फरीदाबाद: मां-बाप अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को पालने-पोसने, उन्हें पढ़ाने-लिखाने और उनके बेहतर भविष्य के लिए लगा देते हैं. उन्हें उम्मीद रहती है कि बुढ़ापे में यही बच्चे उनका सहारा बनेंगे, लेकिन जब उन्हीं बच्चों के घर में मां के लिए जगह नहीं बचती, तो उसका दर्द शब्दों में बयां करना मुश्किल हो जाता है. झारखंड की रहने वाली 55 वर्षीय राजकुमारी देवी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. जिस बेटे को उन्होंने बड़ी मुश्किलों से पढ़ाया-लिखाया, वह रेलवे में लोको पायलट बन गया, लेकिन बुढ़ापे में उसी मां को घर से बाहर निकलना पड़ा. कभी गलियों में भटककर तो कभी लोगों से मांगकर पेट भरने वाली राजकुमारी देवी आज फरीदाबाद के ताऊ देवी लाल वृद्धाश्रम में रह रही हैं.
Local18 से बातचीत में राजकुमारी देवी बताती हैं कि मेरे परिवार में पति, दो बेटे और एक बेटी है, बेटी को मैने अपनी बहन से गोद लिया था. बड़े बेटे को पढ़ाने-लिखाने के लिए मैने काफी मेहनत की. बेटे को लायक बनाया इस लायक बनाया उसने रेलवे में नौकरी हासिल की और उसके बाद बेटे की शादी भी हो गई. आज उसके दो बच्चे हैं. राजकुमारी देवी के मुताबिक, बेटे और बहू के साथ रहते हुए मेरे साथ मारपीट करते थे. हालात ऐसे हो गए कि मुझे अपने ही घर में रहना मुश्किल हो गया.
बेटी को पीटते देख मां का दिल टूट गया
राजकुमारी देवी बताती हैं कि बड़े बेटे के घर में मेरी गोद ली हुई बेटी के साथ भी मारपीट होती थी. बेटी को घर में बंद करके पीटा जाता था. मैं मां होने के नाते अपनी बेटी को इस तरह पिटते हुए नहीं देख सकती थीं. बेटी की तकलीफ देखकर मैं बीच में बोलती थीं, लेकिन इसके बाद मेरे साथ भी मारपीट होती थी. एक बार तो मुझे बुरी तरह पीटने के बाद घर का सामान बाहर निकाल दिया गया. छोटे बेटे ने भी मुझे अपने साथ रखने से मना कर दिया. बेटे ने मुझे अपना सामान उठाकर चले जाने के लिए कह दिया.
20 दिन तक सड़कों पर भटकती रहीं
घर से निकलने के बाद राजकुमारी देवी के सामने सबसे बड़ी चुनौती पेट भरने की थी. राजकुमारी देवी बताती है मैं 20 से 22 दिन तक इधर-उधर भटकती रहीं. कभी किसी ने खाने को दे दिया, तो कभी किसी ने साड़ी या चप्पल देकर मदद की. इसी तरह दिन गुजरते रहे. भटकते-भटकते मैं जम्मू पहुंच गईं और वैष्णो देवी मंदिर के आसपास भी रहीं. वहां किसी ने मुझे फरीदाबाद के वृद्धाश्रम के बारे में बताया. इसके बाद मैं यहां पहुंचीं और अब इसी वृद्धाश्रम में रह रही हूँ. पति अभी भी वहीं रहते हैं, जहां परिवार रहता है. मुझे वृद्धाश्रम में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं है. यहां समय पर चाय-नाश्ता और खाना मिल जाता है. फिलहाल मुझे यहां सहारा मिला हुआ है.
लेकिन जिस मां ने अपने बच्चों के भविष्य के लिए पूरी जिंदगी लगा दी, उसके लिए अपनों से दूर होकर वृद्धाश्रम में दिन गुजारना किसी दर्द से कम नहीं है. यह उस मां की कहानी है जिसका बेटा रेलवे में लोको पायलट है महीने की 1 लाख रूपये सैलरी है. मां की बदौलत ही आज यह सरकारी नौकरी है उसी मां को घर से निकाल दिया.
