Stubble Burning: पंजाब और हरियाणा के किसानों ने क्या सच में पराली जलाने से तौबा कर लिया है? यदि ऐसा है तो फिर दिल्ली-एनसीआर में एयर पॉल्यूशन ने दिवाली से पहले ही इतना भीषण रूप कैसे अख्तियार कर लिया? दिल्ली और आसपास के इलाकों में क्या सिर्फ वाहनों के चलते हवा की सेहत इतनी खराब हो गई है? दरअसल, पंजाब और हरियाणा में इस सीजन अभी तक पराली जलाने की घटनाएं अप्रत्याशित रूप से काफी कम रिकॉर्ड की गई हैं. ऐसे में दिल्ली और आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण का लगातार बढ़ता स्तर संदेह पैदा कर रहा था. अब एक रिपोर्ट में इसको लेकर चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं. इसमें दावा किया गया है कि पोखरण परमाणु परीक्षण के दौरान एपीजे अब्दुल कलाम ने अमेरिकी सैटेलाइट्स को धोखा देने के लिए जो तरीके अपनाए थे, पंजाब और हरियाणा के किसान भी वैसा ही कर के पराली जलाने (Stubble Burning) की घटनाओं को शासन-प्रशासन से सफलतापूर्वक छुपा ले रहे हैं.
भारत ने मई 1998 में राजस्थान के पोखरण में परमाणु परीक्षणों की तैयारी को अमेरिकी जासूसी उपग्रहों की नजरों से छिपाने में सफलता हासिल की थी. उस समय डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम समेत देश के वैज्ञानिकों ने उपग्रहों की निगरानी की सीमाओं और उनके गुजरने के समय को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बनाई थी. अब पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने वाले किसान भी कुछ इसी तरह की रणनीति अपनाते दिखाई दे रहे हैं. किसान उन समयों में खेतों में आग लगा रहे हैं, जब निगरानी करने वाले उपग्रह संबंधित इलाकों के ऊपर से नहीं गुजरते. इससे बड़ी संख्या में खेतों में लगने वाली आग की घटनाएं आधिकारिक आंकड़ों में दर्ज नहीं हो पातीं.
ऐसे खुली पोल
एनडीटीवी की एक रिपोर्ट में मशहूर साइंस जर्नलिस्ट पल्लव वागला ने किसानों की होशियारी की पोल खोली है. दरअसल, आधिकारिक आंकड़ों की मानें तो खेतों में आग लगने की दर्ज घटनाओं में पिछले कुछ वर्षों में भारी कमी आई है. वर्ष 2021 में करीब 80 हजार घटनाएं दर्ज की गई थीं, जबकि 2025 में इनकी संख्या घटकर लगभग 6 हजार रह गई. इस गिरावट में सरकारी कार्रवाई, जुर्माने, कृषि मशीनों पर सब्सिडी और जागरूकता अभियानों की भूमिका रही है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों को अब उपग्रहों की निगरानी के समय और उनकी सीमाओं की जानकारी भी हो गई है. इसी वजह से कुछ घटनाएं निगरानी के दायरे से बाहर रह जाती हैं. उत्तर भारत में पराली जलाने का पता लगाने के लिए मुख्य रूप से 4 उपग्रह प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाता है. इनमें नासा के टेरा और एक्वा उपग्रहों पर लगे मॉडरेट रिजॉल्यूशन इमेजिंग स्पेक्ट्रोरेडियोमीटर (MODIS) सेंसर तथा सुओमी एनपीपी और एनओएए-20 उपग्रहों पर लगे वीआईआईआरएस (VIIRS) सेंसर शामिल हैं. ये उपग्रह किसी स्थान के ऊपर से दिन में निर्धारित समय पर ही गुजरते हैं. ऐसे में उनके गुजरने के बीच लगाई गई आग का पता लगाना मुश्किल हो सकता है.
कैसे करेंगे चुनौती का सामना
इस चुनौती से निपटने के लिए इंटरनेशनल फोरम फॉर एनवायरनमेंट, सस्टेनेबिलिटी एंड टेक्नोलॉजी (आईफॉरेस्ट) ने ‘फायर वॉच’ नाम से एक नया मल्टी-सैटेलाइट निगरानी प्लेटफॉर्म विकसित किया है. इसका उद्देश्य पराली जलाने की घटनाओं की अधिक व्यापक और सटीक जानकारी जुटाना है. यह प्लेटफॉर्म न केवल आग लगने की जगह की पहचान करेगा, बल्कि यह भी पता लगाने में मदद करेगा कि आग किस समय लगाई गई और उससे कितने कृषि क्षेत्र को नुकसान पहुंचा. एक्सपर्ट के मुताबिक, मौजूदा निगरानी व्यवस्था मुख्य रूप से ध्रुवीय कक्षा में घूमने वाले उपग्रहों (polar-orbiting satellites) से मिलने वाले आग के आंकड़ों पर निर्भर है. इससे पराली जलाने की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ पाती. प्रभावी कदम उठाने के लिए यह जानना जरूरी है कि आग की घटनाएं कितनी हुईं, कहां हुईं, किस समय हुईं और उनसे कितना क्षेत्र प्रभावित हुआ. फायर वॉच इन सभी जानकारियों को एक साथ उपलब्ध कराने का प्रयास है.
हर 15 मिनट में निगरानी
रिपोर्ट के अनुसार, फायर वॉच इस कमी को दूर करने के लिए अलग-अलग कक्षाओं में मौजूद कई उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों का इस्तेमाल करता है. इसमें MODIS और VIIRS के अलावा मीटियोसैट-8 और मीटियोसैट-9 उपग्रहों के SEVIRI उपकरणों से मिलने वाली तस्वीरें भी शामिल की गई हैं. भूस्थिर कक्षा (Geostationary Orbit – जियोस्टेशनरी ऑर्बिट) में मौजूद ये उपग्रह एक ही क्षेत्र की बार-बार तस्वीरें ले सकते हैं. इनसे लगभग हर 15 मिनट में निगरानी संभव है. इससे आग लगने की घटनाओं के समय और उनकी गतिविधियों में तेजी आने की अवधि का पता लगाया जा सकता है. इस प्लेटफॉर्म में सेंटिनल-2 उपग्रह की तस्वीरों को भी शामिल किया गया है. इनके जरिए आग लगने के मौसम से पहले और बाद की तस्वीरों की तुलना कर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वास्तव में कितनी कृषि भूमि जली है. विशेषज्ञों के मुताबिक, केवल आग की घटनाओं की गिनती से नुकसान का सही आकलन नहीं हो सकता. दो जिलों में आग की घटनाओं की संख्या समान हो सकती है, लेकिन जली हुई जमीन का क्षेत्रफल काफी अलग हो सकता है.
संसदीय समिति ने भी जताई चिंता
वर्ष 2026 की एक संसदीय स्थायी समिति ने भी पर्यावरण निगरानी के लिए विदेशी उपग्रह प्रणालियों पर भारत की निर्भरता को लेकर चिंता जताई है. समिति ने कहा कि अंतरिक्ष क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल करने के बावजूद भारत जंगलों में आग और ऐसी अन्य पर्यावरणीय घटनाओं की निगरानी के लिए विदेशी प्रणालियों पर काफी हद तक निर्भर है. समिति ने दिन के अलग-अलग समय में निगरानी की कमी का उल्लेख करते हुए अंतरिक्ष विभाग से चौबीसों घंटे आग की निगरानी करने में सक्षम भूस्थिर उपग्रह विकसित करने को प्राथमिकता देने की सिफारिश की. भारत के पास इस दिशा में जरूरी तकनीकी क्षमता भी मौजूद है. हाल में प्रक्षेपित EOS-05, जिसे GISAT-1A भी कहा जाता है, इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. यह उपग्रह चयनित क्षेत्रों की तस्वीर हर पांच मिनट में और बादल रहित परिस्थितियों में पूरे भारतीय भूभाग की तस्वीर हर 30 मिनट में लेने में सक्षम है. इसे अंतरिक्ष में स्थापित एक विशाल सीसीटीवी कैमरे की तरह देखा जा रहा है, जो लगातार देश के विभिन्न हिस्सों पर नजर रख सकता है.