
तेल और गैस से भरपूर राज्य है कनाडा का पश्चिमी प्रांत अल्बर्टा
Canada Alberta Separation Crisis, (द भारत ख़बर), ओटावा: कनाडा के पश्चिमी प्रांत अल्बर्टा को अलग देश बनने की मांग और ज्यादा तेज हो गई है। अलगाववादियों ने बुधवार को दावा किया है कि उन्होंने इतना समर्थन जुटा लिया है कि अब स्वतंत्रता पर जनमत संग्रह (रेफरेंडम) कराया जा सकता है। अलगाववादी नेताओं के मुताबिक, उन्होंने करीब 3 लाख हस्ताक्षर चुनाव अधिकारियों को सौंपे हैं, जबकि इसके लिए 1.78 लाख दस्तखत की जरूरत थी।
आंदोलन के नेता मिच सिलवेस्ट्रे ने इसे ऐतिहासिक दिन बताया और कहा कि अब यह लड़ाई अगले चरण में पहुंच गई है। इस अलगाववादी आंदोलन की जड़ें काफी पुरानी हैं। अल्बर्टा, जहां करीब 50 लाख लोग रहते हैं, लंबे समय से खुद को कनाडा के बाकी हिस्सों से अलग मानता है। यहां के लोग मानते हैं कि उनकी संस्कृति, अर्थव्यवस्था और राजनीति अलग है, लेकिन फैसले ओटावा में बैठकर लिए जाते हैं।
हस्ताक्षरों की जांच करेगा चुनाव आयोग
हालांकि इतना समर्थन जुटा लेने का मतलब यह नहीं है कि रेफरेंडम पक्का हो गया है। चुनाव आयोग को पहले इन हस्ताक्षरों की जांच करनी होगी। इस प्रक्रिया पर फिलहाल अदालत के आदेश की वजह से रोक भी लगी हुई है। अगर वोटिंग अल्बर्टा के पक्ष में गई तो यह प्रांत कनाडा को छोड़ अलग देश बन सकता है।
जनमत संग्रह के साथ अलगाव पर भी हो सकती है वोटिंग
अल जजीरा के मुताबिक, अगर सभी कानूनी अड़चनें दूर हो जाती हैं, तो प्रांत में 19 अक्टूबर को प्रस्तावित बड़े जनमत संग्रह के साथ अलगाव पर भी वोटिंग कराई जा सकती है। उसी दिन संविधान और इमिग्रेशन जैसे दूसरे मुद्दों पर भी मतदान की योजना है।
सर्वे में 30% लोग ही अलग देश के पक्ष में
अगर यह प्रस्ताव वोटिंग तक पहुंचता है, तो लोगों से सीधा सवाल पूछा जाएगा कि क्या अल्बर्टा कनाडा से अलग होकर एक स्वतंत्र देश बनना चाहिए। लेकिन सर्वे बताते हैं कि अभी सिर्फ करीब 30 प्रतिशत लोग ही इसके समर्थन में हैं, यानी जनमत संग्रह पास होना भी आसान नहीं है।
हालांकि अलगाववादियों का मानना है कि यह आंकड़ा वोटिंग के दौरान बढ़ने वाला है। अल्बर्टा की प्रीमियर डेनिएल स्मिथ ने कहा है कि अगर जरूरी हस्ताक्षर पूरे होते हैं तो वह वोटिंग आगे बढ़ाएंगी, लेकिन वह खुद कनाडा से अलग होने के पक्ष में नहीं हैं।
कनाडा से अलग क्यों होना चाहता है अल्बर्टा
- अल्बर्टा तेल और गैस से भरपूर राज्य है। यहां कनाडा के कुल तेल उत्पादन का लगभग 84% हिस्सा निकलता है। यहां के लोगों को लगता है कि वे ज्यादा कमाते हैं, लेकिन फायदा बाकी कनाडा को ज्यादा मिलता है। उन्हें शिकायत है कि टैक्स का पैसा ओटावा जाकर खर्च होता है, जबकि फैसले लेते समय उनकी आवाज कम सुनी जाती है।
- दूसरा बड़ा मुद्दा केंद्र सरकार से टकराव है। ओटावा में बैठी सरकार के फैसलों को लेकर अल्बर्टा में नाराजगी रहती है। खासकर पर्यावरण और जलवायु से जुड़े नियमों को लेकर। यहां के लोग मानते हैं कि ये नियम उनके तेल और गैस उद्योग को नुकसान पहुंचाते हैं और बिना समझे बनाए जाते हैं।
- तीसरा कारण पहचान और राजनीति है। अल्बर्टा को कनाडा के बाकी हिस्सों से अलग माना जाता है। यहां की राजनीति ज्यादा कंजर्वेटिव (रूढ़िवादी) है, जबकि केंद्र में लंबे समय से लिबरल विचारधारा हावी रही है।
- इसके अलावा यहां यह भी भावना है कि केंद्र सरकार उनके संसाधनों पर ज्यादा नियंत्रण रखती है। पाइपलाइन, ऊर्जा परियोजनाएं और निर्यात जैसे मुद्दों पर कई बार फैसले अटकते हैं, जिससे स्थानीय लोगों में गुस्सा बढ़ता है।
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