Indian Stock Market News: भारतीय शेयर बाजार में 1 अक्टूबर 2026 को भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल, रुपये की कमजोरी और कच्चे तेल की कीमतों को लेकर बढ़ती चिंता के बीच सेंसेक्स और निफ्टी दोनों दबाव में रहे। कारोबार के दौरान सेंसेक्स में 1,100 अंकों से ज्यादा की गिरावट आई, जबकि निफ्टी 22,300 के करीब पहुंच गया। हालांकि कारोबार के अंत में गिरावट कुछ कम हुई। सेंसेक्स 570.59 अंक टूटकर 71,909.70 पर बंद हुआ। Nifty में 198.50 अंक यानी 0.88% की गिरावट रही और यह 22,421.95 पर बंद हुआ।
25 साल में सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट
1 अक्टूबर का कारोबार भारतीय बाजार के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि निफ्टी लगातार आठवें सप्ताह गिरावट के साथ बंद हुआ। यह करीब 25 वर्षों में इसकी सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट है। इससे पहले 2001 में बाजार लगातार नौ सप्ताह तक गिरावट में रहा था। कोविड-19 के दौरान भी सात सप्ताह की लगातार गिरावट दर्ज हुई थी। Nifty का जनवरी 2026 में रिकॉर्ड हाई 26,373 था। 1 अक्टूबर के 22,421 के बंद स्तर के हिसाब से इंडेक्स अपने शिखर से करीब 15% नीचे है। 20% की गिरावट के बाद किसी इंडेक्स को आम तौर पर बियर मार्केट कहा जाता है, इसलिए मौजूदा गिरावट उस स्तर से अभी नीचे है।
विदेशी निवेशकों ने बेचे ₹10,148 करोड़
बाजार पर सबसे बड़ा दबाव विदेशी निवेशकों की बिकवाली का रहा। 30 सितंबर को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII/FPI) ने भारतीय शेयरों में करीब ₹10,148.41 करोड़ की शुद्ध बिकवाली की। यह लगभग छह महीनों में उनका सबसे बड़ा एकदिनी आउटफ्लो था। इसके उलट घरेलू संस्थागत निवेशक यानी DII लगातार बाजार को सहारा दे रहे हैं। 30 सितंबर को DIIs ने करीब ₹11,271.73 करोड़ की शुद्ध खरीदारी की। सितंबर में भी घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी विदेशी बिकवाली को काफी हद तक अब्जॉर्व करती रही। इससे बाजार में विदेशी और घरेलू निवेशकों के रुख में बड़ा अंतर साफ दिखाई देता है। विदेशी निवेशक जहां लगातार बिकवाली कर रहे हैं, वहीं घरेलू संस्थागत निवेशक गिरावट के दौरान खरीदारी कर रहे हैं।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ने बढ़ाई चिंता
वैश्विक बाजारों में अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में तेजी भी भारतीय शेयर बाजार के लिए दबाव का कारण बनी। 1 अक्टूबर को 10-year US Treasury yield 5.342% तक पहुंच गई, जो 2002 के बाद का उच्च स्तर है। 30-year Treasury yield भी करीब 5.68% तक पहुंची। अमेरिकी बॉन्ड पर बढ़ती यील्ड से डॉलर आधारित सुरक्षित परिसंपत्तियों का आकर्षण बढ़ सकता है। ऐसे माहौल में उभरते बाजारों से विदेशी पूंजी के प्रवाह पर दबाव पड़ सकता है। भारत में हाल की FPI बिकवाली के बीच ऊंची अमेरिकी यील्ड बाजार के लिए एक अतिरिक्त चुनौती बन गई है।
रुपये पर भी लगातार दबाव
वैश्विक बॉन्ड यील्ड और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर रुपये पर भी दिखाई दिया। 1 अक्टूबर को रुपया करीब 96.315 प्रति डॉलर तक कमजोर हुआ, जो लगभग दो महीने का निचला स्तर था। रुपये में एक दिन में करीब 0.5% की गिरावट आई। इससे पहले 30 सितंबर को रुपया 95.83 के आसपास बंद हुआ था। रुपये की कमजोरी भारतीय बाजार के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। कमजोर रुपया और महंगा तेल मिलकर आयात लागत और महंगाई पर दबाव बढ़ा सकते हैं।
कच्चा तेल भी बना बाजार की चिंता
कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ाई। 1 अक्टूबर को ब्रेंट क्रूड करीब 98 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहा, जबकि कारोबार के दौरान तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला। भारत के लिए कच्चे तेल की कीमत बेहद महत्वपूर्ण है। तेल महंगा होने से देश का आयात बिल बढ़ सकता है और कंपनियों की लागत पर भी असर पड़ सकता है। इसी वजह से बाजार निवेशक क्रूड प्राइस में होने वाले बदलाव पर करीबी नजर रख रहे हैं।

