Noida Protest Updates, (द भारत ख़बर), नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा में न्यूनतम मजदूरी की मांगों को लेकर चल रहे मजदूरों के विरोध प्रदर्शन पर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने मंगलवार को कहा कि वह प्रदर्शनकारी मजदूरों के साथ खड़े हैं। सोमवार को पुलिस के साथ झड़प के बाद ये विरोध-प्रदर्शन हिंसक हो गए थे, जिसमें पत्थरबाजी हुई और गाड़ियों में आग लगा दी गई। बता दें कि नोएडा का मज़दूर 20,000 रुपए वेतन की मांग कर रहा है।
सोमवार को जो हुआ, वह देश के मजदूरों की आखिरी चीख
राहुल ने एक पोस्ट में लिखा, सोमवार को नोएडा की सड़कों पर जो हुआ, वह इस देश के मजदूरों की आखिरी चीख थी। एक ऐसी आवाज जिसे हर बार नजरअंदाज किया गया, जो लगातार मिन्नतें करते-करते थक गई थी। नोएडा में एक मजदूर की मासिक तनख्वाह 12,000 रुपए होती है, जबकि किराए पर 4,000-7,000 रुपए खर्च हो जाते हैं। जब तक उसे सालाना 300 रुपए की वेतन वृद्धि मिलती है, तब तक मकान मालिक किराया 500 रुपए सालाना बढ़ा देता है।
वैश्विक आर्थिक दबावों, सरकार के श्रम सुधारों की आलोचना की
कांग्रेस सांसद ने कहा कि बढ़ती महंगाई और रुकी हुई मज़दूरी, मज़दूरों का दम घोंट रही है और उन्हें कर्ज़ के गहरे दलदल में धकेल रही है। उन्होंने इसे विकसित भारत का सच बताया और प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों के प्रति अपना समर्थन जताया। उन्होंने वैश्विक आर्थिक दबावों और सरकार के श्रम सुधारों के असर की भी आलोचना की। उन्होंने दावा किया कि मज़दूरों को लंबे समय तक काम करने और आर्थिक तंगी झेलने पर मजबूर किया जा रहा है, जबकि उद्योगपतियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है।
दुनिया में आसमान छू रही ईंधन की कीमतें
राहुल ने कहा, जब तक मज़दूर की सैलरी बढ़ती है, तब तक यह बेकाबू महंगाई उसकी जान निकाल लेती है, उसे कर्ज़ के गहरे दलदल में डुबो देती है। उन्होंने कहा, क्या यही है ‘विकसित भारत’ का सच। गैस संकट के इस दौर में, इन मज़दूरों ने शायद घर में चूल्हा जलाने के लिए ही एक सिलेंडर के लिए 5,000 रुपए तक खर्च कर दिए होंगे। यह सिर्फ़ नोएडा की बात नहीं है। और न ही यह सिर्फ़ भारत की बात है। राहुल ने एक पोस्ट में लिखा, दुनिया भर में ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं—पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण सप्लाई चेन टूट गई है। लेकिन अमेरिका के टैरिफ युद्ध, वैश्विक महंगाई, टूटती सप्लाई चेन—इन सब का बोझ मोदी जी के दोस्त उद्योगपतियों पर नहीं पड़ा है।
सरकार ने नवंबर 2025 से लेबर कोड लागू किए
एक और अहम मुद्दा—मोदी सरकार ने बिना किसी से सलाह-मशविरा किए, जल्दबाज़ी में एक फ़ैसला लेते हुए नवंबर 2025 से 4 लेबर कोड लागू कर दिए हैं, जिससे काम के घंटे बढ़ाकर 12 घंटे प्रतिदिन कर दिए गए हैं। वह मज़दूर जो हर दिन 12-12 घंटे खड़ा होकर काम करता है, और फिर भी अपने बच्चों की स्कूल फ़ीस भरने के लिए कर्ज़ लेता है—क्या उसकी मांग बेतुकी है? और वह जो हर दिन उसके अधिकारों को कुचल रहा है, क्या यही विकास है?
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