अंबाला. सर्दियों में कड़ाके की ठंड और पाले के कारण जहां किसान बेलवाली सब्जियों की खेती करने से बचते हैं, अब लो-टनल तकनीक उनकी इस परेशानी को दूर कर सकती है. इस तकनीक से किसान सर्दियों में भी खीरा, लौकी, तोरी, करेला, तरबूज और खरबूजे जैसी सब्जियां उगा सकते हैं. अगेती फसल तैयार करके किसान जनवरी-फरवरी में बाजार में उतार सकते हैं, जब इन सब्जियों की आवक कम होने से बेहतर भाव मिलने की संभावना रहती है. हरियाणा सरकार की ओर से लो-टनल और मल्चिंग तकनीक अपनाने पर पात्र किसानों को 50 प्रतिशत तक अनुदान सहायता भी दी जा रही है. लोकल 18 से अंबाला बागवानी विभाग के जिला अधिकारी डॉ. सत्यनारायण बताते हैं कि लो-टनल तकनीक में खेत में तैयार क्यारियों के ऊपर बांस की खपच्चियों, पीवीसी पाइप या लोहे की सरियों से धनुषाकार ढांचा बनाया जाता है. इसके ऊपर पारदर्शी पॉलीथिन की चादर लगाकर फसल को ढक दिया जाता है. इससे पौधों को ठंडी हवा, ओस और पाले के प्रभाव से बचाने में मदद मिलती है.
कब से कब तक बुवाई
डॉ. सत्यनारायण कहते हैं कि टनल के अंदर तापमान बाहर के मुकाबले अधिक रह सकता है, जिससे पौधों की बढ़वार और शुरुआती विकास में मदद मिलती है. किसान आने वाले सीजन में बेलवाली सब्जियों की खेती के लिए लो-टनल तकनीक अपना सकते हैं. नवंबर-दिसंबर में बुवाई करने पर फसल उचित देखभाल और मौसम के अनुसार फरवरी-मार्च तक तैयार हो सकती है. अगेती खेती के लिए अक्टूबर के अंत से नवंबर के मध्य तक बुवाई की योजना भी बनाई जा सकती है. फसल और किस्म के हिसाब से बुवाई का समय तय करना जरूरी है. डॉ. सत्यनारायण बताते हैं कि सर्दियों में खुले खेतों में बेलवाली सब्जियों की खेती करना चुनौतीपूर्ण होता है. ऐसे में लो-टनल तकनीक से तैयार अगेती फसल किसानों के लिए कमाई का अवसर बन सकती है. जनवरी-फरवरी में बाजार में खीरे और दूसरी बेलवाली सब्जियों की आवक कम होने पर कुछ परिस्थितियों में थोक भाव 40 से 60 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिल सकते हैं. हालांकि, वास्तविक भाव सब्जी की किस्म, गुणवत्ता, स्थानीय मंडी और उस समय की मांग पर निर्भर करेंगे.
कहां करें संपर्क
जिला बागवानी अधिकारी के मुताबिक राज्य सरकार की ओर से लो-टनल और मल्चिंग तकनीक अपनाने वाले पात्र किसानों को 50 प्रतिशत तक अनुदान सहायता दी जा रही है. मल्चिंग के लिए अधिकतम 5 एकड़ और लो-टनल तकनीक के लिए 10,000 वर्ग मीटर तक सहायता का लाभ मिल सकता है. योजना की मौजूदा शर्तों और पात्रता की पुष्टि किसान संबंधित बागवानी कार्यालय से कर सकते हैं. योजना का लाभ लेने के लिए किसानों को मेरी फसल मेरा ब्यौरा और बागवानी विभाग के पोर्टल पर पंजीकरण कराना होगा. परिवार पहचान पत्र सहित जरूरी दस्तावेजों की जानकारी भी विभाग से लेनी चाहिए.
सिरों को रोज खोलना जरूरी
डॉ. सत्यनारायण बताते हैं कि लो-टनल तकनीक अपनाने के लिए किसान सबसे पहले खेत में क्यारियां तैयार करें. इसके बाद ड्रिप सिंचाई की पाइप बिछाकर सिल्वर-ब्लैक प्लास्टिक मल्चिंग लगाएं.मल्चिंग में उचित दूरी पर छेद करके उन्नत किस्म के बीज बोएं और क्यारियों के ऊपर लो-टनल का ढांचा तैयार कर पारदर्शी पॉलीथिन से ढक दें. ड्रिप सिंचाई से पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है, जबकि मल्चिंग मिट्टी में नमी बनाए रखने और खरपतवार कम करने में मदद करती है. दिसंबर और जनवरी में तेज धूप निकलने पर दोपहर में जरूरत के अनुसार टनल के सिरों को 2 से 3 घंटे के लिए खोलना चाहिए, ताकि अतिरिक्त गर्मी और नमी बाहर निकल सके.

