India To Buy Javelin Anti-Tank Missiles: भारत और अमेरिका के बीच बड़ी डिफेंस डील पर बात चल रही है। भारत यूएस से जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम खरीदने की तैयारी में है। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने शुक्रवार को इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह कदम दोनों देशों के रक्षा संबंधों को और मजबूत करेगा। जैवलिन एक मैन-पोर्टेबल, कंधे से लॉन्च किया जाने वाला एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम है। इसे खास तौर पर टैंकों और दूसरे बख्तरबंद वाहनों को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है।
जैवलिन मिसाइल सिस्टम की खासियत
इसकी खासियत इसका fire-and-forget सिस्टम है। आसान भाषा में समझें तो यह मिसाइल दागे जाने के बाद ऑपरेटर को लगातार टारगेट पर निशाना साधे रखने की जरूरत नहीं होती। जैवलिन एक मीडियम-रेंज, मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक सिस्टम है, जिसका इस्तेमाल पैदल सैनिकों, स्काउट्स और कॉम्बैट इंजीनियरों के लिए किया जा सकता है। इसे जरूरत के मुताबिक अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर भी लगाया जा सकता है। जैवलिन को दुश्मन के टैंकों के लिए काल माना जाता है। इस मिसाइल सिस्टम ने रूस यूक्रेन युद्ध में भी शानदार प्रदर्शन किया है।
BIG news! India plans to buy the battle-tested Javelin anti-tank system. Just as @secwar highlighted at the May 2026 Shangri-La Dialogue, this is a great step forward in the U.S.-India defense relationship and opens the door to co-production possibilities. The engagement between…
— Ambassador Sergio Gor (@USAmbIndia) August 28, 2026
भारत कितने जैवलिन सिस्टम खरीदेगा?
अमेरिकी रक्षा विभाग ने फरवरी 2026 में भारत के लिए प्रस्तावित जैवलिन बिक्री का विवरण जारी किया था। इसके मुताबिक भारत ने 100 FGM-148 Javelin मिसाइल राउंड, एक जैवलिन मिसाइल fly-to-buy और 25 लाइटवेट कमांड लॉन्च यूनिट्स (LwCLU) या Block 1 कमांड लॉन्च यूनिट्स (CLU) खरीदने का अनुरोध किया था। इस संभावित बिक्री का अनुमानित मूल्य 45.7 मिलियन डॉलर बताया गया था। इसमें प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता, स्पेयर पार्ट्स और अन्य लॉजिस्टिक सपोर्ट भी शामिल हैं। इस सौदे के प्रमुख अमेरिकी ठेकेदार RTX Corporation और Lockheed Martin का जैवलिन जॉइंट वेंचर है।
भारत में भी हो सकता है प्रोडक्शन?
सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल मिसाइलों की खरीद नहीं, बल्कि भारत में जैवलिन के संभावित सह-उत्पादन से जुड़ा है। सर्जियो गोर ने संकेत दिया है कि मौजूदा खरीद आगे चलकर दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच को-प्रोडक्शन के लिए रास्ता खोल सकती है। अगर यह सहयोग आगे बढ़ता है तो इससे भारत में अमेरिकी रक्षा तकनीक और भारतीय रक्षा उद्योग के बीच औद्योगिक साझेदारी को बढ़ावा मिल सकता है। यह भारत की स्थानीय रक्षा विनिर्माण क्षमता बढ़ाने की व्यापक नीति के अनुरूप भी होगा। यह सिस्टम अमेरिकी सेना और मरीन कॉर्प्स के अलावा कई मित्र देशों की सेनाओं के इस्तेमाल में है। इसकी खासियत इसकी पोर्टेबिलिटी और बख्तरबंद लक्ष्यों के खिलाफ इस्तेमाल की क्षमता मानी जाती है।

