Somnath Non-Veg Ban Row: गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के आसपास नॉन-वेज की बिक्री और तैयारी पर लगी रोक फिलहाल जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इस प्रतिबंध को हटाने से इनकार कर दिया। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने रेस्टोरेंट मालिकों की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि इस मामले में संतुलन बनाए रखने की जरूरत है। अदालत ने गुजरात हाई कोर्ट के अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया और हाई कोर्ट से मामले की सुनवाई जल्द पूरी कर अंतिम फैसला सुनाने का अनुरोध किया। सुनवाई के दौरान अदालत ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि दिवाली मिठाई खाकर मनाइए और वेज-नॉनवेज को फिलहाल अलग रखिए।
रेस्टोरेंट मालिकों ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी?
सोमनाथ मंदिर के आसपास नॉन-वेज भोजन पर प्रतिबंध से प्रभावित रेस्टोरेंट और होटल संचालकों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने दलील दी कि इस प्रतिबंध से वर्षों से कारोबार कर रहे प्रतिष्ठानों का व्यवसाय पूरी तरह प्रभावित हो रहा है। उन्होंने अदालत में कहा कि देश की लगभग 80 फीसदी आबादी मांसाहारी है और लोगों की खानपान की पसंद व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि किसी विशेष क्षेत्र में मांसाहारी भोजन की बिक्री और तैयारी पर पूरी तरह रोक कैसे लगाई जा सकती है। इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि ऐसे मामले में संतुलन बनाए रखना जरूरी है और फिलहाल अदालत इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहती। अदालत ने प्रतिबंध हटाने की मांग स्वीकार नहीं की।
10 अगस्त के आदेश से शुरू हुआ था पूरा विवाद
दरअसल यह पूरा मामला गिर सोमनाथ के जिला मजिस्ट्रेट की ओर से 10 अगस्त 2026 को जारी अधिसूचना से जुड़ा है। इस आदेश के तहत सोमनाथ मंदिर के 500 मीटर के दायरे और मंदिर की ओर जाने वाले सात निर्धारित रास्तों पर मांस, मछली, अंडे और अन्य मांसाहारी व्यंजनों की तैयारी, बिक्री और भंडारण पर प्रतिबंध लगाया गया था। यह पाबंदी दुकानों, होटलों, रेस्टोरेंट और सड़क किनारे लगने वाले खाने-पीने के स्टॉल पर लागू की गई थी। प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ स्थानीय रेस्टोरेंट संचालकों ने गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। उनका कहना था कि वे लंबे समय से इस क्षेत्र में कारोबार कर रहे हैं और इस तरह की रोक उनके व्यवसाय और आजीविका को गंभीर नुकसान पहुंचा रही है।
गुजरात हाई कोर्ट में पहले मिली राहत, फिर लगा बैन
30 अक्टूबर को गुजरात हाई कोर्ट की जस्टिस निशा एम. ठाकोर की एकल पीठ ने रेस्टोरेंट संचालकों की याचिका स्वीकार करते हुए जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया था। इसके बाद कारोबारियों को उम्मीद थी कि वे फिर से मांसाहारी भोजन की बिक्री और तैयारी शुरू कर सकेंगे। हालांकि गुजरात सरकार ने इस फैसले को उसी दिन डिविजन बेंच में चुनौती दे दी। एक्टिंग चीफ जस्टिस मनश रंजन पाठक और जस्टिस निरजार एस. देसाई की पीठ ने एकल पीठ के आदेश पर रोक लगा दी और 10 अगस्त की अधिसूचना को फिर से प्रभावी कर दिया। राज्य सरकार ने दलील दी थी कि दिवाली और गुजराती नववर्ष के दौरान मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ऐसे में मंदिर के आसपास मांसाहारी भोजन की बिक्री से उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं और असुविधा पैदा हो सकती है। इसी अंतरिम आदेश के खिलाफ रेस्टोरेंट मालिक सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।
SC ने हाई कोर्ट को 2 महीने में फैसला देने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल नॉन-वेज बैन को हटाने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि इस मामले में अंतिम निर्णय गुजरात हाई कोर्ट को ही करना है। पीठ ने हाई कोर्ट से अपील की कि वह लंबित मामले की सुनवाई में तेजी लाए और दो महीने के भीतर फैसला सुनाए। सुनवाई के दौरान गुजरात सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि हाई कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर को निर्धारित है। वहीं, रेस्टोरेंट मालिकों की ओर से दलील दी गई कि खानपान की पसंद व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है और कारोबार पर इस तरह की पाबंदी उचित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले के गुण-दोष पर अंतिम टिप्पणी किए बिना याचिका का निपटारा कर दिया।

