कहा, सोने की कीमतों में उछाल का कारण वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंकों की तरफ से इसकी भारी मात्रा में खरीदारी
Business News Update (द भारत ख़बर), बिजनेस डेस्क : वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कीमती धातुओं के दामों में हो रहे उतार चढ़ाव पर अपने विचार रखे हैं। वे नई दिल्ली स्थित आरबीआई भवन में रिजर्व बैंक के केंद्रीय निदेशक मंडल की 61वीं बैठक में भाग लेने के दौरान बोल रहीं थी। इस दौरान उनके साथ आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा भी मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि सोने-चांदी का आयात चिंताजनक स्तर पर नहीं है। रिजर्व बैंक इस पर नजर रख रहा है।
सोने की कीमतों में उछाल का कारण वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंकों की तरफ से इसकी भारी मात्रा में खरीदारी है। उन्होंने कहा कि सोना घरेलू परिवारों के लिए पारंपरिक निवेश का साधन रहा है और त्योहारों के मौसम में इसमें आमतौर पर उछाल देखा जाता है। सीतारमण ने स्पष्ट किया कि अभी तक सोने की कीमतों ने कुछ निश्चित सीमाओं को पार नहीं किया है और स्थिति नियंत्रण में है। तरलता के मुद्दे पर वित्त मंत्री ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक के पास पर्याप्त तरलता उपलब्ध है और अर्थव्यवस्था की जरूरतों के अनुसार ऋण उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी।
सोने के आयात को लेकर कोई खास चिंता नहीं
वहीं आरबीआई गवर्नर मल्होत्रा ने आश्वासन दिया कि सोने के आयात को लेकर कोई खास चिंता नहीं है। बाहरी क्षेत्र मजबूत है और चालू खाता घाटा नियंत्रण योग्य स्तर पर है। उन्होंने यह भी दोहराया कि आरबीआई अर्थव्यवस्था की उत्पादक जरूरतों के लिए पर्याप्त तरलता उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीए) पर टिप्पणी करते हुए आरबीआई गवर्नर ने कहा कि एफडीआई प्रवाह मजबूत बना हुआ है, पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी अच्छी वृद्धि दर्ज की गई है और देश के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है। बैठक में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी भी उपस्थित रहे।
अमेरिकी घटनाक्रम पर हमारी नजर
सीतारमण ने कहा कि अमेरिकी टैरिफ में हुए बदलाव से हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव पर टिप्पणी करना अभी जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा कि वाणिज्य मंत्री हालात की समीक्षा कर रहे हैं। साथ ही बीमा उत्पादों की गलत बिक्री के बजाय बैंकों को अपने मुख्य व्यवसाय पर ध्यान देना चाहिए। वित्त मंत्री ने कहा कि भारत पहले ही आॅस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, यूएई, कतर, ओमान जैसे देशों के साथ-साथ यूरोपीय संघ और ब्रिटेन जैसे गुटों के साथ व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर कर चुका है। भारत वैश्विक बाजारों के साथ जुड़ाव जारी रखना चाहता है और यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसकी अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय व्यापार से लाभ मिले।
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