- ‘जानकी सिरा किलो’ था खालरा का कोड नेम
Kikkar Singh, (द भारत ख़बर), एंटरटेनमेंट डेस्क: मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर बनी और बाद में ZEE5 से हटाई गई दिलजीत दोसांझ (Diljit Dosanjh) की फिल्म ‘सतलुज’ ने किक्कर सिंह (Kikkar Singh) के लिए उग्रवाद के दौर की दर्दनाक यादें ताजा कर दी हैं। फिल्म में मृत दिखाए गए किक्कर खुद को जीवित पाकर खुशकिस्मत मानते हैं। उन्हें याद है कि कैसे उन्होंने खालरा का आखिरी संदेश उनके परिवार तक पहुंचाया था।
तरनतारन के जौड़ा गांव के रहने वाले थे खालरा : किक्कर
जसवंत सिंह उस समय 24 साल के थे और तरनतारन के जौड़ा गांव के रहने वाले थे। जौड़ा गांव उस समय अमृतसर जिले का हिस्सा था। उनका परिवार 1989 में उग्रवाद के चरम पर लुधियाना चला गया था, क्योंकि उन्हें डर था कि पुलिस उनके बच्चों को फर्जी मुठभेड़ों में मार सकती है। किक्कर ने बताया कि उन्हें सबसे पहले जमीन के एक विवाद के मामले में पकड़ा गया था और झबाल चौकी में रखा गया था। बाद में उन्हें कांग चौकी ले जाया गया और उसी सेल में रखा गया जहां खालरा को रखा गया था। (Kikkar Singh)
कांग चौकी में खालरा को प्रताड़ित किया जा रहा था
किक्कर ने बताया कि कांग चौकी में खालरा को प्रताड़ित किया जा रहा था और उन्होंने उनसे कहा था, मैं जल्लादों के चंगुल में फंस गया हूं । किक्कर का दावा है कि खालरा को इतनी बुरी तरह प्रताड़ित किया गया था कि वे उन्हें दी गई रोटी भी नहीं उठा पा रहे थे। किक्कर ने कहा, मैंने ही उन्हें लगभग डेढ़ रोटी दी थी। मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह खालरा का आखिरी खाना साबित होगा, क्योंकि बाद में उन्हें पुलिस स्टेशन से ले जाया गया और वे गायब हो गए। (Kikkar Singh)
अचानक मुलाकात ने जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी
किक्कर ने बताया कि खालरा से हुई एक अचानक मुलाकात ने उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। उन्होंने कहा कि उन्हें 4 सितंबर को पुलिस ने पकड़ा था और झबाल पुलिस चौकी में रखा था। 6 सितंबर को खालरा को स्टेशन लाया गया था, लेकिन कुछ ही मिनटों में उन्हें वहां से ले जाया गया। किक्कर ने कहा, वहां हलचल मची थी और मैं यह देखने के लिए उत्सुक था कि किसे लाया गया है। मैंने खालरा को देखा। वे वहां कुछ मिनट के लिए थे और फिर उन्हें ले जाया गया। उन्होंने कहा, मैं अपनी जेब में एक सिक्का रखता था और लॉक-अप की दीवार पर कुछ-कुछ लिखता रहता था। मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि बाद में यही चीज उइक के ट्रायल में सबसे अहम सबूत साबित होगी। (Kikkar Singh)
कांग पुलिस चौकी में लोगों को टॉर्चर किया जाता था
किक्कर को 14 सितंबर को रिहा किया गया, लेकिन 14 अक्टूबर को उन्हें फिर से पकड़ लिया गया। उन्होंने कहा, पहले मुझे पंडोरी सिदवान पुलिस चौकी में रखा गया। 24 अक्टूबर की सुबह मुझे कांग पुलिस चौकी ले जाया गया। सब जानते थे कि यह वह जगह है जहां पुलिस द्वारा पकड़े गए लोगों को टॉर्चर किया जाता था। लॉक-अप के एक कोने में जसवंत सिंह खालरा बैठे थे। वह नजारा मैं कभी नहीं भूल सकता। उन्होंने एक कंबल ओढ़ रखा था और कोने में बैठे थे।
किक्कर ने कहा, अचानक एक वायरलेस मैसेज आया, ‘क्यूबैक 2 चार्ली’। यह डीएसपी जसपाल सिंह का कोड नेम था। कहा गया, ‘जानकी सर किलो’ को ले आओ — यह जसवंत सिंह खालरा का कोड नेम था। इसका मतलब था कि डीएसपी जसपाल सिंह खालरा को बुला रहे थे। पुलिस वाले उन्हें ले जाना चाहते थे, किक्कर ने याद करते हुए बताया, मैंने उनसे कहा कि खालरा ने सुबह से कुछ नहीं खाया है।
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