कविता. रोहतक : देश डिजिटल इंडिया के सपने बेच रहा है, लेकिन घरों के भीतर अब भी बेटियां दहेज की भट्ठी में जलाई जा रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2024 के आंकड़े देश के माथे पर ऐसा धब्बा बनकर उभरे हैं, जिसे सिर्फ क्राइम डेटा कहकर नहीं टाला जा सकता। साल 2024 में देशभर में 5 हजार 737 महिलाओं की दहेज हत्या दर्ज हुई।
यानी औसतन हर दिन 15 से ज्यादा और लगभग हर 90 मिनट में एक महिला दहेज के नाम पर मौत के हवाले कर दी गई। सबसे खराब तस्वीर उत्तर प्रदेश से सामने आई, जहां अकेले 2038 दहेज हत्याएं दर्ज हुईं। यह आंकड़ा कई छोटे राज्यों की कुल महिला अपराध संख्या से भी ज्यादा है। बिहार 1078 मौतों के साथ दूसरे और मध्य प्रदेश 450 मामलों के साथ तीसरे नंबर पर रहा। ये उन बेटियों की चीखें हैं, जिन्हें शादी के बाद सामान की तरह खरीदा-बेचा गया।
उत्तर प्रदेश बना दहेज मौतों की राजधानी
उत्तर प्रदेश में दहेज हत्या के 2038 मामले दर्ज होना सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है। यहां कानून हैं, महिला हेल्पलाइन हैं, महिला थाने हैं, मिशन शक्ति के पोस्टर हैं, लेकिन जमीन पर बेटियां अब भी गैस सिलेंडर, फांसी के फंदे और संदिग्ध आत्महत्याओं में मर रही हैं। दूसरे नंबर पर बिहार रहा, जहां 1078 महिलाओं की दहेज के कारण जान गई। मध्य प्रदेश में 450, राजस्थान में 386 और पश्चिम बंगाल में 337 मौतों ने दिखा दिया कि समस्या सिर्फ किसी एक क्षेत्र की नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक ढांचे की है।
बेटियों की मौत पर राजनीति खामोश
बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतने कानूनों और अभियानों के बावजूद दहेज हत्याएं रुक क्यों नहीं रहीं। दहेज निषेध अधिनियम, महिला सुरक्षा अभियान, महिला आयोग, फास्ट ट्रैक कोर्ट, सब होने के बावजूद बेटियां मर रही हैं। वजह साफ है, मामलों में समझौते, कमजोर जांच, सामाजिक दबाव और पुलिस की शुरुआती लापरवाही। अक्सर मौत को आत्महत्या बताकर मामला दबाने की कोशिश होती है। कई मामलों में लड़की के परिवार पर ही समझौते का दबाव बना दिया जाता है। अदालत तक पहुंचते-पहुंचते केस कमजोर पड़ जाते हैं और आरोपी खुले घूमते हैं।
दिल्ली से लेकर गांव तक, दहेज अब भी स्टेटस सिंबल
शादी में कार, कैश और फ्लैट की डिमांड अब भी रिवाज कहलाती है। दिल्ली जैसे शहरी इलाके में भी 109 दहेज हत्याएं दर्ज हुईं। यह बताता है कि समस्या सिर्फ गांव या अशिक्षा की नहीं है। पढ़े-लिखे और आर्थिक रूप से मजबूत तबकों में भी दहेज लालच जिंदा है। हरियाणा में 177, झारखंड में 206 और ओडिशा में 200 मामलों ने साफ कर दिया कि उत्तर से दक्षिण और गांव से महानगर तक, दहेज की आग हर जगह धधक रही है।
जहां दहेज कम, वहां मौतें भी कम
दिलचस्प बात यह भी है कि कुछ राज्यों में दहेज हत्या के मामले बेहद कम या शून्य रहे। गोवा में सिर्फ 2, तमिलनाडु में 7 और कई पूर्वोत्तर राज्यों, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम में शून्य मामले दर्ज हुए। विशेषज्ञ मानते हैं कि जहां महिलाओं की सामाजिक भागीदारी ज्यादा है और विवाह को आर्थिक सौदे की तरह नहीं देखा जाता, वहां दहेज अपराध अपेक्षाकृत कम हैं।
देश के 5 सबसे अधिक मामले वाले राज्य
- उत्तर प्रदेश 2038
- बिहार 1078
- मध्य प्रदेश 450
- राजस्थान 386
- पश्चिम बंगाल 337
