दिल्ली : पराली… जिसका नाम आते ही दिमाग में धुआं, प्रदूषण और हर साल बढ़ता संकट याद आता है। लेकिन अब यही पराली समस्या नहीं, बल्कि समाधान और कमाई का जरिया बनती नजर आ रही है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज के कुछ छात्रों ने पराली को लेकर एक बेहद अनोखी और पर्यावरण के लिए फायदेमंद पहल शुरू की है। कॉलेज की सामाजिक उद्यमिता सोसायटी से जुड़े करीब 15 छात्र–छात्राएं ‘प्रोजेक्ट वरक’ के तहत खेतों में जलाई जाने वाली पराली से ईको–फ्रेंडली प्लेट और बाकि प्रोडक्ट्स तैयार कर रहे हैं।
इस पहल की सबसे खास बात यह है कि इन प्लेटों को बनाते समय इनके अंदर टमाटर, सरसों और दूसरी सब्जियों के बीज भी डाले जाते हैं। यानी जब लोग इन प्लेटों में खाना खाकर इन्हें फेंकने की बजाय मिट्टी में दबा देते हैं, तो कुछ समय बाद ये प्लेटें मिट्टी में पूरी तरह घुल जाती हैं और वहीं से नए पौधे उगने लगते हैं। इस तरह यह अनोखा प्रयोग सिर्फ पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को कम करने में ही मदद नहीं कर रहा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और हरित जीवनशैली को भी बढ़ावा दे रहा है।
रामजस कॉलेज के सेकेंड इयर के छात्र अश्मित बताते हैं कि इस योजना का उद्देश्य कृषि अपशिष्ट को जलाने की समस्या को कम करके उसे उपयोगी और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों में बदलना है। इसी सोच के तहत धान की पराली से डिस्पोजेबल प्लेट, अंडे रखने की ट्रे और बीजों से युक्त हैंड मेड पेपर जैसे प्रोडक्ट तैयार किए जा रहे हैं। ये सभी उत्पाद पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल हैं। यानि ऐसी चीज़ जो समय के साथ खुद–ब–खुद मिट्टी में गलकर खत्म हो जाए और प्रकृति को नुकसान न पहुंचाए।
फिलहाल इस प्रोजेक्ट के तहत हर महीने दो हजार से ज्यादा प्लेटें तैयार की जा रही हैं, जिन्हें गुरुद्वारों के लंगर, भंडारों और कॉरपोरेट इवेंट्स में सप्लाई किया जाता है। इस पहल में किसान, छात्र और स्थानीय लोग, तीनों की भागीदारी है। छात्र पहले किसानों से पराली लेते हैं, फिर उसे पीसकर एक खास प्रक्रिया से गुजारते हैं और आखिर में उससे प्लेट और बाकि उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इस काम में स्थानीय मजदूरों की भी मदद ली जाती है, जिन्हें प्रति घंटे के हिसाब से मजदूरी दी जाती है। इससे एक तरफ पराली का सही इस्तेमाल हो रहा है और दूसरी तरफ लोगों को रोजगार भी मिल रहा है।
प्रोजेक्ट से जुड़े बाकि छात्र बताते हैं कि एक एनजीओ की मदद से वे हरियाणा और पंजाब के किसानों, गांव के प्रधानों और पंचायतों से संपर्क कर पराली खरीदते हैं। इससे किसानों को अतिरिक्त आय मिलती है और पराली जलाने की मजबूरी भी कम होती है। यानी एक छोटी सी छात्र पहल अब प्रदूषण कम करने, पर्यावरण बचाने और रोजगार पैदा करने का बड़ा मॉडल बनती नजर आ रही है। अब सवाल यह है कि जब छात्र इतने सीमित संसाधनों में इतना बड़ा काम कर सकते हैं, तो क्या राज्य सरकारों को भी इस तरह की पहल को बड़े स्तर पर बढ़ावा नहीं देना चाहिए?
