नई दिल्ली. मोहन दास करमचंद गांधी एक ऐसा नाम जिसे दुनियाभर में अहिंसा के पुजारी के तौर पर जाना जाता है. सुभाष चंद्र बोस ने उनको महात्मा की उपाधि दी. 20वीं सदी में भी उनके अहिंसा से सिद्धांत पर दुनिया चल रही है. उनकी सत्याग्रह की विचारधारा ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को दिशा दी. देश ही नहीं विदेश में भी गांधी जी के विचारों को मानने वाले लोग हैं. इसके बाद भी उनको कभी नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला.
यह सवाल हर किसी के मन में उठता है. ऐसा नहीं था कि पुरस्कार के लिए उनके नाम पर विचार नहीं हुआ. गांधी को 1937, 1938, 1939, 1947 और 1948 में कुल पांच बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया था. कई मौकों पर वह नॉर्वेजियन नोबेल समिति की शॉर्टलिस्ट में भी शामिल रहे. बाद में नोबेल समिति के सदस्यों ने गांधी को पुरस्कार नहीं दिए जाने पर सार्वजनिक रूप से अफसोस जताया. 1989 में जब दलाई लामा को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया, तब समिति के अध्यक्ष ने कहा था कि यह पुरस्कार “कुछ हद तक महात्मा गांधी की स्मृति को श्रद्धांजलि” था.
महात्मा गांधी जब भारत की आजादी के लिए अहिंसा आंदोलन कर रहे थे जब पहली बार 1937 में नॉर्वे की संसद के लेबर पार्टी सदस्य ओले कोल्ब्योर्नसेन ने नामित किया था. उनका नाम नोबेल शांति पुरस्कार के लिए शॉर्टलिस्ट किए गए 13 उम्मीदवारों में शामिल किया गया था. उस समय तक गांधी अहिंसा को अपने राजनीतिक संघर्ष का प्रमुख सिद्धांत बना चुके थे. साउथ अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष के दौरान उन्होंने सत्याग्रह की अवधारणा विकसित की. उन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ अहिंसक आंदोलन का इस्तेमाल किया. नोबेल समिति के सलाहकार प्रोफेसर जैकब वॉर्म-म्यूलर ने गांधी की राजनीति को लेकर कुछ सवाल भी उठाए. 1937 का नोबेल शांति पुरस्कार लॉर्ड सेसिल ऑफ चेलवुड को दिया गया. कोल्ब्योर्नसेन ने 1938 और 1939 में भी गांधी को नामित किया, लेकिन उन्हें पुरस्कार नहीं मिला.
1947 में भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिली. गांधी जी को एक बार फिर नोबेल शांति पुरस्कार की शॉर्टलिस्ट किया गया. उस साल उन्हें भारत की ओर से नॉर्वे के विदेश मंत्रालय की तरफ से नॉमिनेट किया था. वह छह उम्मीदवारों की लिस्ट में शामिल थे.इस बार समिति के लिए तैयार किया गया गांधी का मूल्यांकन पहले की तुलना में काफी सकारात्मक था. इतिहासकार जेन्स अरूप सेप ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ गांधी के संघर्ष, द्वितीय विश्व युद्ध में भारत की भूमिका और हिंदू-मुस्लिम संघर्ष जैसे मुद्दों पर उनके काम को लेकर चर्चा की थी. भारत का विभाजन और उसके बाद हुई व्यापक हिंसा समिति के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई. समिति के पांच में से तीन सदस्य गांधी को पुरस्कार देने के खिलाफ रहे. 1947 का नोबेल शांति पुरस्कार क्वेकर्स को दिया गया.
इसके बाद अगले साल जब उनका नाम इस लिस्ट में शामिल किया जाना था तो 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई. नोबेल शांति पुरस्कार के नामांकन की अंतिम तारीख से सिर्फ दो दिन पहले उनकी मृत्यु हो गई. समिति को गांधी के नाम पर छह नामांकन पत्र मिले थे. इसमें कुछ पूर्व नोबेल पुरस्कार विजेताओं के नामांकन शामिल थे. गांधी की मृत्यु के बाद समिति के सामने एक अभूतपूर्व सवाल था—क्या नोबेल शांति पुरस्कार मरणोपरांत दिया जा सकता है? आखिरकार 18 नवंबर 1948 को नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने उस वर्ष नोबेल शांति पुरस्कार नहीं देने का फैसला किया।

