फरीदाबाद. खेतों में किसान दिन रात मेहनत करता है, लेकिन जब फसल बाजार में पहुंचती है तो उसकी मेहनत का सही दाम नहीं मिल पाता है. कभी मौसम फसल बिगाड़ देता है तो कभी मंडी में रेट गिर जाता है. ऐसी ही कहानी फरीदाबाद के डीग गांव की एक महिला किसान की है, जिसने घीया की खेती का तरीका तो बदल दिया, लेकिन खेती से होने वाली कमाई की चिंता आज भी बनी हुई है. इस किसान ने मचान और जाल पर घीया की खेती शुरू की है, ताकि बरसात में फसल खराब न हो और पैदावार बेहतर हो सके. किसान की मेहनत सिर्फ ज्यादा कमाई के लिए नहीं है, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य का सपना पूरा करने के लिए भी है.
लोकल 18 से किसान सुनीता बताती हैं कि मैंने इस बार एक एकड़ जमीन में घीया की खेती की है. इस बार घीया को जमीन पर फैलाने के बजाय जाल और मचान पर चढ़ाया है. जमीन पर घीया लगाने से बरसात के मौसम में फसल खराब होने का खतरा रहता है. जाल पर खेती करने से घीया जमीन से ऊपर रहता है और बरसात में फसल को नुकसान कम होता है. इसी वजह से खेती का तरीका बदला है.
अभी कितनी कीमत
सुनीता बताती हैं कि जाल पर घीया की खेती करने से पैदावार ठीक हो रही है, लेकिन बाजार में रेट अभी भी ज्यादा नहीं है. बल्लभगढ़ मंडी में घीया करीब 15 रुपये किलो के रेट पर जा रहा है. अगर रेट 30 रुपये किलो तक पहुंच जाए तो किसान को कुछ फायदा हो सकता है. मौजूदा रेट में आढ़ती को फायदा हो रहा है, लेकिन किसान को उतना लाभ नहीं मिल रहा है. इतनी मेहनत के बाद भी परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है. सुनीता के मुताबिक, जाल पर घीया की खेती में लागत भी ज्यादा आती है और मेहनत भी ज्यादा करनी पड़ती है. एक एकड़ में 60 से 70 हजार रुपये की लागत आती है. करीब 50 मजदूरों की जरूरत पड़ी. जाल पर खेती करने के बाद भी कीड़े लगने की समस्या रहती है. फसल बचाने के लिए दवा का छिड़काव करना पड़ता है. 5 बार जुताई करनी पड़ती है. एक एकड़ में 3 किलो बीज लगता है.
निकलता गया समय
सुनीता बताती हैं कि कई सालों से खेती कर रही हूं, लेकिन खेती से ऐसा मुनाफा नहीं हो पाया जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर हो सके. कभी मौसम नुकसान कर देता है तो कभी फसल का रेट कम हो जाता है. हाल ही में गेहूं की फसल भी ओलावृष्टि की वजह से खराब हो गई. सुनीता कहती हैं कि मेरे दो बेटे हैं. बड़ा बेटा 12वीं कर चुका है और छोटा बेटा 12वीं में पढ़ रहा है. बड़ा बेटा डॉक्टर बनना चाहता था और उसने एमबीबीएस में दाखिले के लिए नीट की परीक्षा भी दी. बेटे ने तीन बार परीक्षा दी, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से उसका डॉक्टर बनने का सपना पूरा नहीं हो सका. एक बार नीट की परीक्षा भी रद्द हो गई थी और इसके बाद बेटे की पढ़ाई का समय भी निकलता गया.
बस इतनी चाहत
सुनीता बताती हैं कि परिवार के पास प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की फीस देने के लिए पैसे नहीं हैं. अब उम्मीद इसी खेती से जुड़ी है. अगर घीया का सही रेट मिल जाए और फसल की अच्छी कीमत बाजार में मिले तो परिवार को कुछ राहत मिल सकती है. मैं चाहती हूं कि खेती से इतना मुनाफा हो कि घर का खर्च चल सके और बच्चों की पढ़ाई भी अच्छी तरह हो सके. किसान की मेहनत का सही दाम मिलना जरूरी है, क्योंकि किसान सिर्फ फसल नहीं उगाता, वह अपने परिवार के भविष्य के सपने भी खेत में बोता है.

