पंजाब को कभी पांच दरियाओं, उपजाऊ खेतों, खुले दिल और निडर लोगों की धरती कहा जाता था। आज भी यहां दरिया बहते हैं, खेत लहलहाते हैं और नारों की गूंज सुनाई देती है। लेकिन इन सबके बीच पंजाब के भीतर कुछ ऐसा है, जो धीरे-धीरे और चुपचाप दम तोड़ रहा है।
“कई दरियावां ने पंजाब नूं मेरे,
कि सांस वी हुण सिसकियां भरदे ने।”
ये पंक्तियां आज सिर्फ कविता नहीं लगतीं, बल्कि पंजाब की मौजूदा तस्वीर का बयान नजर आती हैं। हर चुनाव बदलाव की उम्मीद लेकर आता है। हर सरकार नया नारा देती है। हर नेता विकास, रोजगार, खुशहाली, सुरक्षा और बेहतर भविष्य का वादा करता है। लेकिन चुनाव के बाद पंजाब को अक्सर एक और प्रेस कॉन्फ्रेंस, एक और कमेटी, एक और घोषणा और एक और शिलान्यास मिलता है।
शिलान्यास के पत्थर बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन पूरे हो चुके प्रोजेक्ट तलाशने पड़ते हैं।
रोजगार के वादे और विदेश जाने की मजबूरी
पंजाब की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक रोजगार और पलायन का सवाल है। सरकारें रोजगार के आंकड़े और नई नौकरियों की घोषणाएं सामने रखती हैं, वहीं दूसरी तरफ पंजाब के घरों में युवाओं की बातचीत IELTS, स्टडी परमिट, वर्क परमिट और फ्लाइट टिकटों को लेकर होती है।
कई पंजाबी परिवारों में आज सबसे बड़ा करियर काउंसलिंग सेंटर पासपोर्ट ऑफिस बन गया है।
गांवों की गलियां भी इस बदलाव की कहानी कहती हैं। महंगे गेटों वाले घर हैं, लेकिन कई घरों के दरवाजे बंद हैं। खूबसूरत तरीके से बनाए गए मकान हैं, लेकिन उनके मालिक हजारों किलोमीटर दूर रहते हैं। कई बुजुर्ग माता-पिता अपने पोते-पोतियों से वीडियो कॉल पर मिलने का इंतजार करते हैं।
पंजाब ने अपने बच्चों के लिए ऐसे घर बनाए, जिनमें रहने वाले बच्चे खुद कहीं और अपना भविष्य तलाशने चले गए।
गांव खाली हो रहे हैं, खेतों पर दबाव बढ़ रहा है
“जवानी रुलाल निकल्या परदेश दी याद विच,
उजड़े ने पिंड, उजड़ियां ने।”
विदेश जाने की इच्छा अपने आप में कोई त्रासदी नहीं है। बेहतर अवसर की तलाश में दुनिया के किसी भी हिस्से में जाना स्वाभाविक है। असली चिंता तब पैदा होती है जब अपने ही राज्य में रहना युवाओं को भविष्य का विकल्प नहीं, बल्कि मजबूरी दिखाई देने लगे।
दूसरी ओर पंजाब की कृषि व्यवस्था भी कई चुनौतियों से जूझ रही है। कर्ज, घटता मुनाफा, पर्यावरणीय दबाव और खेती से जुड़ी अनिश्चितता ने किसान परिवारों पर लगातार दबाव बनाया है।
जिस कृषि ने पंजाब को देश के खाद्य सुरक्षा तंत्र में महत्वपूर्ण स्थान दिलाया, वही कृषि आज अपने भविष्य को लेकर सवालों के घेरे में है।
प्रदूषण, नशा और कानून-व्यवस्था भी बड़ी चुनौती
पंजाब के सामने समस्याओं की सूची यहीं खत्म नहीं होती।
प्रदूषण, गिरता भूजल स्तर, नशे की समस्या, अपराध और राजनीतिक टकराव जैसे मुद्दे भी लगातार चिंता पैदा करते हैं।
“हवावां विच ने जहर ते फसलां ने उदास ने…”
नागरिक जब अपनी समस्याओं को लेकर आवाज उठाता है तो कई बार प्रशासन की पहली प्रतिक्रिया समस्या को समझने के बजाय उसे नियंत्रित करने की दिखाई देती है।
नागरिक सवाल उठाता है।
सरकार बैरिकेड लगाती है।
नागरिक धरने पर बैठता है।
पुलिस पहुंचती है।
नागरिक जवाब मांगता है।
सरकार प्रेस कॉन्फ्रेंस करती है।
और इस पूरे शोर के बीच असली समस्या कहीं पीछे छूट जाती है।
क्या हर विरोध को कानून-व्यवस्था का मुद्दा बना देना समाधान है?
पंजाब की राजनीति में एक सवाल लगातार उठता रहा है कि क्या जनता की शिकायतों को समझने के बजाय उन्हें कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखना सही है?
न्याय की मांग करने वाला व्यक्ति कभी राजनीतिक कहा जाता है, रोजगार मांगने वाला प्रदर्शनकारी कभी विरोधी बताया जाता है और सरकार के खर्च पर सवाल उठाने वाला व्यक्ति सरकार विरोधी करार दिया जाता है।
लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना किसी नागरिक का अपराध नहीं होना चाहिए।
पंजाब को सवालों को दबाने के नए तरीकों की नहीं, सवालों के जवाब देने की राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।
भ्रष्टाचार पर भाषण बहुत, आम आदमी का सवाल वही
भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के दावे हर सरकार करती है। विपक्ष भी भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर सरकारों पर सवाल उठाता है।
कभी गिरफ्तारी होती है, कभी जांच की घोषणा होती है, कभी कमेटी बनती है और कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस।
लेकिन आम आदमी का सवाल आज भी बेहद सीधा है—
“क्या मेरा काम बिना किसी सिफारिश और प्रभाव के हो जाएगा?”
यही सवाल किसी भी भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की असली परीक्षा है।
समस्या आने पर नई योजना का ऐलान
जब बेरोजगारी का सवाल मुश्किल होता है तो निवेश की बात होने लगती है। अपराध पर सवाल उठें तो उपलब्धियां गिनाई जाती हैं। कर्ज का मुद्दा सामने आए तो विकास की चर्चा शुरू हो जाती है। प्रदर्शन बढ़ें तो साजिश की बात होने लगती है।
और जब हर सवाल असहज हो जाए…
एक नई योजना का ऐलान कर दिया जाता है।
लेकिन जनता सब देख रही है।
वह खाली पड़ी फैक्ट्रियां देख रही है।
वह खाली होते गांव देख रही है।
वह युवाओं को विदेश जाते देख रही है।
वह नशे से टूटते परिवार देख रही है।
वह प्रदूषित पानी और गिरते भूजल स्तर की चिंता देख रही है।
वह राजनीति और जमीन पर मौजूद वास्तविकता के बीच बढ़ती दूरी देख रही है।
सबसे बड़ा सवाल—युवा पंजाब में क्यों नहीं रुकना चाहता?
पंजाब ने कभी अपने बेटे-बेटियों को दुनिया भर में आत्मविश्वास के साथ भेजा था। आज कई माता-पिता अपने बच्चों को आंखों में आंसू लेकर विदा करते हैं।
कभी सपना था कि बच्चे विदेश से कमाकर वापस आएंगे और पंजाब में निवेश करेंगे।
आज कई परिवारों का सपना सिर्फ इतना रह गया है कि उनके बच्चे विदेश में सुरक्षित और सफल रहें।
यह किसी भी सरकार और समाज के लिए गंभीर सवाल होना चाहिए।
एक सरकार आर्थिक विकास के दावे कर सकती है।
एक नेता लोकप्रियता का दावा कर सकता है।
एक विभाग अपनी उपलब्धियां गिना सकता है।
एक राजनीतिक दल चुनावी जीत का दावा कर सकता है।
लेकिन अगर पंजाब का एक युवा अपने ही प्रदेश को देखकर कहता है—
“यहां मेरा कोई भविष्य नहीं है।”
तो निश्चित तौर पर कहीं न कहीं कुछ बहुत गलत हुआ है।
पंजाब को दया नहीं, ईमानदार आत्ममंथन चाहिए
पंजाब को किसी की सहानुभूति नहीं चाहिए। उसे ईमानदार आत्ममंथन चाहिए।
ऐसी नौकरियां चाहिए जो सिर्फ विज्ञापनों में मौजूद न हों। ऐसी पुलिस व्यवस्था चाहिए जो सिर्फ विरोध को नियंत्रित करने के बजाय नागरिकों की सुरक्षा करे। ऐसी कृषि नीति चाहिए जो किसान को सम्मान और स्थिर आय दे।
ऐसी संस्थाएं चाहिए जो सवालों से बचने के बजाय उनके जवाब दें।
और ऐसे नेता चाहिए जो समझें कि—
जनता का पैसा किसी राजनीतिक दल का पैसा नहीं है।
सरकारी कार्यालय किसी नेता की निजी संपत्ति नहीं हैं।
और सरकार की आलोचना देशद्रोह नहीं है।
पंजाब सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं
पंजाब सिर्फ पांच दरियाओं के बीच बसी जमीन का नाम नहीं है।
पंजाब एक याद है।
पंजाब कुर्बानी है।
पंजाब सुबह सूरज निकलने से पहले खेत में खड़ा किसान है।
पंजाब वह मां है जो विदेश से बेटे का फोन आने का इंतजार करती है।
पंजाब वह बुजुर्ग पिता है जो उस बड़े घर में अकेला बैठा है, जो उसने अपने बच्चों के लिए बनाया था।
पंजाब वह बेरोजगार युवा है, जिसके एक हाथ में डिग्री है और दूसरे हाथ में पासपोर्ट का आवेदन।
पंजाब वह प्रदर्शनकारी है जो बैरिकेड के पीछे बैठकर सिर्फ अपनी बात सुने जाने की मांग कर रहा है।
और पंजाब वह पुलिसकर्मी भी है जो बैरिकेड के दूसरी तरफ खड़ा है।
पंजाब इन सभी का नाम है।
जिस धरती ने देश का पेट भरा, आज अपने बच्चों को रोक नहीं पा रही
सबसे बड़ी विडंबना शायद यही है कि जिस धरती ने कभी देश के करोड़ों लोगों का पेट भरा, आज वही अपने बच्चों को अपने पास रखने के लिए संघर्ष कर रही है।
इसलिए राजनीतिक भाषण चलते रहें, नारे लगते रहें, उद्घाटन होते रहें और तस्वीरें खिंचती रहें।
लेकिन कैमरों और मंचों से दूर पंजाब की जमीन पर एक आवाज लगातार सुनाई देती है—
“कई दरियावां ने पंजाब नूं मेरे,
कि सांस वी हुण सिसकियां भरदे ने।”
सवाल अब यह नहीं है कि पंजाब दुखी है या नहीं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि पंजाब आखिर कब तक दुखी रहेगा, जबकि सत्ता में बैठे लोग हमें बताते रहेंगे कि सब कुछ ठीक है?
