लंबे समय तक रह सकता है पश्चिम एशिया तनाव का असर
West Asia Crisis on Global Market (द भारत ख़बर), बिजनेस डेस्क : अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध और पश्चिम एशिया में फैले तनाव को एक माह पूरा होने को है। इस एक माह में इस युद्ध की विभिषका न केवल ईरान, इजरायल और अमेरिका ने झेली है। बल्कि समूचा विश्व इससे प्रभावित हुआ है। इस युद्ध से फैले तनाव के चलते विश्व सप्लाई चेन बहुत बुरी तरह से प्रभावित हुई है। जिसके चलते विश्व में न केवल जरूरी सामान की किल्लत महसूस होने लगी है बल्कि विश्व के प्रमुख शेयर बाजार भी नकारात्मक दौर से गुजर रहे हैं।
रिपोर्ट में हुए सनसनीखेज खुलासे
बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक बाजार एक बड़े भू-राजनीतिक बदलाव को नजरअंदाज कर रहे हैं। सिस्टमैटिक्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा हालात केवल तात्कालिक उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि वैश्विक परिदृश्य में एक बड़े बदलाव का संकेत हैं, जो आगे चलकर बार-बार उभर सकते हैं और लंबी अवधि तक अनिश्चितता बनाए रख सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, बाजार फिलहाल हर युद्ध से जुड़ी खबर पर उम्मीद और डर के बीच झूल रहे हैं, लेकिन इसके पीछे एक गहरा बदलाव चल रहा है। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में बदलती नीतियां और ईरान की प्रतिक्रिया मिलकर ऐसी स्थिति बना रही हैं, जहां निवेशकों के लिए लंबी अवधि के जोखिमों का आकलन करना मुश्किल हो गया है।
ग्लोबल साउथ के बीच शक्ति संतुलन बदल रहा
रिपोर्ट ने इसे वैश्विक भू-राजनीतिक ढांचे में एक बड़े मेटामॉर्फोसिस के रूप में बताया है, जिसमें अमेरिका और चीन के नेतृत्व वाले ग्लोबल साउथ के बीच शक्ति संतुलन बदल रहा है। इससे आने वाले समय में इस तरह के तनाव और टकराव बार-बार देखने को मिल सकते हैं। आर्थिक मोर्चे पर रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि इस संकट का सीधा असर ऊर्जा बाजार पर दिख रहा है। ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास या उससे ऊपर पहुंच चुकी है, जो न सिर्फ सप्लाई से जुड़े जोखिम बल्कि बढ़ते जियोपॉलिटिकल प्रीमियम को भी दशार्ता है। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर तनाव कम भी होता है, तब भी कच्चे तेल और गैस की सप्लाई में बाधाएं बनी रह सकती हैं, जिससे कीमतें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं।
विश्व पर बढ़ रहा ऋण का बोझ
इसके साथ ही वैश्विक कर्ज भी चिंता का बड़ा कारण बनता जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के दौरान वैश्विक कर्ज करीब 29 ट्रिलियन डॉलर बढ़कर 348 ट्रिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, जिससे सरकारों की आर्थिक प्रोत्साहन देने की क्षमता सीमित हो सकती है।
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