नई दिल्ली. इंटरेशनल क्रिकेट में डेब्यू पर हर कोई अपना ऐसी पारी खेलना चाहता है जिसे हमेशा याद रखे. अगर पहली 6 पारियों में कोई बैटर सिर्फ 1 रन बनाए और 5 बार शून्य पर आउट हो तो उसका करियर खत्म ही माना जाएगा. इस तरह की शुरुआत के बाद भी श्रीलंका पूर्व क्रिकेटर मार्वन अट्टापट्टू ने टेस्ट क्रिकेट में अपनी अलग पहचान बनाई. इस खिलाड़ी को धैर्य और लगातार मेहनत भी बड़ी मिसाल माना जाता है.
क्रिकेट इतिहास में कई खिलाड़ियों ने लगातार शून्य से शानदार शुरुआत की और फिर गुमनामी में चले गए. वहीं अटापट्टू का करियर इसके बिल्कुल उलट रहा. उन्होंने अपने इंटरनेशनल क्रिकेट की शुरुआत बेहद निराशाजनक की थी. उन्होंने अपनी मेहनत और जिद के दम पर खुद को श्रीलंका के महान बल्लेबाजों में शामिल कराया.
श्रीलंका के पूर्व कप्तान मार्वन अटापट्टू ने साल 1990 में भारत के खिलाफ टेस्ट डेब्यू किया था. चंडीगढ़ में खेले गए इस मुकाबले की दोनों पारियों में वह खाता नहीं खोल पाए थे. पहली पारी में वेंकटपति राजू ने उनको शून्य पर आउट किया था जबकि दूसरी पारी में कपिल देव ने बिना खाता खोले वापस भेजा था. इसके बाद उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया था. साल 1992 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उन्हें दोबारा मौका मिला. उनकी वापसी भी निराशाजनक रही और फिर से शून्य पर आउट हो गए. दूसरी पारी में उन्होंने अपना पहला इंटरनेशनल रन बनाया. इस प्रदर्शन के बाद फिर से उन्हें फिर टीम से बाहर होना पड़ा. दो साल बाद 1994 में भारत के खिलाफ उनकी टेस्ट टीम में फिर वापसी का मौका मिला. इस बार भी वह दोनों पारियों में शून्य पर आउट हो गए. अपनी टेस्ट करियर की 6 पारियों में 5 शून्य और सिर्फ 1 रन बनाया था.
शुरुआती टेस्ट मुकाबलों में लगातार फ्लॉप होने के बाद भी इस बैटर ने हार नहीं मानी. अटापट्टू ने मेहनत की और ऐसी वापसी की जिसने उनका सफर श्रीलंका की कप्तानी तक पहुंचाया. उन्होंने घरेलू क्रिकेट में जमकर रन बनाए और अपनी तकनीक पर काम किया। करीब तीन साल की मेहनत के बाद 1997 में जब उनकी टीम में वापसी की. इसके बाद अटापट्टू ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. टेस्ट क्रिकेट में उन्होंने 6 दोहरा शतक बना डाला और कुल 5502 रन के साथ अपना करियर खत्म किया. उनके नाम 16 टेस्ट शतक दर्ज हैं जिसमें 249 रन की सबसे बड़ी पारी रही.

