फरीदाबाद. अदालतों में सालों से चल रहे मुकदमों का बोझ कम करना हो या लोगों को बार-बार कोर्ट के चक्कर लगाने से राहत दिलानी हो, लोक अदालत एक अच्छा विकल्प है. कई बार छोटे-छोटे विवादों को सुलझाने में लोगों का समय और पैसा दोनों खर्च हो जाते हैं. ऐसे में लोक अदालत के जरिए आपसी सहमति से मामलों का निपटारा किया जा सकता है. लोकल 18 से फरीदाबाद सेक्टर-12 कोर्ट में बैठने वाले एडवोकेट मोहन तिवारी बताते हैं कि लोक अदालत का मुख्य उद्देश्य कम खर्च में और जल्द विवादों का समाधान करना है. लोक अदालत में समझौते योग्य मामलों का निपटारा दोनों पक्षों की सहमति से होता है. इससे लोगों को लंबे समय तक मुकदमा लड़ने और बार-बार अदालत आने से राहत मिल सकती है. लोक अदालत में मामले का निपटारा निःशुल्क होता है.
किन मामलों का समझौता
मोहन तिवारी बताते हैं कि बैंक लोन, चेक बाउंस, पारिवारिक विवाद और मोटर दुर्घटना से जुड़े समझौता योग्य मामलों को लोक अदालत में रखा जा सकता है. हालांकि, गंभीर आपराधिक मामलों सहित जिन मामलों में कानूनन समझौते की अनुमति नहीं है, उनका निपटारा यहां नहीं हो सकता. अगर मामला पहले से अदालत में चल रहा है, तो संबंधित अदालत में आवेदन देकर उसे लोक अदालत में भेजने का अनुरोध किया जा सकता है. इसके लिए दोनों पक्षों की सहमति जरूरी है. अदालत की प्रक्रिया के बाद मामला लोक अदालत में भेजा जा सकता है.
मोहन तिवारी बताते हैं कि लोक अदालत में किसी पक्ष पर समझौता करने का दबाव नहीं बनाया जाता. दोनों पक्ष अपनी मर्जी से सहमत हों, तभी समझौता होता है. लोक अदालत में निपटारे के लिए अलग से कोई शुल्क नहीं लगता, लेकिन पहले किए गए कानूनी खर्च वापस मिलेंगे या नहीं, यह मामले और लागू नियमों पर निर्भर करता है. लोक अदालत का समझौता आधारित फैसला अंतिम होता है और उसे सामान्य अपील के जरिए चुनौती नहीं दी जा सकती. इसलिए किसी भी शर्त को अच्छी तरह समझने के बाद ही समझौते पर सहमति देनी चाहिए. मोहन तिवारी बताते हैं कि अगर लोक अदालत में दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बनती, तो मामला संबंधित अदालत में वापस भेज दिया जाता है. इसके बाद मुकदमे की सुनवाई पहले की तरह जारी रहती है और अदालत सबूतों व दलीलों के आधार पर फैसला करती है.