अंबाला. चंद्रपुरी की उस गली में आज भी सबकुछ पहले जैसा दिखता है. घर का दरवाजा वहीं है, आंगन भी वैसा ही है और कोने में रखी कटोरियां भी रोज किसी का इंतजार करती नजर आती हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि अब वह लड़की नहीं है, जिसके कदमों की आहट सुनते ही 43 पूंछें एक साथ हिलने लगती थीं. यह कहानी सिर्फ एक सड़क हादसे में गई जान की नहीं, बल्कि उन 43 बेजुबान जिंदगियों की है, जो एक झटके में अनाथ हो गई हैं. अंबाला छावनी के चंद्रपुरी निवासी निकिता उर्फ निक्की ने वर्षों तक घायल और बेसहारा कुत्तों को अपना परिवार बनाकर रखा था. किसी को सड़क किनारे घायल हालत में पाती तो घर ले आतीं, किसी के शरीर में कीड़े पड़े होते तो उसका इलाज करवातीं और कोई भूख से तड़पता मिलता तो अपने हाथों से खाना खिलातीं. जहां लोग “आवारा” कहकर नजरें फेर लेते थे, वहां निकिता को एक जीव का दर्द दिखाई देता था.
निकिता ने अपने घर को ही शेल्टर में बदल दिया था. परिवार के रहने के लिए सिर्फ एक-एक कमरा छोड़ा गया था, जबकि बाकी हिस्सा कुत्तों के लिए बना दिया गया था. गर्मी से बचाने के लिए एसी लगवाया गया, सफाई और देखभाल के लिए कर्मचारियों को रखा गया और घायल व पैरालाइज कुत्तों के लिए हर दूसरे दिन पनीर मंगवाया जाता था. पास के डिलीवरी किचन से रोज करीब 100 रोटियां आती थीं. पड़ोसियों के अनुसार, इन बेजुबानों के खाने, दवाइयों और इलाज पर रोजाना चार से पांच हजार रुपये तक खर्च हो जाते थे, लेकिन 13 जुलाई को साहा के पास हुए सड़क हादसे ने सब कुछ बदल दिया.
अडॉप्ट करवाने की प्रक्रिया शुरू
निकिता की मौत के बाद कई कुत्तों ने खाना तक छोड़ दिया है और वे हर आहट पर दरवाजे की तरफ दौड़ पड़ते हैं. लोकल 18 से निकिता की बहन आशा बताती हैं कि उनकी बहन कई वर्षों से घायल कुत्तों की सेवा कर रही थीं. घर पर ही उनका इलाज करती थीं. अब 40 से 50 कुत्तों की पूरी जिम्मेदारी परिवार पर आ गई है, लेकिन आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं है कि सभी का लंबे समय तक पालन-पोषण किया जा सके. इसी कारण वंदे मातरम संस्था की मदद से कुछ कुत्तों को दूसरी संस्थाओं और परिवारों में अडॉप्ट करवाने की प्रक्रिया शुरू की गई है.
सबसे बड़ी चुनौती
स्थानीय निवासी बंसीलाल बताते हैं कि इलाके में कहीं भी कोई घायल जीव मिलने की सूचना मिलती थी तो निकिता तुरंत अपनी गाड़ी लेकर पहुंच जाती थीं. कई बार वह आधी रात को भी इलाज के लिए निकल पड़ती थीं. निकिता के जाने के बाद परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन जीवों के भोजन, दवाइयों और साफ-सफाई की व्यवस्था बनाए रखना है. वंदे मातरम दल के सदस्य सौरभ ने बताया कि संगठन कई वर्षों से घायल जीवों का निःशुल्क उपचार कर रहा है. अब निकिता के शेल्टर के कुत्तों को सुरक्षित घर दिलाने के लिए अभियान चलाया जा रहा है. उन्होंने लोगों से अपील की कि जो भी सक्षम हो, वह इन बेजुबानों को अपनाकर उनकी जिंदगी बचाने में मदद करे.