
SC Split on CEC Appointment Rules: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता पर सुप्रीम कोर्ट की दो-जजों की पीठ एकमत नहीं हो सकी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बीच इस बात पर मतभेद सामने आया कि क्या इस चुनौती की सुनवाई बड़ी यानी संविधान पीठ को करनी चाहिए। 23 सितंबर 2026 को दिए गए अलग-अलग मतों के बाद मामले के कागजात सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पास भेजे गए हैं, ताकि संविधान पीठ गठित करने पर विचार किया जा सके।
विवाद किस कानून को लेकर है?
संसद ने दिसंबर 2023 में चीफ इलेक्शन कमिश्नर एंड अदर इलेक्शन कमिश्नर्स एक्ट पारित किया था। कानून को 28 दिसंबर 2023 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली और यह 2024 की शुरुआत में लागू हुआ। इसका उद्देश्य CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को कानून के जरिए निर्धारित करना था। इस कानून की धारा 7 के तहत नियुक्ति की सिफारिश करने वाली चयन समिति में तीन सदस्य हैं। प्रधानमंत्री इस समिति के अध्यक्ष हैं और लोकसभा में विपक्ष के नेता और पीएम द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री इसके सदस्य हैं। मार्च 2023 के सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम व्यवस्था वाले मॉडल में CJI की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को रखा गया है। धारा 8 चयन समिति की कार्यप्रणाली से संबंधित है। इसके तहत समिति अपनी प्रक्रिया तय कर सकती है और वह सर्च कमेटी द्वारा भेजे गए पैनल के बाहर के किसी व्यक्ति पर भी विचार कर सकती है।
2023 के फैसले में क्या कहा गया था?
इस विवाद की पृष्ठभूमि समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट का अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ फैसला महत्वपूर्ण है। 2 मार्च 2023 को पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा था कि जब तक संसद CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कानून नहीं बनाती, तब तक राष्ट्रपति नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और CJI वाली तीन सदस्यीय समिति की सलाह पर करेंगे। उस समय अदालत ने इसे संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक लागू रहने वाली व्यवस्था के रूप में रखा था। फैसले में यह भी कहा गया कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्ष चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसके बाद संसद ने उसी वर्ष अपना कानून बना दिया। यहीं से मौजूदा संवैधानिक विवाद शुरू होता है- क्या संसद Article 324(2) के तहत ऐसा कानून बना सकती है, जिसमें CJI चयन समिति का हिस्सा न हों? क्या ऐसी व्यवस्था चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता से जुड़ी उन शर्तों के अनुरूप है, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया था?
जस्टिस दीपांकर दत्ता की राय क्या रही?
जस्टिस दीपांकर दत्ता का दृष्टिकोण यह रहा कि अनूप बरनवाल मामले में संवैधानिक सिद्धांत पहले ही तय किए जा चुके हैं। उनके अनुसार मौजूदा मामले में मुख्य सवाल उन स्थापित सिद्धांतों को 2023 के कानून पर लागू करने का है। सुनवाई के दौरान जस्टिस दत्ता ने यह भी स्पष्ट किया था कि 2023 के फैसले में CJI को शामिल करने वाली व्यवस्था संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक की व्यवस्था थी। मई 2026 की सुनवाई में उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि कानून बनाना संसद का अधिकार है और अदालत संसद को यह निर्देश नहीं दे सकती कि वह किस प्रकार का कानून बनाए। इस दृष्टिकोण के तहत मौजूदा चुनौती को केवल इसलिए संविधान पीठ को भेजना जरूरी नहीं माना गया, क्योंकि इसमें पहले से तय संवैधानिक सिद्धांतों को नए कानून पर लागू करने का प्रश्न है।
जस्टिस शर्मा ने क्यों अलग राय दी?
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने इससे अलग दृष्टिकोण अपनाया। उनके अनुसार सवाल केवल यह नहीं है कि अनूप बरनवाल में तय सिद्धांतों को नए कानून पर कैसे लागू किया जाए, बल्कि यह भी है कि संसद क्या चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की नियुक्ति प्रक्रिया से किसी स्वतंत्र या निष्पक्ष सदस्य को हटाकर ऐसी चयन व्यवस्था बना सकती है, जिसमें सरकार के प्रतिनिधियों की संख्या अधिक हो। यही प्रश्न उनके अनुसार संविधान की व्याख्या से जुड़ा नया और महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। इसलिए उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान पीठ के गठन की आवश्यकता का समर्थन किया। इस तरह दोनों जजों की असहमति कानून की अंतिम वैधता पर नहीं, बल्कि मुख्य रूप से इस संवैधानिक चुनौती को किस स्तर की पीठ द्वारा सुना जाना चाहिए, इस सवाल पर है।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य आपत्ति क्या है?
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, जया ठाकुर और अन्य याचिकाकर्ताओं ने 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। उनकी मुख्य आपत्ति यह है कि चयन समिति में प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री होने के कारण सरकार के पास दो सदस्य हैं, जबकि विपक्ष के नेता के पास केवल एक सदस्य है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे चयन प्रक्रिया में कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ता है और यह उस संवैधानिक आवश्यकता के विपरीत है जिसके तहत चुनाव आयोग को राजनीतिक कार्यपालिका से पर्याप्त रूप से स्वतंत्र रहना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से धारा 7 और धारा 8 को चुनौती दी है। दूसरी ओर केंद्र का रुख है कि Article 324(2) संसद को नियुक्ति की व्यवस्था कानून के जरिए निर्धारित करने का अधिकार देता है और 2023 का कानून उसी संवैधानिक प्रावधान के तहत बनाया गया है। मई 2026 की सुनवाई में सरकार ने इसी आधार पर कानून बनाने की सीमा पर जोर दिया था।
