
- मुंबई के विक्रोली इलाके से हुई कामयाबी की शुरुआत
Success Story, (द भारत ख़बर), मुंबई: देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के अभिषेक वैश्य ने छोटी उम्र में, गरीबी में रहे अपने माता-पिता के लिए 1 करोड़ रुपए का फलैट खरीदकर मिसाल पेश की है। यही नहीं अभिषेक चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) बन गए हैं और वह खाड़ी देशों ओमान और यूएई में कंपनियों को कॉर्पोरेट रणनीति तथा वित्त पर सलाह देते हैं। एक रिपोर्ट में दर्शाया गया है कि किस तरह अभिषेक की कामयाबी की शुरुआत मुंबई के विक्रोली इलाके में अपने पिता के साथ ठेले पर सब्जी बेचने से हुई और कैसे वह ओमान में एक उद्यमी बन गए। सब्जी बेचने वाले के बेटे अभिषेक चाहते थे कि उनके माता-पिता अच्छी जगह पर रहें।
गेटेड कम्युनिटी में है 2 बीएचके फ्लैट
यही सोचकर उन्होंने अपने पैरेंट्स के लिए महज 21 साल की उम्र में मुंबई के बाहरी इलाके ठाणे में एक करोड़ रुपए का घर खरीदने का जोखिम उठाया। यह 2 बीएचके फ्लैट एक गेटेड कम्युनिटी में स्थित है। अभिषेक ने अपने पिता का उन्हें अच्छी शिक्षा दिलवाने के लिए आभार जताया। उन्होंने कहा, असंख्य परिशानियों के बावजूद उनके पिता ने यह सुनिश्चित किया कि हमें बेहतर शिक्षा मिले।अभिषेक का पालन-पोषण 150 वर्ग फुट के एक साधारण से घर में हुआ। परिवार के 5 सदस्य एक ही घर में रहते थे। ऐसी स्थितियों ने ही अभिषेक को कुछ बड़ा करने पर मजबूर किया। अभिषेक ओमान में सीए के अलावा एक क्लाउड किचन व्यवसाय भी चलाते हैं। छोटी उम्र में बुलंदियों छूने की कहानी अभिषेक के सिर्फ भाग्य की बदौलत नहीं थी, बल्कि यह उनकी कड़ी मेहनत का नतीजा है।
पिता की मदद के लिए सुबह जल्द उठ जाते थे अभिषेक
अभिषेक ने बताया कि वह स्कूल की पढ़ाई के शुरुआती दिनों में पिता के साथ सब्जियां बेचने की खातिर सुबह जल्दी उठ जाता था। यही नहीं, जब इस लड़के ने सीए और कॉलेज की इंटर्नशिप की तब भी वह सुबह पहले उठकर अपने पिता के साथ बाजार जाता था। इसके अलाव वह क्लासेज अटेंड करता और फिर रात में पढ़ाई करता था। अभिषेक 18-18 घंटे स्टडी करते थे।
मैं किसी तरह मैनेज कर लेता था : अभिषेक
अभिषेक ने कहा, मैं किसी तरह मैनेज कर लेता था। उन्होंने कहा, मैं रात में पढ़ाई करता था। सीए के एग्जाम की तैयारी के लिए जो 3-4 महीने का ब्रेक मिलता था, उस दौरान मैं यह सुनिश्चित करता था कि मैं प्रतिदिन 16 से 18 घंटे पढ़ाई करूं,ह्व उन्होंने खुलासा किया। अभिषेक ने कहा, मेरे पिता की आमदनी अनियमित थी। कभी-कभी उन्हें 200 रुपए मिलते थे, कभी-कभी 400 रुपए। कई बार तो उनकी आमदनी घाटे में भी जाती थी।
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