन उपज (एमएफपी)/गैर-कृषि उपज के अधिक कुशल, न्यायसंगत, स्व-प्रबंधित, इष्टतम उपयोग को बढ़ावा देकर आजीविका के अवसरों को सुविधाजनक बनाने की परिकल्पना करता है। इस योजना के तहत वन धन विकास केंद्रों (वीडीवीके) की स्थापना के लिए राज्य सरकारों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है, जो एमएफपी/गैर-एमएफपी की मूल्यवर्धन गतिविधियों के केंद्र हैं।

    एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय (ईएमआरएस) के तहत वर्ष 2018-19 में जनजातीय बच्चों को उनके अपने परिवेश में नवोदय विद्यालय के समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय (ईएमआरएस) शुरू किए गए थे। नई योजना के अंतर्गत, सरकार ने 440 ईएमआरएस, 50 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जनजाति की आबादी और कम से कम 20,000 जनजातीय व्यक्तियों (2011 की जनगणना के अनुसार) वाले प्रत्येक ब्लॉक में एक ईएमआरएस स्थापित करने का निर्णय लिया है।

    शुरू में संविधान के अनुच्छेद 275(1) के अंतर्गत 288 ईएमआरएस स्कूलों को अनुदान के तहत वित्तपोषित किया गया था, जिन्हें नए मॉडल के अनुसार उन्नत किया जा रहा है। तदनुसार, मंत्रालय ने देश भर में लगभग 3.5 लाख अनुसूचित जनजाति के छात्रों को लाभान्वित करने के लिए कुल 728 ईएमआरएस स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। अनुसूचित जनजाति के विद्यार्थियों के लिए मैट्रिक-पूर्व छात्रवृत्ति योजना कक्षा नौ और दस में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए लागू है। माता-पिता की आय सभी स्रोतों को मिलाकर 2.50 लाख रुपये प्रति वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए। दिवा छात्रों को 225 रुपये प्रति माह और छात्रावास में रहने वालों को 525 रुपये प्रति माह की छात्रवृत्ति वर्ष में 10 महीने की अवधि के लिए दी जाती है।

    छात्रवृत्ति राज्य सरकार/संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन के माध्यम से वितरित की जाती है। पूर्वोत्तर और हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे पहाड़ी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों जहां यह अनुपात 90:10 है को छोड़कर, सभी राज्यों के लिए केंद्र और राज्यों के बीच वित्तपोषण अनुपात 75:25 है। विधायिका रहित संघ राज्यक्षेत्रों के लिए साझाकरण पैटर्न 100 प्रतिशत केंद्रीय हिस्सा है।

    पीआईबी की एक रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित जनजाति के विद्यार्थियों के लिए मैट्रिकोत्तर छात्रवृत्ति योजना का उद्देश्य मैट्रिकोत्तर या माध्यमिकोत्तर स्तर पर अध्ययन कर रहे अनुसूचित जनजाति के विद्यार्थियों को उनकी शिक्षा पूरी करने में सक्षम बनाने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करना है। माता-पिता की आय सभी स्रोतों को मिलाकर 2.50 लाख रुपये प्रति वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए। शैक्षणिक संस्थानों द्वारा लिए जाने वाले अनिवार्य शुल्क की प्रतिपूर्ति संबंधित राज्य शुल्क निर्धारण समिति द्वारा निर्धारित सीमा के अधीन की जाती है और अध्ययन के पाठ्यक्रम के आधार पर 230 रुपये से 1200 रुपये तक प्रति माह की छात्रवृत्ति राशि का भुगतान किया जाता है।

    यह योजना राज्य सरकारों और संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासनों द्वारा कार्यान्वित की जाती है। पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्र हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर जहां यह 90:10 है को छोड़कर, सभी राज्यों के लिए केंद्र और राज्यों के बीच वित्तपोषण अनुपात 75:25 है। बिना विधायिका वाले संघ राज्य क्षेत्रों के लिए साझाकरण पद्धति (पैटर्न) 100 प्रतिशत केंद्रीय हिस्सा है। यं कहें कि केंद्र सरकार जनजातियों के उत्थान के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से काफी काम कर रही है। सवाल यह है कि इन योजनाओं का धरातल पर कितना असर है और इसका लाभ कितने लोगों को मिल रहा है। इसकी पड़ताल कर सरकार पारदर्शिता के साथ काम करना चाहिए। बहरहाल, देखते हैं कि क्या होता है। (लेखक द भारत ख़बर और इंडिया न्यूज के संपादक हैं।)

    यह भी पढ़ें : Editorial Aaj Samaaj: इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में खुले संभावनाओं के द्वार

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