
आंध्र प्रदेश में सर्वाधिक 16,357 सिंगल टीचर
Single Teacher, (द भारत ख़बर), नई दिल्ली: देश में एक लाख से ज्यादा स्कूल एक टीचर के भरोसे चल रहे हैं। इनमें सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और प्राइवेट सभी स्कूल शामिल हैं। ये आंकड़े शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने राज्यसभा में टीचरों के खाली पदों से जुड़े एक सवाल के जवाब में दिए। हालांकि सवाल में खास तौर पर सरकारी स्कूलों के डेटा की मांग की गई थी, लेकिन सिंगल-टीचर वाले स्कूलों के बारे में दी गई जानकारी में सभी तरह के मैनेजमेंट वाले स्कूल शामिल हैं। मंत्रालय ने राज्यों के हिसाब से मंजूर पदों या खाली जगहों की जानकारी नहीं दी।
सूची में आंध्र प्रदेश टॉप पर, झारखंड दूसरे स्थान पर
UDISE+ के 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में सभी तरह के मैनेजमेंट वाले कुल 1,00,843 स्कूल ऐसे हैं जिनमें सिर्फ एक टीचर है। आंध्र प्रदेश 16,357 ऐसे स्कूलों के साथ लिस्ट में सबसे ऊपर है जो देश के कुल ऐसे स्कूलों का 16% से ज्यादा है। इसके बाद झारखंड (9,827) और महाराष्ट्र (9,269) का नंबर आता है। कर्नाटक में 8,042, यूपी में 7,874, राजस्थान में 7,200 और पश्चिम बंगाल में 6,769 ऐसे स्कूल हैं।
तेलंगाना में ऐसे 4,793, तमिलनाडु में 3,957 और असम में 3,159 स्कूल हैं। हिमाचल प्रदेश में 3,128, उत्तराखंड में 2,655 और छत्तीसगढ़ में 2,461 स्कूल हैं। दूसरी ओर, केरल में 67, नागालैंड में 35, सिक्किम में 31, लद्दाख में 28 स्कूल में सिर्फ एक टीचर हैं। दिल्ली में सात और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में एक स्कूल में सिर्फ एक टीचर हैं।
राज्यों को पारदर्शी और मेरिट-आधारित भर्ती प्रक्रिया से पद भरें के निर्देश
इसमें खाली पदों की वजह रिटायरमेंट, इस्तीफा, नए पद बनाना, स्टाफ को सही तरीके से व्यवस्थित करना और एनरोलमेंट में बदलाव (जिसमें ग्रामीण, आदिवासी और आकांक्षी जिले भी शामिल हैं) को बताया गया। केंद्र ने कहा कि राज्यों को लगातार सलाह दी जाती रही है कि वे पारदर्शी और मेरिट-आधारित भर्ती प्रक्रिया से पद भरें और शिक्षकों की जरूरत का अनुमान लगाने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करें।
भारत के स्कूलों का हाल
शिक्षा मंत्रालय ने बताया कि स्टूडेंट-टीचर अनुपात प्राइमरी लेवल पर 19, अपर प्राइमरी पर 17, सेकेंडरी पर 15 और हायर सेकेंडरी पर 23 है। ये सभी राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत तय सीमा के भीतर हैं। हालांकि, एक-टीचर वाले स्कूलों के आंकड़े बताते हैं कि अच्छे राष्ट्रीय औसत के पीछे टीचरों की उपलब्धता में स्थानीय स्तर पर भारी असंतुलन छिपा हुआ है।
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