Haryana News: हरियाणा राज्य मातृ, नवजात और शिशु स्वास्थ्य देखभाल को बड़ा बढ़ावा देने जा रहा है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव, डॉ. सुमिता मिश्रा ने अधिकारियों को 8 मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य (एमसीएच) विंग्स के निर्माण में तेजी लाने और 1 नवंबर तक सभी विशेष नवजात देखभाल इकाइयों (एसएनसीयू) को मदर-न्यूबॉर्न केयर यूनिट्स (एमएनसीयू) में बदलने के निर्देश दिए हैं।
डॉ. मिश्रा ने आज यहां राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) की राज्य स्वास्थ्य समिति की कार्यकारी समिति की 12वीं बैठक की अध्यक्षता करते हुए यह निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि माताओं और नवजात शिशुओं को इलाज के दौरान एक साथ रखने, महिला-केंद्रित स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने, अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाने, रेफरल सुविधाओं का विस्तार करने और गर्भावस्था की निगरानी व ट्रैकिंग को और तेज किया जाए।
एसएनसीयू को एमएनसीयू में बदला जाएगा, मां और बच्चे की देखभाल होगी एक साथ
बैठक का मुख्य बिंदु एसएनसीयू को एमएनसीयू में परिवर्तित करने का प्रस्ताव था। यह नया मॉडल मातृ और नवजात शिशु की देखभाल को एक एकीकृत प्रणाली के तहत लाएगा, जिससे माताओं को अपने नवजात शिशुओं के विशेष इलाज के दौरान उनके करीब रहने का अवसर मिलेगा। हरियाणा में वर्तमान में 29 एसएनसीयू, 62 नवजात स्थिरीकरण इकाइयां (एनबीएसयू) और 527 नवजात देखभाल कोने (एनबीसीसी) मौजूद हैं।
डॉ. मिश्रा ने निर्देश दिए कि योजनाबद्ध रूपांतरण को 1 नवंबर तक पूरा किया जाए, जिससे एक ऐसा देखभाल मॉडल मजबूत होगा जिसमें मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य और रिकवरी पर एक साथ ध्यान दिया जाता है। डॉ. मिश्रा ने अधिकारियों को 8 मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य विंग्स के निर्माण में तेजी लाने का निर्देश दिया, जिससे महिलाओं और बच्चों के लिए समर्पित बुनियादी ढांचे का विस्तार होगा और एकीकृत स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने की सरकारी अस्पतालों की क्षमता बढ़ेगी। बैठक में प्रथम रेफरल इकाइयों के सुदृढ़ीकरण की भी समीक्षा की गई ताकि विशेष या आपातकालीन देखभाल की आवश्यकता वाली गर्भवती महिलाओं को बिना किसी अनावश्यक देरी के संदर्भित और इलाज प्रदान किया जा सके।
हरियाणा ने नामित एफआरयू की संख्या 40 से बढ़ाकर 100 कर दी है। राज्य ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के प्रमुख संकेतकों में भी सुधार दर्ज किया है, जिसमें मातृ मृत्यु दर (एमएसआर ) 127 से घटकर 94 और नवजात मृत्यु दर (एनएमआर) 26 से घटकर 17 हो गई है। डॉ. मिश्रा ने बताया कि 38 विशेषज्ञ डॉक्टरों की भर्ती की गई है, जिनमें बाल रोग, स्त्री रोग, मेडिसिन और एनेस्थीसिया जैसे प्रमुख विशेषज्ञ शामिल हैं।
महिला क्लीनिकों को और अधिक प्रभावी बनाया जाएगा
डॉ. मिश्रा ने अधिकारियों को उनके कामकाज और सेवा वितरण में सुधार करने के निर्देश दिए। इसका उद्देश्य इन महिला-केंद्रित सुविधाओं को अधिक जिम्मेदार और सुलभ बनाना है, जिससे महिलाएं अपने घर के पास आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त कर सकें। विभाग गर्भावस्था, प्रजनन स्वास्थ्य, मातृ देखभाल और प्रसवोत्तर सहायता को कवर करने वाली महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं की श्रृंखला को मजबूत करने की दिशा में काम करेगा।
सभी जिला अस्पतालों में बनेंगे बाल देखभाल केंद्र
डॉ. मिश्रा ने निर्देश दिए कि सभी जिला अस्पतालों में बाल देखभाल केंद्र स्थापित किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि इस कदम का उद्देश्य सरकारी अस्पतालों में महिलाओं के अनुकूल माहौल बनाना है, विशेष रूप से महिला कर्मचारियों और आगंतुकों के लिए जिन्हें काम करने या स्वास्थ्य सेवाएं लेने के दौरान बच्चों की देखभाल की आवश्यकता होती है।
चिकित्सा कर्मियों को मिलेगा जमीनी स्तर पर प्रशिक्षण और सतत चिकित्सा शिक्षा
डॉ. मिश्रा ने अधिकारियों को जमीनी स्तर पर आशा कार्यकर्ताओं के लिए विशेष प्रशिक्षण उपाय शुरू करने के निर्देश दिए, जिनकी प्रभावशीलता का आकलन क्षेत्र-स्तरीय परिणामों के माध्यम से किया जाएगा। गर्भवती महिलाओं, परिवारों और स्वास्थ्य प्रणाली के बीच अग्रिम पंक्ति की कड़ी के रूप में आशा कार्यकर्ताओं को मजबूत करने पर जोर दिया जाएगा, विशेष रूप से उच्च जोखिम वाली गर्भधारण की पहचान, समय पर रेफरल और फॉलो-अप देखभाल के लिए। उन्होंने डॉक्टरों, नर्सों, रेडियोग्राफर और अन्य पैरा-मेडिकल स्टाफ की सभी श्रेणियों के लिए आवश्यकता आधारित और कौशल उन्नयन पर आधारित सतत चिकित्सा शिक्षा के लिए एक वार्षिक कैलेंडर तैयार करने के भी निर्देश दिए।

