Justice Yashwant Varma Cash News: पिछले साल तत्कालीन दिल्ली हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में आग लग गई थी। आग की सूचना दमकल विभाग को दी गई। दमकल की टीम जब सरकारी आवास के स्टोर रूम में आग बुझा रही थी, तभी वहां भारी मात्रा में जली हुई नोटों की गड्डियां मिलीं। इस खबर के सामने आने के बाद तहलका मच गया। जस्टिस वर्मा पर गंभीर सवाल उठे और उनके खिलाफ जांच शुरू हुई। करीब डेढ़ साल से ज्यादा समय बाद इस मामले की जांच रिपोर्ट 12 अगस्त को संसद के दोनों सदनों में पेश कर दी गई। जांच समिति ने उनके खिलाफ लगाए आरोपों को सही माना है।
14 मार्च की रात आखिर हुआ क्या था?
इस पूरे मामले की शुरुआत 14 मार्च 2025 की रात हुई। जस्टिस वर्मा उस समय दिल्ली स्थित अपने सरकारी आवास में मौजूद नहीं थे। उनके सरकारी आवास पर आग लगने के बाद दमकल की टीम वहां पहुंची और आग बुझाने का काम शुरू किया। इसी दौरान स्टोररूम में जले हुए नोट और बड़ी मात्रा में नकदी मिलने की बात सामने आई। घटना के बाद नकदी की मौजूदगी, उसके सोर्स और स्टोररूम तक उसकी पहुंच को लेकर गंभीर सवाल उठे। यह मामला सामने आने के बाद जस्टिस वर्मा ने नकदी की जानकारी होने से इनकार किया था। उन्होंने यह भी कहा था कि जिस स्टोररूम में नोटों के बंडल मिले, वह उनके परिवार के रहने वाले मुख्य हिस्से से अलग था और वहां घरेलू सामान और रखरखाव से जुड़ी चीजें रखी जाती थीं। बाद में यही सवाल जांच का मुख्य हिस्सा बन गया कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में नकदी वहां कैसे पहुंची और उसकी जिम्मेदारी किसकी थी।
सुप्रीम कोर्ट से शुरू हुआ मामला
नकदी मिलने की घटना के बाद तत्कालीन सीजेआई संजीव खन्ना की अगुवाई में इन-हाउस जांच की प्रक्रिया शुरू हुई। विवाद बढ़ने के बाद जस्टिस वर्मा को दिल्ली हाई कोर्ट से उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद हाई कोर्ट भेज दिया गया। इसके बाद मामला संसद तक पहुंचा और जुलाई 2025 में 200 से ज्यादा सांसदों ने उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की मांग की। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित की। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार, बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस चंद्रशेखर और वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य शामिल थे। समिति ने दस्तावेजों, गवाहों और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मामले की जांच की।
जांच समिति ने तीनों आरोपों को पाया सही
समिति ने मई 2026 में अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी थी। अब इस रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों में औपचारिक रूप से पेश किया गया है। रिपोर्ट दो खंडों में है और इसमें जांच के दौरान दर्ज मौखिक तथा दस्तावेजी साक्ष्य भी शामिल हैं। जांच समिति ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को सिद्ध माना है। पहला आरोप सरकारी आवास के स्टोररूम में मौजूद कथित अघोषित नकदी से जुड़ा था। समिति के अनुसार नकदी की मौजूदगी, उसके सोर्स और स्वामित्व को लेकर जस्टिस वर्मा की ओर से दिया गया स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं था। इसी आधार पर समिति ने पहले आरोप को सिद्ध माना।
दूसरा आरोप आग लगने के बाद घटनास्थल पर मौजूद भौतिक साक्ष्यों के संरक्षण से जुड़ा था। समिति ने माना कि कानूनी निरीक्षण और सीलिंग से पहले स्टोररूम की स्थिति में बदलाव हुआ और साक्ष्यों को उचित तरीके से सुरक्षित नहीं रखा गया। कुछ करेंसी नोटों के बाद में गायब या अनुपलब्ध होने का भी स्पष्ट जवाब नहीं मिला। हालांकि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक समिति ने यह नहीं पाया कि जस्टिस वर्मा ने खुद नोटों को हटाने का निर्देश दिया था। आरोप का केंद्र साक्ष्यों के संरक्षण में गंभीर लापरवाही और संस्थागत विफलता रहा। तीसरा आरोप जस्टिस वर्मा के जवाब और उनके रुख से जुड़ा था। समिति ने खासतौर पर उनके 22 मार्च 2025 के जवाब को संतोषजनक नहीं माना। समिति के अनुसार उनका स्पष्टीकरण टालमटोल वाला था और उसमें अपेक्षित स्पष्टता नहीं थी। स्वतंत्र गवाहों और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए समिति ने इस आरोप को भी सिद्ध माना।
जस्टिस वर्मा ने जांच पर उठाए थे सवाल
दूसरी ओर जस्टिस वर्मा ने जांच समिति की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए थे। अप्रैल 2026 में उन्होंने समिति की कार्यवाही से हटने की घोषणा की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि जांच में उनके खिलाफ अनुमान और धारणाओं को आधार बनाया जा रहा है और उन पर ऐसे तथ्यों को गलत साबित करने की जिम्मेदारी डाली जा रही है, जिन्हें पहले साबित किया जाना चाहिए था। उन्होंने गवाहों और CCTV जैसे कुछ साक्ष्यों को लेकर भी आपत्ति जताई थी। जस्टिस वर्मा ने यह भी कहा था कि स्टोररूम उनके परिवार के मुख्य रहने वाले हिस्से से अलग था और उसका इस्तेमाल घरेलू कर्मचारियों, रखरखाव से जुड़ी चीजें रखने के लिए होता था। उन्होंने नकदी पर अपना या परिवार का मालिकाना हक होने से इनकार किया था।
अप्रैल 2026 में दे दिया था इस्तीफा
इस मामले के बीच जस्टिस यशवंत वर्मा ने अप्रैल 2026 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंपने के साथ ही जांच समिति की कार्यवाही से हटने की जानकारी भी दी थी। उनके इस्तीफे के बाद संसद के जरिए उन्हें हटाने की प्रक्रिया व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी हो गई। जज का इस्तीफा राष्ट्रपति की सामान्य अर्थों में ‘मंजूरी’ पर निर्भर नहीं माना जाता, लेकिन उसके बाद औपचारिक अधिसूचना की प्रक्रिया होती है। 12 अगस्त 2026 तक कानून मंत्रालय की ओर से इस्तीफे की अधिसूचना जारी नहीं हुई थी। इसलिए इस मामले में इस्तीफे की औपचारिक स्थिति को लेकर प्रक्रिया महत्वपूर्ण बनी हुई है।
संसद में रिपोर्ट पेश होने का क्या मतलब है?
जांच रिपोर्ट का संसद में पेश होना इस मामले में एक महत्वपूर्ण अगला चरण है। रिपोर्ट में समिति ने अपने निष्कर्ष और जांच के दौरान जुटाए गए साक्ष्यों को दर्ज किया है। अब रिपोर्ट संसद के रिकॉर्ड का हिस्सा बन गई है। हालांकि जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के कारण उन्हें हटाने की महाभियोग प्रक्रिया का व्यावहारिक असर समाप्त हो चुका है। इस पूरे मामले ने न्यायपालिका में जवाबदेही और संवैधानिक संस्थाओं की पारदर्शिता को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

