JNU PG admission (द भारत ख़बर), नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में स्नातकोत्तर (पीजी) प्रवेश प्रक्रिया को लेकर एक अहम आदेश जारी किया। कोर्ट ने ‘डेप्रवेशन पॉइंट्स’ (वंचित वर्ग के अंकों) के आधार पर छात्रों के नामांकन पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि अतिरिक्त अंक जोड़ने की इजाजत देने से परीक्षा की पवित्रता पर असर पड़ सकता है। मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त को होगी।
एडमिशन पर लगाई रोक
दिल्ली हाई कोर्ट ने JNU को निर्देश दिया है कि वह अकादमिक सत्र 2026-27 के लिए अपने ‘डेप्रवेशन पॉइंट्स’ सिस्टम के आधार पर एडमिशन और आगे की सभी कार्यवाही रोक दे। कोर्ट ने कहा कि इस सिस्टम से यूनिवर्सिटी को प्रथम दृष्टया कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) में कैंडिडेट के स्कोर में प्रभावी रूप से मार्क्स जोड़ने की इजाजत मिलती है।
परीक्षा की पवित्रता पर असर
JNU की ‘डेप्रवेशन-पॉइंट पॉलिसी’ (वंचित-स्थिति के आधार पर अंक देने की नीति) को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस जसमीत सिंह ने कहा कि यूनिवर्सिटी को कॉम्पिटिटिव एंट्रेंस एग्जाम में उम्मीदवारों के स्कोर में अतिरिक्त अंक जोड़ने की इजाजत देने से परीक्षा की पवित्रता पर असर पड़ सकता है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सुनवाई की अगली तारीख तक, JNU ‘डेप्रवेशन पॉइंट्स’ के आधार पर एडमिशन को अंतिम रूप नहीं देगा और एडमिशन के संबंध में ऐसे पॉइंट्स के आधार पर कोई और कदम नहीं उठाएगा। इस मामले में अगली सुनवाई 24 अगस्त को होगी।
ई-प्रॉस्पेक्टस के सेक्शन V को चुनौती
यह याचिका पीजी कोर्स में दाखिला लेने के इच्छुक छात्र अमित मेहरा ने दायर की है, जिसमें उन्होंने अकादमिक सत्र 2026-27 के लिए JNU के ई-प्रॉस्पेक्टस के सेक्शन V को चुनौती दी है। याचिकाकर्ता ने खास तौर पर उस प्रावधान पर सवाल उठाया है जिसके तहत उम्मीदवारों को 12 तक ‘डेप्रवेशन पॉइंट्स’ मिल सकते हैं। ये पॉइंट्स अन्य कारकों के अलावा, उनकी पिछली स्कूली शिक्षा की भौगोलिक स्थिति के आधार पर दिए जाते हैं।

