होर्मुज खुलने के बाद भी स्थिति को सामान्य होने में लगेंगे कई माह, साढेÞ तीन माह तक होर्मुज बंद रहने से तेल कंपनियों के स्टॉक निम्न स्तर पर पहुंचे
Crude Oil Crisis (द भारत ख़बर), बिजनेस डेस्क : अमेरिका और इजरायल ने जब 28 फरवरी 2026 को ईरान पर संयुक्त रूप से हमला किया था तो शायद किसी ने नहीं सोचा था कि युद्ध इतना लंबा चलेगा और इसके परिणाम इतने ज्यादा विशाल होंगे। ईरान ने युद्ध की शुरुआत में ही होर्मुज को पूरी तरह से बंद कर दिया। ईरान द्वारा यह कदम उठाने से विश्व भर में आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई में काफी ज्यादा बाधा आई।
सबसे ज्यादा बुरा प्रभाव कच्चे तेल और एलपीजी की सप्लाई पर पड़ा। भारत सहित बहुत सारे देश जोकि अपनी जरूरत का ज्यादा हिस्सा आयात से पूरा करते हैं इस दौरान काफी संकट में रहे। इसके साथ ही दर्जनों देशों की तेल कंपनियों का स्टॉक भी निम्न स्तर पर पहुंच गया। अब जबकि होर्मुज पूरी तरह से खुल चुका है और सप्लाई लगभग पहले की तरह हो चुकी है तो लोगों को उम्मीद है कि तेल और एलपीजी की कमी कम होगी और इनकी कीमत में सरकार राहत देगी। हालांकि ऐसा होना अभी मुश्किल लग रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों पर रहेगा दबाव
विश्लेषकों और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का साफ कहना है कि होर्मुज खुलने के बाद भी दुनिया भर के रणनीतिक और वाणिज्यिक तेल भंडार खाली ही रहेंगे, जिससे आने वाले महीनों में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बना रहेगा। कीमतों के इस ऊंचे स्तर का असर वैश्विक मांग पर भी दिखेगा। साल 2026 में वैश्विक तेल मांग में 2025 के मुकाबले 1.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन की गिरावट आने का अनुमान है। हालांकि, 2027 में व्यापार सामान्य होने पर मांग में दोबारा 2 से 2.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन के बढ़ोतरी होने की उम्मीद है।
दुनिया भर में दिखाई दी तेल की कमी
अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के ताजा आंकड़े बताते हैं कि युद्ध के दौरान मांग को पूरा करने के लिए सरकारों ने अपने आपातकालीन भंडारों को रिकॉर्ड गति से खाली किया है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के मुताबिक, विकसित देशों के समूह (ओईसीडी) का तेल भंडार गिरकर 1990 के बाद के सबसे निचले स्तर पर आ गया है। संकट की शुरूआत से अब तक इस बफर स्टॉक से 163 मिलियन बैरल तेल निकाला जा चुका है।
अमेरिकी ऊर्जा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका का आपातकालीन रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व गिरकर 340.3 मिलियन बैरल पर आ गया है, जो 1983 के बाद का सबसे निचला स्तर है। वहीं ईआईए के मुताबिक, साल 2026 के अंत तक ओईसीडी देशों के पास केवल 50 दिनों की भावी मांग को पूरा करने का स्टॉक बचेगा, जो 2003 के बाद सबसे कम है।
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