
18 से 65 साल की उम्र के लोगों पर किया गया अध्ययन
Headache Research, (द भारत ख़बर), नई दिल्ली: सिरदर्द को हम आमतौर पर ऐसी परेशानी मानते हैं जो थोड़ी देर आराम करने या कोई दवा लेने के बाद ठीक हो जाएगी। काम का तनाव हो, नींद पूरी न हुई हो, लगातार स्क्रीन देखने से आंखों पर जोर पड़ा हो या दिनभर की भागदौड़ हो हम अक्सर सिरदर्द की वजह ढूंढकर उसे नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन, भारत में हुई नई रिसर्च की तस्वीर बताती है कि सिरदर्द सिर्फ कभी-कभार होने वाली मामूली परेशानी नहीं है।
67.9 फीसदी लोगों बताई सिरदर्द की समस्या
दिल्ली और एनसीआर में किए गए एक बड़े आबादी आधारित अध्ययन में 18 से 65 साल की उम्र के लोगों में पिछले एक साल के दौरान किसी न किसी तरह का सिरदर्द 67.9 फीसदी लोगों में पाया गया। यानी हर 100 लोगों में करीब 68 लोगों ने सिरदर्द की समस्या बताई।
वहीं उत्तर भारत के ग्रामीण इलाके में हाल में हुई एक दूसरी स्टडी में यह आंकड़ा 53.6 फीसदी रहा। दोनों अध्ययनों की आबादी और जगह अलग हैं, लेकिन दोनों एक ही बड़ी समस्या की ओर इशारा करते हैं, सिरदर्द बहुत बड़ी संख्या में लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है।
हर पांच में एक को इलाज की जरूरत
एम्स की स्टडी में सिरदर्द से परेशान लोगों ने औसतन अपने 9.5 फीसदी समय को मध्यम तीव्रता वाले सिरदर्द के साथ बिताया। पूरे वयस्क आबादी के स्तर पर अनुमान लगाया गया कि लोगों का करीब 5.5 से 6.6 फीसदी समय किसी न किसी तरह के सिरदर्द में गुजर सकता है। इसी अध्ययन के मुताबिक, 18 से 65 साल की आबादी में करीब 26 फीसदी लोगों को विशेषज्ञ स्वास्थ्य देखभाल से फायदा हो सकता है।
सिरदर्द से घट रही काम करने की क्षमता
दूसरी ओर ग्रामीण उत्तर भारत की स्टडी में भी करीब एक-पांचवां हिस्सा ऐसे लोगों का मिला जिन्हें विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवा से फायदा पहुंच सकता है। जिसका मतलब ये है कि सिरदर्द सिर्फ दर्द की शिकायत नहीं है बल्कि यह स्वास्थ्य व्यवस्था और लोगों की काम करने की क्षमता से जुड़ा बड़ा मुद्दा भी बन सकता है।
माइग्रेन ही सबसे बड़ी परेशानी नहीं
सिरदर्द का नाम आते ही सबसे पहले माइग्रेन का ख्याल आता है, लेकिन हर सिरदर्द माइग्रेन नहीं होता। तनाव से होने वाला सिरदर्द भी बहुत आम है। दिल्ली-एनसीआर के अध्ययन में तनाव से होने वाले सिरदर्द की अनुमानित दर 34.1 फीसदी और माइग्रेन की 26.3 फीसदी थी। ग्रामीण उत्तर भारत के अध्ययन में भी तनाव से होने वाला सिरदर्द 28.9 फीसदी के साथ सबसे आम प्रकार रहा, जबकि माइग्रेन 18.7 फीसदी लोगों में पाया गया।
माइग्रेन कम, फिर भी बोझ ज्यादा
दिल्ली-एनसीआर की रिसर्च में एक महत्वपूर्ण बात सामने आई। माइग्रेन की दर तनाव से होने वाले सिरदर्द से कम थी, लेकिन जिन लोगों को माइग्रेन था, उनके लिए इसका व्यक्तिगत बोझ काफी ज्यादा था। अध्ययन में माइग्रेन की वजह से स्वास्थ्य को होने वाला नुकसान भी महत्वपूर्ण पाया गया। शोधकर्ताओं मुताबिक, माइग्रेन अकेले ही करीब 16.1 फीसदी आबादी को ऐसी श्रेणी में रखता है जिसे विशेषज्ञ स्वास्थ्य देखभाल से फायदा मिल सकता है।
सबसे ज्यादा परेशानी कब बढ़ती है?
रिसर्च में उन लोगों पर भी ध्यान दिया गया जिन्हें महीने में 15 या उससे ज्यादा दिन सिरदर्द होता है। ऐसे लोगों में समस्या कहीं ज्यादा गंभीर और लंबे समय तक रहने वाली हो सकती है। दिल्ली-एनसीआर के अध्ययन में इस तरह के सिरदर्द को एक अलग श्रेणी में रखा गया। इस समूह और दवा के ज्यादा इस्तेमाल से होने वाले सिरदर्द वाले लोगों में सिरदर्द का बोझ माइग्रेन या सामान्य तनाव वाले सिरदर्द से ज्यादा पाया गया।
समस्या की वजह जरूरी
यहीं एक और अहम बात सामने आती है- सिरदर्द की दवा का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल भी समस्या बढ़ा सकता है। दिल्ली-एनसीआर अध्ययन में दवाओं के ज्यादा इस्तेमाल से होने वाले संभावित सिरदर्द की दर 3 फीसदी थी। ग्रामीण उत्तर भारत की रिसर्च में यह आंकड़ा 2.8 फीसदी रहा। दवा का इस्तेमाल बढ़ने के बावजूद अगर सिरदर्द बार-बार लौट रहा है, तो सिर्फ बार-बार दर्द की दवा लेने के बजाय समस्या की सही वजह समझना जरूरी हो सकता है।
सिरदर्द सिर्फ दर्द नहीं, समय का भी नुकसान
सिरदर्द का असर सिर्फ उस समय महसूस नहीं होता जब व्यक्ति दर्द में होता है। इसका असर घर के काम, नौकरी और दूसरी रोजमर्रा की गतिविधियों पर भी पड़ सकता है। दिल्ली-एनसीआर की स्टडी के मुताबिक पूरे आबादी स्तर पर करीब 5.5 फीसदी समय सिरदर्द के साथ गुजरने का अनुमान लगाया गया।
सिरदर्द की वजह से हर व्यक्ति के वेतन वाले काम में औसतन 0.1 दिन और घरेलू काम में 0.6 दिन प्रति महीने का नुकसान अनुमानित किया गया। ग्रामीण उत्तर भारत की रिसर्च में भी शोधकर्ताओं ने सिरदर्द को स्वास्थ्य नुकसान और काम करने की क्षमता में कमी से जोड़ा। यानी लगातार सिरदर्द व्यक्ति की जिंदगी में छोटे-छोटे नुकसान जोड़ता जाता है, जो लंबे समय में बड़ा असर पैदा कर सकते हैं।
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