
सोचने-समझने की क्षमता पर पड़ रहा बुरा असर, दिमाग का आकार भी सिकुड़ रहा
Financial Stress, (द भारत ख़बर),लंदन: यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के एक नए अध्ययन के अनुसार, लंबे समय तक आर्थिक तंगी और गरीबी में रहने से मस्तिष्क की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। इस लगातार रहने वाले वित्तीय तनाव से दिमाग का आकार सिकुड़ने लगता है और सोचने-समझने की क्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है।
एमआरआई स्कैन से पता चला कि वयस्कता में लंबे समय तक कम आय या आर्थिक तंगी झेलने वाले लोगों में 71 वर्ष की उम्र तक दिमाग का महत्वपूर्ण हिस्सा सिकुड़ जाता है। लगातार पैसों की तंगी का सामना करने वाले लोग 53 वर्ष की आयु तक आते-आते मानसिक और कॉग्निटिव टेस्ट में पिछड़ जाते हैं।
2,759 लोगों पर किया गया सर्वे
यूनाइटेड किंगडम में इस स्टडी के लिए 2,759 लोगों पर सर्वे किया गया। डेटा के विश्लेषण से पता चला कि 53 साल की उम्र तक, जिन लोगों ने अपनी जिंदगी में आर्थिक तंगी का सामना किया था, उनकी सोचने-समझने की क्षमता (कॉग्निटिव फंक्शन) उन लोगों की तुलना में कम थी, जिन्होंने पैसे की कोई दिक्कत नहीं झेली थी।
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के रिसर्चर जैक्स वेल्स ने कहा, कई सालों तक लगातार मुश्किलों का सामना करना खराब कॉग्निटिव हेल्थ से जुड़ा है, न कि कभी-कभार आने वाली मुश्किलों से।
वर्बल मेमोरी में भी आई गिरावट
रिसर्चर्स ने यह भी पाया कि इन लोगों में 53 से 69 साल की उम्र के बीच शब्दों को याद रखने की क्षमता में गिरावट की दर धीमी थी, जिससे पता चलता है कि इन लोगों का पहले ही सोचने-समझने की क्षमता में काफी नुकसान हो चुका था। स्टडी में यह भी पाया गया कि उम्र बढ़ने के साथ दिमाग पर आर्थिक तनाव का असर पुरुषों, मुश्किल बचपन वाले लोगों और अल्जाइमर के जेनेटिक रिस्क वाले लोगों पर काफी ज्यादा बुरा होता है।
डिमेंशिया होने का खतरा
स्टडी में बताया गया है कि आर्थिक तंगी को लंबे समय तक चलने वाली समस्या बनने से अगर रोक लिया जाए तो उम्र बढ़ने से जुड़ी सोचने-समझने की क्षमता में कमी और डिमेंशिया जैसी बीमारियों से भी बचा जा सकता है। ऐसी स्टडी के सामने आने के बाद ही रिसर्चर्स अब इस तरह के हालातों को बदलने वाले कारकों को खोजने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
डिमेंशिया से दुनियाभर में 57 मिलियन लोग प्रभावित
डिमेंशिया दुनियाभर में स्वास्थ्य से जुड़ी बड़ी समस्याओं में से एक है। 2019 में इसने 57 मिलियन लोगों को प्रभावित किया था और अनुमान है कि 2050 तक इसके मामले तीन गुना बढ़कर 150 मिलियन से ज्यादा हो जाएंगे।
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