फरीदाबाद: महिलाओं की ब्रेस्ट जांच के दौरान कई बार रिपोर्ट में ‘डेंस ब्रेस्ट’ लिखा होता है. यह शब्द देखकर कई महिलाएं घबरा जाती हैं और मन में सवाल उठता है कि कहीं यह कैंसर का संकेत तो नहीं. आखिर ब्रेस्ट डेंस होती क्या है और इससे कैंसर का खतरा कितना बढ़ता है. क्या घने ब्रेस्ट में कैंसर की पहचान करना मुश्किल होता है. ऐसी महिलाओं को कौन-सी जांच और कितनी बार करानी चाहिए. इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए लोकल18 ने डॉक्टर से खास बातचीत की.
क्या होता है डेंस ब्रेस्ट का मतलब
फरीदाबाद अमृता हॉस्पिटल की ब्रेस्ट सर्जरी विभाग में सीनियर कंसल्टेंट डॉ. श्वेता रजदान बताती हैं कि सिंपल वर्ड्स में समझें तो डेंसिटी का मतलब ब्रेस्ट के अंदर मौजूद टिश्यू की मात्रा से है. ब्रेस्ट नॉर्मली फैट और ग्लैंडुलर टिश्यू से बना होता है. ग्लैंड्स में दूध बनता है और ग्लैंडुलर टिश्यू की मात्रा ज्यादा होने पर ब्रेस्ट डेंस होता है. वहीं फैट की मात्रा ज्यादा होने पर उसे फैटी या कम डेंस ब्रेस्ट कहा जाता है. डॉ. श्वेता बताती हैं कि अगर आपकी मैमोग्राम रिपोर्ट में लिखा गया है कि आपका ब्रेस्ट डेंस है तो कोई घबराने की जरूरत नहीं है. डेंसिटी का मतलब है कि ब्रेस्ट में ग्लैंड्स ज्यादा हैं और ग्लैंडुलर टिश्यू का रेश्यो ज्यादा है. आमतौर पर यंग ब्रेस्ट में ग्लैंडुलर टिश्यू ज्यादा होता है. जैसे 40 साल की उम्र से कम महिलाओं में मैमोग्राम करने पर डेंस ब्रेस्ट दिखाई दे सकता है. इसी वजह से मैमोग्राम आमतौर पर 40 साल की उम्र के आसपास या उसके बाद कराने की सलाह दी जाती है.
डेंस ब्रेस्ट से कैंसर का कितना खतरा?
इस पर डॉ. श्वेता रज़दान बताती हैं कि डेंसिटी और ब्रेस्ट कैंसर का सीधा लिंक नहीं है. लेकिन जब आप मैमोग्राम कराते हैं तो उसमें एक्स-रे के जरिए ब्रेस्ट का टिश्यू सफेद, ग्रे और काले रंग में दिखाई देता है. अगर ग्लैंड ज्यादा हों तो सफेद टिश्यू दिखाई देता है और ट्यूमर भी सफेद दिखाई दे सकता है. ऐसे में सफेद ग्लैंडुलर टिश्यू और ट्यूमर को अलग पहचानना मुश्किल हो सकता है. अगर ब्रेस्ट में ट्यूमर हो और ग्लैंड्स भी बहुत ज्यादा हों तो ट्यूमर उन ग्लैंड्स के बीच छिप सकता है और उसकी पहचान करना मुश्किल हो सकता है.
समय पर कराएं ये जांच
जितना ज्यादा डेंस ब्रेस्ट होगा यानी मैमोग्राम में जितना ज्यादा सफेद टिश्यू दिखाई देगा, उतना ही ट्यूमर को पकड़ना मुश्किल हो सकता है. घने ब्रेस्ट वाली महिलाओं को कौन-सी जांच करानी चाहिए. इस पर डॉ. श्वेता रज़दान बताती हैं कि अगर मैमोग्राम रिपोर्ट में आपका ब्रेस्ट डेंस आता है तो जरूरत के हिसाब से कुछ और टेस्ट कराने पड़ सकते हैं, जैसे अल्ट्रासाउंड. यदि आप पहली बार मैमोग्राम करा रही हैं तो अल्ट्रासाउंड भी कराया जा सकता है. लेकिन अगर आपका पहले से मैमोग्राम होता रहा है, जैसे 1 या 2 साल में एक बार, और इस बार भी रिपोर्ट डेंस आती है तो पुरानी रिपोर्ट के साथ उसे कंपेयर किया जा सकता है. हर बार नया अल्ट्रासाउंड कराने की जरूरत नहीं होती. अगर पहली बार मैमोग्राम हुआ है तो डॉक्टर जरूरत के हिसाब से अल्ट्रासाउंड की सलाह दे सकते हैं.
डेंस ब्रेस्ट वाली महिलाओं को साल में एक बार मैमोग्राम कराने की सलाह दी जाती है. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, ब्रेस्ट की डेंसिटी कम हो सकती है. जब डेंसिटी कम हो जाए तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार 2 साल में एक बार भी मैमोग्राम कराया जा सकता है.

